डिजिटल ब्रिक्स: सीमा पार लेन-देन के लिए एक नई वैश्विक वित्तीय व्यवस्था
व्यापार और पर्यटन: आम आदमी और व्यापारियों को क्या लाभ होगा?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ब्रिक्स (BRICS) देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDCs) को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह न केवल सदस्य देशों के बीच व्यापारिक सुगमता को बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य की एक वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय प्रणाली की नींव भी रखेगा।
वैश्विक कूटनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 2026 एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहा है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के लिए तैयार है, जिसका विषय “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability) रखा गया है। इस शिखर सम्मेलन के एजेंडे में सबसे प्रमुख प्रस्तावों में से एक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से आया है जो ब्रिक्स देशों की आधिकारिक डिजिटल मुद्राओं को एक साझा प्लेटफॉर्म से जोड़ने की वकालत करता है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आरबीआई ने भारत सरकार को सिफारिश की है कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और पर्यटन भुगतानों को सुव्यवस्थित करने के लिए उनकी डिजिटल मुद्राओं (CBDC) को आपस में जोड़ा जाए। यह विचार केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की वित्तीय संप्रभुता को मजबूत करने का एक रणनीतिक कदम है।
इस प्रस्ताव की जड़ें 2025 में रियो डी जनेरियो में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में देखी जा सकती हैं, जहाँ सदस्य देशों ने एक ऐसी साझा भुगतान प्रणाली विकसित करने पर सहमति जताई थी जो अमेरिकी डॉलर और स्विफ्ट (SWIFT) जैसे पश्चिमी प्रणालियों पर निर्भरता को कम कर सके।
वर्तमान में, यदि भारत का कोई व्यापारी रूस या ब्राजील से सामान मंगाता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली (Correspondent Banking) के कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसमें न केवल समय अधिक लगता है, बल्कि बार-बार मुद्रा विनिमय (Currency Conversion) के कारण लागत भी बढ़ जाती है।
डिजिटल मुद्राओं के जुड़ने से व्यापारिक लेन-देन का निपटान हफ्तों या दिनों के बजाय कुछ ही सेकंड में हो सकेगा। बिचौलियों के हटने से लेन-देन शुल्क में 50-70% तक की कमी आ सकती है, जिसका सीधा लाभ छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को मिलेगा। ब्रिक्स देशों के बीच यात्रा करने वाले पर्यटकों को अब भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा ले जाने या अंतरराष्ट्रीय कार्ड्स पर ऊंचे शुल्क देने की जरूरत नहीं होगी। वे अपने मोबाइल वॉलेट के जरिए सीधे ‘ई-रुपया’ या ‘डिजिटल युआन’ में भुगतान कर सकेंगे।
आरबीआई का यह प्रस्ताव वैश्विक स्तर पर ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) की बहस को हवा देता है। हालांकि, भारतीय अधिकारियों का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी मुद्रा को हटाना नहीं, बल्कि भुगतान दक्षता में सुधार करना है।
फिर भी, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली सरकार ने ब्रिक्स देशों द्वारा अमेरिकी डॉलर को दरकिनार करने के किसी भी प्रयास पर कड़ी प्रतिक्रिया देने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने ब्रिक्स देशों पर 100% टैरिफ लगाने तक की बात कही है यदि वे डॉलर के खिलाफ कोई साझा मुद्रा लाते हैं। ऐसे में भारत का डिजिटल मुद्राओं को ‘लिंक’ करने का प्रस्ताव एक स्मार्ट बीच का रास्ता है—यह बिना किसी नई साझा मुद्रा बनाए, मौजूदा मुद्राओं को तकनीकी रूप से जोड़कर डॉलर पर निर्भरता को कम करता है।
एक साझा डिजिटल ढांचा बनाना जितना सरल सुनाई देता है, तकनीकी रूप से उतना ही जटिल है। ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों (भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, यूएई, ईरान आदि) के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अलग-अलग तकनीक पर आधारित हो सकते हैं। उन्हें एक ही मानक पर लाना एक बड़ी चुनौती है। सीमा पार लेन-देन में डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है। यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या एक देश दूसरे देश के लेन-देन डेटा तक पहुंच पाएगा? उदाहरण के लिए, यदि भारत और चीन के बीच व्यापार बहुत अधिक है, तो डिजिटल मुद्रा का प्रवाह एक ही दिशा में हो सकता है। इसे प्रबंधित करने के लिए तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) के नए नियमों की आवश्यकता होगी।
भारत की अध्यक्षता में होने वाला 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक वित्तीय भूगोल को बदलने की शक्ति रखता है। यदि आरबीआई का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक सहयोग का सबसे ठोस उदाहरण होगा। 2026 के अंत तक ब्रिक्स देशों के बीच एक छोटे स्तर पर ‘पायलट प्रोजेक्ट’ शुरू होने की उम्मीद है। ब्रिक्स के औपचारिक एजेंडे से पहले, भारत और यूएई या भारत और रूस जैसे देश अपनी डिजिटल मुद्राओं को द्विपक्षीय रूप से जोड़ने के लिए समझौते कर सकते हैं।
आरबीआई का प्रस्ताव केवल एक तकनीकी सुझाव नहीं है; यह एक नई वैश्विक व्यवस्था की आहट है जहाँ उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब केवल पश्चिमी प्रणालियों की “अनुयायी” नहीं, बल्कि “निर्माता” बनना चाहती हैं। यह प्रणाली अगर सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह वैश्विक वित्तीय इतिहास में 1944 के ‘ब्रेटन वुड्स’ सम्मेलन जितनी ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। डिजिटल मुद्राओं का यह जुड़ाव दुनिया को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाएगा जहाँ व्यापार भौगोलिक सीमाओं और पारंपरिक बैंकिंग की बाधाओं से मुक्त होगा।



