व्यक्ति विशेषस्‍वास्‍थ्‍य

मानवीय संवेदना, असीम धैर्य और मौन प्रेम की पराकाष्ठा: हरीश राणा के 13 वर्षीय संघर्ष और ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की हृदयविदारक गाथा

पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia): एक गरिमामय विदा

25 मार्च, 2026 की सुबह दक्षिण दिल्ली का ‘ग्रीन पार्क श्मशान घाट’ एक ऐसी विदाई का गवाह बना, जिसने न केवल चिकित्सा जगत को झकझोर दिया, बल्कि मानवीय इच्छाशक्ति की नई परिभाषा लिख दी। 13 वर्षों तक कोमा की गहन अंधेरी गलियों में भटकने के बाद, पूर्व इंजीनियरिंग छात्र हरीश राणा ने 24 मार्च को एम्स (AIIMS) में अंतिम सांस ली। वह भारत के कानूनी इतिहास में पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई। यह केवल एक मृत्यु की खबर नहीं है; यह एक ऐसा आईना है जो आधुनिक समाज की छोटी-छोटी शिकायतों, अवसाद और हार मान लेने की प्रवृत्ति को बड़ी निर्दयता से आईना दिखाता है।

साल 2013 की एक सामान्य शाम थी। हरीश राणा, जो एक महत्वाकांक्षी इंजीनियरिंग छात्र थे, अपने पीजी (PG) की चौथी मंजिल पर थे। एक आकस्मिक दुर्घटना हुई वह संतुलन खोकर नीचे गिर पड़े। उस गिरावट ने न केवल उनकी हड्डियों को तोड़ा, बल्कि उनके ‘ब्रेन स्टेम’ को ऐसी अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचाई कि उनके शरीर और चेतना का संपर्क हमेशा के लिए टूट गया। वह लड़का जिसके हाथों में कल भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाले नक्शे होने चाहिए थे, वह अचानक एक सफेद चादर के नीचे पाइपों और मशीनों के सहारे जीवित रह गया। 13 साल तक हरीश न देख सके, न बोल सके, न सुन सके और न ही अपने माता-पिता के स्पर्श को महसूस कर सके। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) कहा जाता है।

जब हम “परोपकार” या “त्याग” की बात करते हैं, तो अक्सर हम महान विभूतियों के उदाहरण देते हैं। लेकिन असली ‘महात्मा’ हरीश के माता-पिता हैं। सोचिए, 13 साल का समय कितना लंबा होता है। एक छोटा बच्चा 13 साल में किशोर हो जाता है, दुनिया बदल जाती है, तकनीक बदल जाती है, लेकिन इन माता-पिता के लिए समय उस बेड पर थमा हुआ था जहाँ उनका बेटा लेटा था।

हर सुबह इस उम्मीद में जागना कि “आज शायद वह उंगली हिलाएगा,” और हर रात उसी चुप्पी के साथ सो जाना यह किसी भी मानसिक प्रताड़ना से बड़ा था। कोमा में पड़े मरीज की देखभाल करना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है। उन्हें नहलाना, खिलाना, बिस्तर के घावों (Bedsores) से बचाना और संक्रमण से लड़ना। उन्होंने 13 साल तक न कोई त्यौहार मनाया, न किसी खुशी में शामिल हुए। उनका पूरा संसार उस एक कमरे में सिमट गया था। उनका प्रेम ‘सौदा’ नहीं था। उन्हें पता था कि उनका बेटा शायद कभी वापस न आए, फिर भी उन्होंने उसे ‘सांख्यिकी’ (Statistic) नहीं बनने दिया। वह उनके लिए उनका ‘हरीश’ ही रहा।

भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) हमेशा से एक विवादास्पद विषय रहा है। लेकिन हरीश के मामले में, जब डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि मस्तिष्क पूरी तरह मृत (Brain Dead) हो चुका है और केवल मशीनें दिल को धड़का रही हैं, तब एक कठिन निर्णय लिया गया।हरीश भारत के पहले ऐसे नागरिक बने जिन्हें ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का अधिकार मिला। इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्हें जहर दिया गया; इसका अर्थ था कि उन बाहरी कृत्रिम साधनों (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को धीरे-धीरे हटा लिया गया जो उनकी प्राकृतिक मृत्यु के मार्ग में बाधा थे। माता-पिता के लिए अपने हाथ से अपने बेटे की जीवन रक्षक प्रणाली हटवाना दुनिया का सबसे कठिन काम रहा होगा, लेकिन यह उनके बेटे को उस दर्दनाक कैद से मुक्त करने का एकमात्र तरीका था।

आज की पीढ़ी (Gen Z और Millennials) अक्सर छोटी-छोटी बातों पर “डिप्रेशन” और “हार” की बात करती है। हरीश राणा की कहानी हमें उन सभी समस्याओं को नए दृष्टिकोण से देखने पर मजबूर करती है

हमारी समस्याएं हरीश राणा की स्थिति सीख
बिजनेस फेल हो गया। उनके पास अपना करियर शुरू करने का मौका ही नहीं रहा। बिजनेस फिर खड़ा हो सकता है, जीवन नहीं।
एग्जाम में कम नंबर आए। वह अपनी डिग्री तक पूरी नहीं कर पाए। अंकों से ज्यादा आपका मानसिक स्वास्थ्य जरूरी है।
ब्रेकअप हो गया या किसी ने आलोचना की। वह 13 साल तक किसी से एक शब्द भी साझा नहीं कर पाए। संवाद और संबंध एक आशीर्वाद हैं।
जीवन बोरिंग (Boring) लग रहा है। उनका जीवन एक ही कमरे और एक ही बेड तक सीमित था। आपकी बोरियत किसी और का सपना हो सकती है।

यह कहानी हरीश की कम और उनके माता-पिता की ज्यादा है। समाज अक्सर सफलता की चकाचौंध को देखता है, लेकिन उन माता-पिता के दर्द को कोई नहीं देख पाता जो अपने बच्चों की ‘शादी के कार्ड’ छपवाने की उम्र में उनके ‘मेडिकल बिल’ भर रहे होते हैं। अपने माता-पिता का सम्मान करें। वे आपकी सफलताओं के लिए ही नहीं, बल्कि आपकी असफलताओं में भी आपके साथ खड़े रहते हैं। हरीश के माता-पिता ने दिखाया कि ‘प्यार’ का अर्थ केवल खुशियां बांटना नहीं, बल्कि साथ मिलकर ‘दुख’ को ढोना भी है।

हरीश राणा का जीवन 13 साल तक एक बिंदु पर स्थिर (Static) रहा। हम असफल होते हैं क्योंकि हम चलते हैं। गिरते वही हैं जो दौड़ते हैं। यदि आज आप असफल हुए हैं, तो खुश होइए। आपके पास कल सुबह फिर से शुरू करने का ‘मौका’ है। हरीश के पास वह ‘कल’ कभी नहीं आया। असली ताकत जिम में वजन उठाने में नहीं, बल्कि जीवन के कठिन समय में ‘उम्मीद’ का वजन उठाने में है।

25 मार्च 2026 की सुबह, जब हरीश राणा का पार्थिव शरीर अग्नि को समर्पित किया गया, तो वह केवल एक शरीर नहीं था। वह 13 साल का दर्द, 13 साल का इंतजार और 13 साल का अटूट प्रेम था जो धुएं के साथ आकाश में विलीन हो गया। हरीश की मृत्यु हमें यह सिखाती है कि जीवन बहुत छोटा और अनमोल है। इसे शिकायतों में मत गंवाओ। हरीश राणा अब उस दुनिया में हैं जहाँ कोई दर्द नहीं है, कोई मशीनें नहीं हैं और कोई चुप्पी नहीं है। उनके माता-पिता के अदम्य साहस को हमारा शत-शत नमन।

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