
ग्रामीण भारत के सामाजिक, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के इतिहास में एक युगांतरकारी अध्याय जुड़ गया है। केंद्र सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission – JJM) के तहत हर ग्रामीण घर तक नल से शुद्ध और नियमित पेयजल पहुंचाने के राष्ट्रीय अभियान में उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा और निर्णायक योगदानकर्ता राज्य बनकर उभरा है।
राज्य सरकार के नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग तथा केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने अब तक 2.36 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों को उनके घर के आंगन में क्रियाशील नल जल कनेक्शन (Functional Household Tap Connections – FHTC) से जोड़ दिया है।
इस भगीरथ प्रयास को धरातल पर उतारने के लिए उत्तर प्रदेश के 75 जिलों के 97,000 से अधिक गांवों में 5 लाख किलोमीटर (5,00,000+ किमी) से अधिक लंबी जल वितरण पाइपलाइन का विशाल जाल बिछाया गया है। यह पाइपलाइन नेटवर्क लंबाई के पैमाने पर पृथ्वी की भूमध्य रेखा (लगभग 40,075 किमी) के 12 से अधिक चक्कर लगाने के बराबर है।
भारत की कुल ग्रामीण आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश की सीमाओं के भीतर निवास करता है। जब 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ₹3.60 लाख करोड़ के राष्ट्रीय जल जीवन मिशन की घोषणा की थी, तब देश के ग्रामीण इलाकों में केवल 16.7% घरों में नल का पानी था। उस समय उत्तर प्रदेश की स्थिति देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिनी जाती थी देश के कुल 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 2.66 करोड़ परिवार (लगभग 14% हिस्सा) अकेले उत्तर प्रदेश में हैं। यदि उत्तर प्रदेश की रफ्तार धीमी रहती, तो भारत कभी भी मार्च 2025 तक 15.54 करोड़ परिवारों (80.29%) तक पहुंचने का कीर्तिमान स्थापित नहीं कर सकता था।
उत्तर प्रदेश का भूगोल एक समान नहीं है। जहां एक ओर गंगा, यमुना और घाघरा के मैदानी इलाकों में पानी का स्तर ऊंचा है लेकिन वहां आर्सेनिक और आयरन का प्रदूषण था, वहीं दूसरी ओर बुंदेलखंड का भूभाग कठोर ग्रेनाइट चट्टानों से बना है जहां भूजल स्तर 300 से 400 फीट नीचे सूख चुका था। सोनभद्र और मिर्जापुर जैसे विंध्य क्षेत्रों में पहाड़ियों पर बस्तियां बसी थीं जहां पारंपरिक पाइपलाइन ले जाना इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी चुनौती थी।
उत्तर प्रदेश के जल जीवन मिशन की सबसे गौरवमयी और मानवीय उपलब्धि बुंदेलखंड (झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट) और विंध्य (मिर्जापुर, सोनभद्र) के उन दुर्गम अंचलों में देखने को मिली है, जहां पानी की कमी के कारण पलायन, भुखमरी और सामाजिक संकट आम बात थी बुंदेलखंड में एक पुरानी कहावत प्रचलित थी ‘गगरी फूटे पर गगरी का पानी न छूटे’, जहां महिलाओं को सिर पर 3-3 मटके रखकर 4 से 5 किलोमीटर दूर पथरीले रास्तों पर पानी की तलाश में जाना पड़ता था। राज्य सरकार ने इस क्षेत्र में भूजल (Groundwater) पर निर्भर रहने के बजाय बांधों और नदियों (जैसे बेतवा, केन, यमुना और स्थानीय जलाशयों) के सतह जल का उपयोग करने की रणनीति बनाई।
महोबा, ललितपुर और झांसी जैसे जिलों में बड़े-बड़े इंटेक वेल (Intake Wells) और बहु-ग्रामीण जल आपूर्ति संयंत्र (Multi-Village Schemes) स्थापित किए गए। आज बुंदेलखंड के अधिकांश गांवों में 95% से 100% घरों में नलों से 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी पहुंच रहा है।
मिर्जापुर और सोनभद्र के घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों पर बसे आदिवासी मजरों तक पानी पहुंचाने के लिए ‘सोलर पावर्ड ड्यूल वाटर पंपिंग सिस्टम’ लागू किए गए। इससे बिजली न होने पर भी सौर ऊर्जा से टंकियों में पानी भरा जाता है और गुरुत्वाकर्षण (Gravity Flow) के जरिए घरों के नलों तक चौबीसों घंटे पानी पहुंचता है।
पाइपलाइन नेटवर्क में जंग-रोधी एचडीपीई और डीआई पाइपों का उपयोग किया गया है ताकि पानी की बर्बादी और रिसाव (Leakage) नगण्य रहे। लखनऊ में स्थापित राज्य स्तरीय कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से हजारों गांवों की जलापूर्ति की लाइव मॉनिटरिंग की जाती है। यदि किसी गांव की मुख्य पाइपलाइन में दबाव कम होता है या फ्लोराइड/क्लोरीन की मात्रा असंतुलित होती है, तो कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत अलर्ट जारी हो जाता है।
पेयजल केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की पहली रक्षा पंक्ति है। उत्तर प्रदेश के कई इलाके दशकों से दूषित जल के कारण जानलेवा बीमारियों के गढ़ बने हुए थे पूर्वी उत्तर प्रदेश (गोरखपुर, कुशीनगर, बस्ती, देवरिया, सिद्धार्थनगर) में दशकों तक जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के कारण हर साल हजारों मासूम बच्चों की जान जाती थी। इसका मुख्य कारण उथले हैंडपंपों (Shallow Handpumps) से निकलने वाला दूषित पानी था। जल जीवन मिशन के तहत गहरे बोरवेल और शुद्ध नल का पानी पहुंचने के बाद इस क्षेत्र में इंसेफेलाइटिस के मामलों में 95% से अधिक की ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई है।
गंगा के मैदानी जिलों में आर्सेनिक और बुंदेलखंड में फ्लोराइड की विषाक्तता से लोगों के दांत पीले पड़ जाते थे और हड्डियां कमजोर हो जाती थीं। मिशन के तहत वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में उन्नत डि-फ्लोराइडेशन और आर्सेनिक रिमूवल यूनिट्स लगाकर शुद्ध जल उपलब्ध कराया गया है।
जल जीवन मिशन ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में एक मूक सामाजिक क्रांति को जन्म दिया है, जिसका केंद्र बिंदु गांव की महिलाएं हैं
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों की 5 लाख से अधिक ग्रामीण महिलाओं को ‘जल सखी’ के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। वे ‘फील्ड टेस्ट किट’ (FTK) लेकर गांव के हर नल, स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र के पानी की 12 मानकों (पीएच, टर्बिडिटी, क्लोराइड, बैक्टीरिया आदि) पर नियमित जांच करती हैं और डेटा को मोबाइल ऐप पर दर्ज करती हैं।
घर में नल लगने से महिलाओं का प्रतिदिन का औसतन 3 से 4 घंटा बच रहा है। इस समय का सदुपयोग महिलाएं सिलाई, डेयरी, कुटीर उद्योग और बच्चों की शिक्षा में कर रही हैं। साथ ही, पानी भरने के काम में जुटी रहने वाली ग्रामीण बेटियों की स्कूल ड्रॉपआउट दर में भारी गिरावट आई है।
जल जीवन मिशन केवल पाइपलाइन बिछाने का सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसे ‘जन आंदोलन’ (Jan Andolan) के रूप में तैयार किया गया है ताकि सरकार के हटने के बाद भी गांव अपनी जलापूर्ति स्वयं संभाल सकें प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक जल समिति का गठन किया गया है, जिसमें 50% सदस्य अनिवार्य रूप से महिलाएं हैं। यह समिति गांव में जल आपूर्ति का समय, जल शुल्क (वाटर टैरिफ) का संग्रह और सामान्य टूट-फूट की देखरेख करती है।
राज्य सरकार ने हर ग्राम पंचायत से युवाओं को प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, मोटर मैकेनिक और फिटर के रूप में कौशल विकास मिशन के तहत प्रशिक्षित किया है, ताकि नल या मोटर खराब होने पर बाहरी मिस्त्री पर निर्भर न रहना पड़े और 24 घंटे के भीतर गांव स्तर पर ही मरम्मत हो सके।
उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन की सफलता केवल 2.36 करोड़ नलों का सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े राज्य के करोड़ों गरीब, वंचित और ग्रामीण नागरिकों के जीवन में सम्मान, स्वास्थ्य और सुविधा का एक नया सूर्योदय है।
अगस्त 2019 में जहां देश का केवल 16.7% ग्रामीण हिस्सा नल के जल से आच्छादित था, वहीं मार्च 2025 तक 80.29% और 2026 में 2.36 करोड़ परिवारों के साथ उत्तर प्रदेश का इस मुकाम पर पहुंचना यह सिद्ध करता है कि दृढ़ प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी डिजिटल निगरानी और जनसहभागिता से किसी भी विशालकाय भौगोलिक चुनौती को परास्त किया जा सकता है।
5 लाख किलोमीटर से अधिक लंबी यह पाइपलाइन केवल जल की धारा नहीं बहा रही, बल्कि यह बीमारियों से मुक्ति, महिलाओं की आत्मनिर्भरता और ‘विकसित उत्तर प्रदेश से विकसित भारत’ के संकल्प को सींचने वाली जीवन-धारा बन चुकी है।



