
23 अप्रैल, 2026 की तिथि भारतीय न्यायशास्त्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में अंकित हो गई है। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पितृत्व (Paternity) और बाल भरण-पोषण (Child Maintenance) से जुड़े एक मामले में ऐसा “लैंडमार्क” निर्णय सुनाया है, जो दशकों से चले आ रहे साक्ष्य अधिनियम के सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान के धरातल पर फिर से परिभाषित करता है।
न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि यदि एक वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे का डीएनए (DNA) परीक्षण वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध कर देता है कि संबंधित पुरुष उस बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उस पुरुष को बच्चे के भरण-पोषण के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता। यह फैसला न केवल एक व्यक्ति के वित्तीय अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि “न्याय का उद्देश्य सत्य की खोज है” के सिद्धांत को भी पुख्ता करता है।
यह कानूनी संघर्ष एक जटिल वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था। पति ने अपनी पत्नी पर बेवफाई का आरोप लगाते हुए बच्चे के पितृत्व को चुनौती दी थी। इस मामले की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि माँ की सहमति से ही डीएनए परीक्षण किया गया था। अक्सर ऐसे मामलों में माँ की सहमति एक बड़ी बाधा होती है, लेकिन यहाँ सहमति ने कानूनी मार्ग प्रशस्त किया। प्रयोगशाला के परिणामों ने 100% सटीकता के साथ यह निष्कर्ष निकाला कि पति और बच्चे के बीच कोई जैविक संबंध नहीं है। निचली अदालत (Trial Court) से लेकर उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट तक, सभी ने माना कि जब एक बार वैज्ञानिक प्रमाण मेज पर हो, तो उसे नजरअंदाज करना न्याय की हत्या होगी।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 112 एक अत्यंत शक्तिशाली कानूनी धारणा (Presumption of Law) पर आधारित है। यह कहती है कि यदि किसी बच्चे का जन्म विवाह के दौरान हुआ है, तो उसे उस पुरुष की संतान ही माना जाएगा, जब तक कि वह पुरुष यह सिद्ध न कर दे कि उस कालखंड में उसकी अपनी पत्नी तक ‘पहुँच’ (Access) नहीं थी।
यह धारा उस समय बनाई गई थी जब पितृत्व सिद्ध करने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं था। इसका उद्देश्य बच्चों को ‘अवैधता’ के सामाजिक कलंक से बचाना और उन्हें पैतृक संपत्ति एवं भरण-पोषण का अधिकार सुनिश्चित करना था। माननीय न्यायालय ने माना कि धारा 112 एक “अनुमान” है, जबकि डीएनए रिपोर्ट एक “तथ्य” है। कोर्ट ने कहा, “कानूनी अनुमानों का उपयोग वहां किया जाता है जहां सत्य अस्पष्ट हो। जब विज्ञान सत्य को पूरी तरह स्पष्ट कर देता है, तो अनुमानों के लिए कोई स्थान नहीं बचता।”
यह फैसला उन पुरुषों के लिए एक बड़ा कानूनी कवच है जो ‘पैटर्निटी फ्रॉड’ (Paternity Fraud) का शिकार होते हैं। कोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे बच्चे के पालन-पोषण के लिए वित्तीय रूप से जिम्मेदार बनाना, जिसका वह पिता नहीं है, उसके साथ अन्याय है। यह उसके संपत्ति के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार है। हालांकि कोर्ट ने माना कि यह बच्चे के लिए दुखद हो सकता है, लेकिन न्याय प्रणाली को भावनाओं के बजाय ‘वैधानिक सत्य’ पर आधारित होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक अत्यंत संवेदनशील और प्रगतिशील रुख अपनाया। न्यायालय इस बात से भली-भांति परिचित था कि पिता के हटने से बच्चा निराश्रित (Destitute) हो सकता है। कोर्ट ने दिल्ली के महिला एवं बाल विकास विभाग (Women and Child Development Department) को सीधे आदेश दिया कि वह उस बच्चे के मामले को अपने संज्ञान में ले।
विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह बच्चे की शिक्षा (Education), भोजन (Food) और स्वास्थ्य देखभाल (Healthcare) तक पहुंच सुनिश्चित करे। कोर्ट का संदेश स्पष्ट है यदि एक पुरुष पिता नहीं है, तो वह जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है, लेकिन समाज और राज्य एक बच्चे को बीच राह में नहीं छोड़ सकते। राज्य को ‘अभिभावक’ (Parens Patriae) की भूमिका निभाते हुए बच्चे के मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी होगी।
| पहलू | पुरानी स्थिति | सुप्रीम कोर्ट के बाद की स्थिति |
| पितृत्व का आधार | विवाह की वैधता (धारा 112) | जैविक सत्य (DNA रिपोर्ट) |
| भरण-पोषण (Maintenance) | अनिवार्य, यदि विवाह वैध था। | केवल तभी अनिवार्य, यदि पितृत्व सिद्ध हो। |
| बच्चे का कल्याण | पूरी तरह माता-पिता पर निर्भर। | राज्य (WCD) की निगरानी में सुरक्षित। |
यद्यपि यह फैसला तार्किक और वैज्ञानिक है, लेकिन इसके कुछ व्यावहारिक प्रभाव भी हो सकते हैं अब कई पुराने और चल रहे मामलों में डीएनए टेस्ट की मांग बढ़ सकती है, जिससे वैवाहिक विवादों में तीव्रता आ सकती है। पितृत्व खारिज होने का बच्चे के मन पर गहरा असर पड़ता है। ऐसे में राज्य द्वारा केवल ‘भोजन और शिक्षा’ देना काफी नहीं होगा, बल्कि ‘काउंसलिंग’ की भी आवश्यकता होगी। यह फैसला भविष्य में संसद को विवश कर सकता है कि वह ‘साक्ष्य अधिनियम’ में संशोधन कर डीएनए साक्ष्यों को प्राथमिकता देने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की आधुनिकता का प्रमाण है। यह एक ओर व्यक्ति को ‘धोखाधड़ी’ से मुक्त करता है और दूसरी ओर राज्य को ‘कल्याण’ के लिए जवाबदेह बनाता है।
न्यायालय ने यह सिद्ध कर दिया है कि “कानून स्थिर नहीं हो सकता; इसे वैज्ञानिक प्रगति और निष्पक्षता के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए।” सत्य को स्वीकार करने का साहस ही न्याय को उसकी वास्तविक गरिमा प्रदान करता है। अब यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उन बच्चों के लिए एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित करे जो ऐसे पितृत्व विवादों के कारण अनिश्चितता के भंवर में फंस जाते हैं।



