
2 अप्रैल, 2026 को भारतीय राजनीति के गलियारों में उस समय हलचल मच गई जब आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में अपने नेतृत्व ढांचे में एक चौंकाने वाला बदलाव किया। पार्टी ने अपने सबसे चर्चित और युवा चेहरे राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता (Deputy Leader) के पद से हटा दिया है। उनकी जगह पंजाब से राज्यसभा सांसद और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक अशोक मित्तल को नया उप-नेता नियुक्त किया गया है।
यह कदम केवल एक रूटीन फेरबदल नहीं माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को लिखे पत्र में यह भी अनुरोध किया है कि राघव चड्ढा को पार्टी के कोटे से बोलने का समय (Speaking Time) न दिया जाए। इस निर्देश ने उन अटकलों को हवा दे दी है कि चड्ढा और पार्टी आलाकमान के बीच सब कुछ ठीक नहीं है।
पार्टी ने आधिकारिक तौर पर राज्यसभा सचिवालय को पत्र भेजकर नेतृत्व परिवर्तन की सूचना दी है। अशोक मित्तल, जो 2022 से राज्यसभा सांसद हैं, अब उच्च सदन में पार्टी के विधायी कार्यों का समन्वय करेंगे। वे रक्षा और वित्त जैसी महत्वपूर्ण संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। सबसे विवादास्पद बिंदु चड्ढा के ‘स्पीकिंग स्लॉट’ को रोकना है। संसदीय नियमों के अनुसार, किसी दल को मिलने वाला समय उसके नेतृत्व द्वारा वितरित किया जाता है। चड्ढा को बोलने से रोकना उन्हें संसदीय पटल पर ‘साइलेंट’ (मौन) करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों और पार्टी सूत्रों के अनुसार, चड्ढा को हटाए जाने के पीछे कई “गंभीर असहमतियां” और “अनुशासनहीनता” के आरोप हैं हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य नेताओं को डिस्चार्ज (बड़ी राहत) किया था। जहाँ पूरी पार्टी जश्न मना रही थी, वहीं राघव चड्ढा ने न तो कोई सार्वजनिक बयान दिया और न ही सोशल मीडिया पर कोई बधाई संदेश पोस्ट किया।
रिपोर्टों के अनुसार, जेल से बाहर आने और कोर्ट से राहत मिलने के बाद चड्ढा ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से मुलाकात नहीं की। इसे नेतृत्व के प्रति ‘बेरुखी’ और ‘अहंकार’ के रूप में देखा गया। 2024 में जब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई थी, तब चड्ढा अपनी आंख की सर्जरी के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) में थे। पार्टी के भीतर एक वर्ग का मानना है कि उन्होंने संकट के समय पार्टी को अकेला छोड़ दिया और उनकी अनुपस्थिति बहुत लंबी थी।
एक समय में राघव चड्ढा को पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान का ‘सुपर सीएम’ या मुख्य सलाहकार माना जाता था। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि मान ने धीरे-धीरे अपना स्वतंत्र आधार मजबूत किया है और चड्ढा का हस्तक्षेप अब पंजाब इकाई में पसंद नहीं किया जा रहा है।
अशोक मित्तल का चयन पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है मित्तल की छवि एक गंभीर और विवादों से दूर रहने वाले नेता की है। एलपीयू (LPU) जैसे विशाल संस्थान को चलाने का उनका अनुभव पार्टी के संसदीय कार्यों में अनुशासन लाने में मदद कर सकता है। चड्ढा की ‘आक्रामक’ राजनीति के मुकाबले मित्तल का ‘सौम्य’ व्यवहार सदन में अन्य दलों के साथ समन्वय बनाने में सहायक हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि पद से हटाए जाने से ठीक पहले तक चड्ढा संसद में सबसे सक्रिय सांसदों में से एक थे। उन्होंने मार्च 2026 में ही कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए थे इसे कानूनी अधिकार बनाने की उनकी मांग ने वैश्विक सुर्खियां बटोरी थीं। उन्होंने देश की 35 करोड़ महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड्स और शिक्षा के अधिकार पर जोरदार भाषण दिया था। उन्होंने पंचायतों में महिलाओं के स्थान पर उनके पतियों द्वारा सत्ता चलाने की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी।
बीजेपी ने इस बदलाव को ‘केजरीवाल की तानाशाही’ करार दिया है। दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि पहले स्वाति मालीवाल और अब राघव चड्ढा जो भी केजरीवाल के भ्रष्टाचार के खिलाफ या उनके ‘अराजक’ रवैये से दूरी बनाता है, उसे किनारे लगा दिया जाता है। संजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इसे एक ‘रूटीन प्रक्रिया’ बताया है और कहा है कि पार्टी में जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं। उन्होंने बीजेपी के दावों को खारिज करते हुए कहा कि चड्ढा पार्टी का हिस्सा बने रहेंगे।
बाजार में इस बात की भी चर्चा है कि क्या राघव चड्ढा कोई नया राजनीतिक रास्ता तलाश रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके ‘बीजेपी में शामिल होने’ की अफवाहें तेज हैं, हालांकि चड्ढा या उनके करीबियों ने अभी तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। चड्ढा को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की ‘स्टार कैंपेनर’ सूची से भी हटा दिया गया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि वे फिलहाल ‘आउट ऑफ फेवर’ हैं।
राघव चड्ढा का हटाया जाना आम आदमी पार्टी के भीतर चल रहे ‘पावर स्ट्रगल’ का एक बड़ा हिस्सा है। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से शुरू होकर पार्टी के सबसे कम उम्र के कोषाध्यक्ष और फिर राज्यसभा में धाक जमाने वाले चड्ढा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। क्या वे वापस पार्टी के ‘इनर सर्कल’ में जगह बना पाएंगे, या यह उनके ‘स्वतंत्र राजनीतिक करियर’ की शुरुआत है? यह आने वाले कुछ महीने तय करेंगे।



