
1 अप्रैल, 2026 का दिन आंध्र प्रदेश के 5 करोड़ नागरिकों के लिए एक नए युग की शुरुआत लेकर आया। लोकसभा ने ‘आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत से पारित कर दिया, जिससे अमरावती को आधिकारिक और वैधानिक रूप से राज्य की एकमात्र और स्थायी राजधानी के रूप में मान्यता मिल गई है। अगले ही दिन, 2 अप्रैल 2026 को राज्यसभा ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी। यह विधायी कदम पिछले एक दशक से चल रही राजनीतिक अनिश्चितता, कानूनी लड़ाइयों और ‘तीन राजधानियों’ (Three-Capital Model) के विवाद को हमेशा के लिए समाप्त करता है।
यह विधेयक स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला ऐसा उदाहरण है, जहाँ संसद ने एक विशिष्ट शहर को किसी राज्य की स्थायी राजधानी घोषित करने के लिए कानून पारित किया है। यह विधेयक ‘आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014’ की धारा 5 में बदलाव करता है। मूल अधिनियम में हैदराबाद को 10 साल के लिए ‘संयुक्त राजधानी’ बनाया गया था। नए संशोधन के बाद अब ‘अमरावती’ का नाम आधिकारिक तौर पर अधिनियम में दर्ज हो गया है।
यह कानून 2 जून, 2024 से प्रभावी माना जाएगा। यह वही तारीख है जब हैदराबाद का संयुक्त राजधानी के रूप में कार्यकाल समाप्त हुआ था। इस विधायी सुरक्षा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब कोई भी भावी राज्य सरकार केवल एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) या साधारण गजट अधिसूचना के जरिए राजधानी को बदलने या विभाजित करने का प्रयास नहीं कर सकेगी।
लोकसभा में इस विधेयक पर हुई बहस के दौरान भारतीय राजनीति का एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जहाँ सत्तापक्ष और मुख्य विपक्षी दल एक ही सुर में नजर आए। टीडीपी (TDP) के सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों ने इसे मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के विजन की जीत बताया। भाजपा सदस्य सी.एम. रमेश ने ‘तीन राजधानियों’ के पिछले मॉडल को “तर्कहीन” करार दिया।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने विधेयक का पूर्ण समर्थन किया। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कहा, “अमरावती को बेंगलुरु या हैदराबाद की तरह विकसित होना चाहिए।” हालांकि, उन्होंने आंध्र को ‘विशेष राज्य के दर्जे’ की अपनी पुरानी मांग भी दोहराई। जगन मोहन रेड्डी की पार्टी YSRCP ने इस विधेयक का विरोध किया। उनके सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया, यह कहते हुए कि यह निर्णय विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अमरावती का निर्माण एक अनूठे मॉडल पर आधारित है, जिसे दुनिया भर के शहरी नियोजक (Urban Planners) एक मिसाल मानते हैं।अमरावती के निर्माण के लिए लगभग 33,000 एकड़ भूमि वहां के किसानों ने स्वेच्छा से ‘लैंड पूलिंग’ योजना के तहत दी थी। यह विधेयक उन हजारों किसानों के बलिदान और विश्वास को वैधानिक सम्मान देता है। अमरावती को कृष्णा नदी के किनारे एक ‘स्मार्ट और टिकाऊ’ प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें विधानसभा, सचिवालय और उच्च न्यायालय के लिए विशाल और आधुनिक परिसर शामिल हैं।
राजधानी के मुद्दे पर स्पष्टता आने का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों में राजधानी विवाद के कारण कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने आंध्र से मुंह मोड़ लिया था। अब वैधानिक मान्यता मिलने से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों (जैसे वर्ल्ड बैंक, एडीबी) का भरोसा बहाल होगा।
अनुमान है कि अमरावती प्रोजेक्ट के पुनरुद्धार से अगले 5 वर्षों में बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में ₹58,000 करोड़ का निवेश होगा, जिससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रोजगार पैदा होंगे। मुख्यमंत्री नायडू ने हाल ही में अमरावती को ‘क्वांटम हार्डवेयर हब’ के रूप में विकसित करने की योजना साझा की है, जो इसे भारत का अगला तकनीकी पावरहाउस बना सकता है।
जहाँ अधिकांश लोग इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, वहीं कुछ चिंताएं भी हैं आलोचकों का तर्क है कि विकास को एक ही केंद्र (अमरावती) में सीमित करने से विशाखापत्तनम (उत्तर आंध्र) और कुरनूल (रायलासीमा) जैसे क्षेत्रों की उपेक्षा हो सकती है। एक नई राजधानी का निर्माण अत्यंत खर्चीला है। केंद्र सरकार ने विशेष वित्तीय पैकेज का आश्वासन दिया है, लेकिन राज्य के बढ़ते कर्ज को देखते हुए इसके समय पर पूरा होने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक पर बहस का समापन करते हुए इसे “ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण” बताया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह उन 5 करोड़ लोगों के गौरव की बहाली है जिन्होंने 2014 के विभाजन के बाद एक स्थायी पहचान की प्रतीक्षा की थी।
अमरावती अब केवल एक शहर नहीं, बल्कि आंध्र प्रदेश के पुनरुत्थान का प्रतीक है। 1 अप्रैल 2026 की यह कानूनी मान्यता राज्य के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगी, जो आंध्र को ‘विकसित भारत’ के विजन में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करेगी।



