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थार के मरुस्थल में ‘कुदरत का कहर’: जैसलमेर और बीकानेर में ऐतिहासिक ओलावृष्टि रेगिस्तान की ‘सफेद चादर’ और किसानों की ‘कमाई’ की बर्बादी

कृषि संकट और मुआवजे की मांग

4 अप्रैल, 2026 की सुबह जब राजस्थान के जैसलमेर और बीकानेर जिलों के ग्रामीण इलाकों में सूरज उगा, तो नजारा किसी मरुस्थल जैसा नहीं, बल्कि कश्मीर की किसी बर्फीली घाटी जैसा था। शुक्रवार शाम (3 अप्रैल) को आए भीषण चक्रवाती अंधड़ और ऐतिहासिक ओलावृष्टि ने थार के रेगिस्तान को ओलों की सफेद चादर से पूरी तरह ढंक दिया। जैसलमेर के नाचना (Nachna), मोहनगढ़ और बीकानेर के खाजूवाला क्षेत्रों में ओलों की परत इतनी मोटी थी कि गाड़ियां और सड़कें बर्फ में दबी नजर आईं।

यह दृश्य सोशल मीडिया पर ‘खूबसूरत’ और ‘अदभुत’ लग सकता है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए यह उनकी साल भर की मेहनत की ‘शोकसभा’ जैसा है। जीरा, ईसबगोल और चने जैसी कीमती फसलें, जिन्हें पककर कटने में महज कुछ ही दिन बचे थे, इस ओलावृष्टि ने उन्हें मिट्टी में मिला दिया है।

शुक्रवार दोपहर तक जैसलमेर में भीषण गर्मी का अहसास हो रहा था, लेकिन शाम 4:30 बजे के बाद अचानक क्षितिज पर गहरे काले और पीले बादल उमड़ने लगे। करीब 60 से 70 किमी/घंटा की रफ्तार से चली धूल भरी आंधियों ने दृश्यता (Visibility) को शून्य कर दिया। इसके तुरंत बाद बादलों की गर्जना और बिजली की कड़कड़ाहट के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हुई।

नाचना कस्बे और आसपास के गांवों में करीब 45 मिनट तक लगातार ओले गिरे। ओलों का आकार ‘गोल्फ की गेंद’ जितना बड़ा बताया जा रहा है। ओलों की तीव्रता इतनी अधिक थी कि टीलों के बीच के निचले इलाकों (धोरे) में ओले कई फीट तक जमा हो गए। नाचना से भारेवाला जाने वाली सड़क पर ओलों की सफेद परत बिछ गई, जिससे यातायात पूरी तरह ठप हो गया। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के 70 वर्षों में मरुस्थल में अप्रैल के महीने में ऐसी ओलावृष्टि कभी नहीं देखी।

पश्चिमी राजस्थान में जीरे को ‘काला सोना’ (Black Gold) कहा जाता है क्योंकि इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग और ऊंचे भाव होते हैं। जैसलमेर का नाचना और मोहनगढ़ बेल्ट नहरी सिंचाई के कारण जीरे का गढ़ माना जाता है। फसल इस समय पूरी तरह पक चुकी थी और कुछ किसान कटाई शुरू कर चुके थे। ओलों की मार से जीरे के पौधे टूटकर जमीन पर गिर गए हैं और दाने पूरी तरह झड़ गए हैं। नमी के कारण अब बचा हुआ जीरा भी काला पड़ जाएगा, जिससे इसकी बाजार कीमत कौड़ियों के भाव हो जाएगी।

ईसबगोल की खेती में सबसे बड़ा जोखिम बारिश ही होता है। यदि ईसबगोल के दाने पर पानी की एक बूंद भी पड़ जाए, तो वह फूल जाता है और बेकार हो जाता है। जैसलमेर और बीकानेर में हजारों हेक्टेयर में खड़ी ईसबगोल की फसल इस ओलावृष्टि में 100% नष्ट हो गई है। बीकानेर के सीमावर्ती इलाकों में सरसों की कटाई चल रही थी। खेतों में काटकर रखी गई सरसों की ढेरियां ओलों और बारिश में भीग गई हैं, जिससे दाने अंकुरित होने या सड़ने का खतरा पैदा हो गया है।

केवल जैसलमेर ही नहीं, बल्कि राजस्थान के पूरे पश्चिमी बेल्ट में मौसम का मिजाज हिंसक रहा:

जिला प्रभावित क्षेत्र क्षति का स्वरूप
जैसलमेर नाचना, नोख, सुल्ताना, मोहनगढ़ भारी ओले (2-3 इंच परत), जीरा और ईसबगोल पूरी तरह नष्ट।
बीकानेर खाजूवाला, पूगल, दंतौर, बज्जू तेज बारिश और ओले, सरसों और चने की फसल को 70% नुकसान।
बाड़मेर शिव, गडरारोड, चौहटन अंधड़ और मध्यम बारिश, अनार के बगीचों को नुकसान।
श्रीगंगानगर अनूपगढ़, घड़साना गेहूं की खड़ी फसल गिरने (Lodging) से दाना कमजोर होने का डर।

किसानों के लिए यह आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाली आपदा है। अधिकांश किसानों ने साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदी थी। भारतीय किसान संघ और अन्य संगठनों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि 24 घंटे के भीतर ‘विशेष गिरदावरी’ के आदेश दिए जाएं। चूंकि फसल कटाई के करीब थी, इसलिए नुकसान का आकलन करना आसान है।

‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के तहत ओलावृष्टि को कवर किया जाता है, लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल है। किसानों को 72 घंटों के भीतर व्यक्तिगत रूप से सूचना देनी होती है। इंटरनेट और बिजली ठप होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। जैसलमेर जिला कलेक्टर ने राजस्व विभाग की टीमों को फील्ड में तैनात किया है। शुरुआती अनुमानों के अनुसार, केवल जैसलमेर जिले में ही ₹500 करोड़ से अधिक की फसल बर्बाद होने की आशंका है।

मौसम विभाग (IMD) ने इसे ‘असामान्य मौसमी घटना’ करार दिया है। भूमध्य सागर से उठी नमी वाली हवाएं (WD) जब राजस्थान के गर्म थार मरुस्थल के ऊपर पहुँचती हैं, तो ‘कन्वेक्शन’ (Convection) की प्रक्रिया तेज हो जाती है। गर्म हवा तेजी से ऊपर उठती है और ऊपर की ठंडी हवा के संपर्क में आकर ओलों का निर्माण करती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि थार मरुस्थल का मौसम तेजी से बदल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मरुस्थल में अधिक बारिश और बेमौसमी ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ी हैं। यह ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर है, जहाँ शुष्क क्षेत्र अब आर्द्र (Humid) और चरम मौसम की ओर बढ़ रहे हैं।

ओलावृष्टि और अंधड़ ने केवल फसलों को ही नहीं, बल्कि जनजीवन को भी बुरी तरह प्रभावित किया है अंधड़ के कारण जैसलमेर और बीकानेर के ग्रामीण इलाकों में 500 से अधिक बिजली के खंभे और कई ट्रांसफार्मर गिर गए हैं। नाचना क्षेत्र में पिछले 36 घंटों से बिजली गुल है। खुले में चरने गए मवेशियों (भेड़, बकरी और ऊंट) को भारी ओलों से चोटें आई हैं। कुछ छोटे मेमनों के मरने की भी अपुष्ट खबरें हैं। कई गांवों में गरीबों के झोपड़े और कच्चे मकानों की छतें (टीन शेड और केलू) ओलों की मार से टूट गई हैं।

जैसलमेर में बिछी ओलों की यह सफेद चादर मरुधरा की ‘सफेद त्रासदी’ है। जहाँ पर्यटक और फोटोग्राफर इन तस्वीरों को देखकर उत्साहित हैं, वहीं थार का किसान अपने बर्बाद हो चुके खेतों के किनारे बैठकर आंसू बहा रहा है। जीरे और ईसबगोल की फसल ही यहाँ के किसानों की साल भर की आय का एकमात्र साधन है।

अब सबकी नजरें राज्य और केंद्र सरकार पर हैं। क्या सरकार ‘विशेष राहत पैकेज’ घोषित करेगी? क्या बीमा कंपनियां तकनीकी खामियों का बहाना बनाए बिना किसानों को मुआवजा देंगी? 4 अप्रैल 2026 की यह घटना भविष्य के लिए एक चेतावनी है कि बदलते मौसम के साथ तालमेल बिठाने के लिए अब खेती की तकनीकों और बीमा प्रणालियों में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है।

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