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भोजशाला फैसला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने परिसर को घोषित किया ‘हिंदू मंदिर’

मंदिर, मस्जिद और कानून: भोजशाला विवाद में आए ऐतिहासिक मोड़

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने 15 मई, 2026 को धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को लेकर एक युगान्तरकारी निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ल और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने ऐतिहासिक साक्ष्यों, साहित्यिक संदर्भों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर इस परिसर को माता वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर घोषित किया है। इस फैसले ने न केवल 2003 से चली आ रही ‘साझा पूजा’ की व्यवस्था को समाप्त कर दिया है, बल्कि भारत के सांस्कृतिक और कानूनी इतिहास में एक नया अध्याय भी जोड़ दिया है।

न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भोजशाला का मूल धार्मिक स्वरूप एक मंदिर का है। इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख तर्क दिए गए न्यायालय ने माना कि इस स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। इसे परमार वंश के राजा भोज द्वारा 1034 ईस्वी में संस्कृत अध्ययन केंद्र और सरस्वती मंदिर के रूप में स्थापित किया गया था।

जुलाई 2024 में सौंपी गई एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट इस फैसले का मुख्य आधार बनी। सर्वेक्षण के दौरान खुदाई में गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह, हनुमान और सरस्वती जैसी हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और नक्काशीदार स्तंभ मिले। मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि यह एक वक्फ संपत्ति है, जिसे न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस्लामी कानून के अनुसार वक्फ केवल उस भूमि पर हो सकता है जिसका मालिक मुस्लिम शासक हो। चूंकि यह भूमि पहले से ही हिंदू देवता की थी, इसलिए यहाँ कोई वैध वक्फ कभी नहीं बना। न्यायालय ने एएसआई के 7 अप्रैल, 2003 के उस परिपत्र (Circular) को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति थी। अब यहाँ केवल हिंदू पूजा अनुष्ठान संपन्न होंगे।

भोजशाला विवाद का एक भावनात्मक और महत्वपूर्ण हिस्सा माता वाग्देवी की वह प्रतिमा है, जो वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह लंदन से इस प्रतिमा को वापस लाने के लिए प्राप्त आवेदनों को एक ‘प्रतिनिधित्व’ (Representation) के रूप में स्वीकार करे और इसे वापस लाकर भोजशाला परिसर में पुनः स्थापित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करे। सफेद संगमरमर से बनी यह प्रतिमा राजा भोज के काल की उत्कृष्ट कलाकृति मानी जाती है, जिसे ब्रिटिश काल के दौरान भारत से ले जाया गया था।

न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी निर्देश दिए हैं खंडपीठ ने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष (जैसे मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) मस्जिद निर्माण के लिए धार जिले में कहीं और वैकल्पिक भूमि की मांग करता है, तो राज्य सरकार को कानून के अनुसार उस पर विचार करना चाहिए। मुस्लिम पक्ष के वकील अशर वारसी ने इस फैसले पर असंतोष व्यक्त करते हुए इसे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में चुनौती देने की घोषणा की है। उन्होंने एएसआई की रिपोर्ट को ‘त्रुटिपूर्ण’ बताया है।

विवरण सांख्यिकी / जानकारी
फैसले की तिथि 15 मई, 2026
मूल स्वरूप 11वीं शताब्दी का संस्कृत केंद्र और सरस्वती मंदिर
एएसआई रिपोर्ट 2000+ पन्ने, हिंदू और जैन प्रतिमाओं के प्रमाण
पूजा का अधिकार केवल हिंदू समुदाय को (मंगलवार/नियमित)
नमाज की स्थिति 2003 की अनुमति रद्द, वैकल्पिक भूमि का सुझाव
प्रतिमा की स्थिति लंदन से वापसी के लिए सरकार को विचार करने का आदेश
सुरक्षा धार और आसपास के क्षेत्रों में धारा 144 और कड़ा पहरा

सुनवाई के दौरान जैन समुदाय ने भी कुछ प्रतिमाओं के आधार पर इस स्थल को जैन मंदिर बताया था। न्यायालय ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि जैन धर्म ऐतिहासिक रूप से हिंदू धर्म की एक शाखा माना गया है। सरस्वती (विद्या की देवी) की पूजा जैन परंपरा में भी होती है, इसलिए वहां ‘पद्मासन’ में बैठी प्रतिमाओं का होना इसे हिंदू मंदिर होने से अलग नहीं करता।

भोजशाला का यह फैसला अयोध्या (राम जन्मभूमि) के फैसले की तर्ज पर ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्राथमिकता देता है। जहाँ एक ओर हिंदू पक्ष इसे ‘सांस्कृतिक पुनरुद्धार’ और ‘ऐतिहासिक भूल का सुधार’ मान रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने से यह कानूनी लड़ाई अभी और लंबी खिंच सकती है। फिलहाल, धार जिला प्रशासन और पुलिस हाई अलर्ट पर है ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे।

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