
दक्षिण भारत में सामाजिक क्रांति, आत्म-सम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) और सामाजिक न्याय की आधारशिला रखने वाले महान विचारक तंथई पेरियार ई.वी. रामासामी की 147वीं जयंती के पावन अवसर पर तमिलनाडु भर में ‘सामाजिक न्याय दिवस’ (Social Justice Day) पूरी गरिमा, वैचारिक प्रतिबद्धता और जन-उत्साह के साथ मनाया गया। चेन्नई के सिम्प्टन स्थित ऐतिहासिक पेरियार प्रतिमा स्थल पर आयोजित मुख्य राजकीय समारोह में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने तंथई पेरियार की विशाल प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित किए और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
इसके उपरांत, फोर्ट सेंट जॉर्ज स्थित राज्य सचिवालय के मुख्य प्रांगण में एक भव्य और गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री विजय ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), विभिन्न विभागों के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, सचिवालय कर्मियों और बड़ी संख्या में उपस्थित नागरिकों को ‘सामाजिक न्याय दिवस की आधिकारिक शपथ’ (Social Justice Day Pledge) दिलाई।
राज्य सचिवालय के लॉन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने माइक संभालकर स्वयं शपथ की पंक्तियों का वाचन किया, जिसे उपस्थित सैकड़ों अधिकारियों और कर्मचारियों ने दोहराया।
मुख्यमंत्री विजय ने दृढ़ स्वर में शपथ दिलाते हुए कहा:
“मैं अपने जीवन के मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इस पावन और प्रेमपूर्ण विचार का पालन करूंगा कि ‘जन्म से सभी प्राणी समान हैं’ (All beings are equal by birth), तथा इस सदाचारी सिद्धांत को पूर्ण निष्ठा से अंगीकार करूंगा कि ‘सभी स्थान एक हैं, और सभी लोग मेरे अपने स्वजन हैं’ (All places are one, all people are my kin)!
मेरे सभी कार्य, विचार और दैनिक आचरण एक ऐसे व्यक्तित्व के अनुरूप होंगे जो तर्कवाद (Rationalism), वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीय करुणा से ओत-प्रोत हो! मैं स्वयं को समानता, बंधुत्व और समाजवाद के शाश्वत सिद्धांतों के प्रति समर्पित करता हूं!
मैं अपने हृदय में सदैव मानवता और मानव-प्रेम की अगाध भावना को संजोकर रखूंगा। आज के इस ऐतिहासिक और पावन दिन पर, मैं एक ऐसे समतामूलक, प्रगतिशील और न्यायप्रिय समाज के निर्माण का दृढ़ संकल्प लेता हूं जिसकी सुदृढ़ नींव केवल और केवल सामाजिक न्याय पर टिकी हो!”
शपथ ग्रहण के उपरांत मुख्यमंत्री ने उपस्थित अधिकारियों से कहा कि यह शपथ केवल एक औपचारिक पाठ नहीं है, बल्कि सरकारी फाइलों के निपटारे, लोक-कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और आम जनता से संवाद के दौरान इस शपथ का भाव अधिकारियों के आचरण में स्पष्ट दिखना चाहिए।
तंथई पेरियार ई.वी. रामासामी का जीवन भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक सुधार और मानवीय गरिमा की बहाली का सबसे सशक्त और निर्भीक अध्याय है। 17 सितंबर 1879 को इरोड के एक संपन्न परिवार में जन्मे पेरियार ने अपने जीवन के सात दशकों से अधिक समय को रूढ़िवादिता, जाति व्यवस्था, धार्मिक पाखंड और सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्ष में झोंक दिया पेरियार ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि यदि किसी समाज में करोड़ों इंसानों को जन्म के आधार पर नीचा समझा जाता है, तो वहां राजनीतिक स्वतंत्रता (आजादी) केवल कुछ उच्च वर्गों के विशेषाधिकारों का संरक्षण बनकर रह जाएगी। उन्होंने कहा था कि हर इंसान को जीने के लिए सबसे पहले ‘आत्म-सम्मान’ (Self-Respect) की जरूरत है। इसी सोच के तहत 1925 में उन्होंने आत्म-सम्मान आंदोलन की नींव रखी, जिसने आम जनता को सिर उठाकर जीने का हौसला दिया।
मई 1925 में पेरियार ने तमिल साप्ताहिक समाचार पत्र ‘कुदी अरासु’ (The Republic) शुरू किया। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने दुनिया भर के समाजवादी और वैज्ञानिक विचारों का तमिल में अनुवाद किया। उन्होंने रूस की सामाजिक क्रांति, बर्ट्रेंड रसेल के तर्कवादी दर्शन और महिला अधिकारों के पश्चिमी आंदोलनों को तमिलनाडु के गांव-गांव तक पहुंचाया।
पेरियार ने समाज में पुरोहितों, बिचौलियों, वैदिक कर्मकांडों और भारी दहेज प्रथा के बिना होने वाले ‘स्वयं-मर्यादा विवाह’ (सुयमरियाधै थिरुमणम) का प्रचलन शुरू किया। इन विवाहों में केवल दोनों पक्षों की आपसी सहमति, समानता की प्रतिज्ञा और जीवन भर बराबरी के साथी के रूप में रहने का संकल्प होता था। बाद में 1967 में अन्नादुरै की सरकार ने इस विवाह पद्धति को कानूनी मान्यता प्रदान की थी।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर की तरह ही पेरियार का मानना था कि किसी समाज की प्रगति का पैमाना वहां की महिलाओं की स्थिति से मापा जाना चाहिए। 1920 और 30 के दशक में, जब समाज महिलाओं की शिक्षा के खिलाफ था, तब पेरियार ने महिलाओं के संपत्ति के अधिकार, गर्भनिरोधक के उपयोग के अधिकार, शिक्षा और राजनीति में समान भागीदारी की वकालत की। 1938 में तमिलनाडु महिला सम्मेलन में महिलाओं ने ही उन्हें श्रद्धा से ‘पेरियार’ (महान व्यक्ति) की उपाधि से नवाजा था।
संत तिरुवल्लुवर ने दो हजार वर्ष पूर्व घोषित किया था कि संसार के सभी प्राणी जन्म से पूर्ण समान हैं; केवल उनके द्वारा किए गए कर्मों और गुणों की भिन्नता ही उनके कार्य को परिभाषित करती है, कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता। मुख्यमंत्री विजय ने पेरियार की जयंती पर इस विचार को दोहराकर यह संदेश दिया कि तमिलनाडु की आत्मा सदैव से समानता की पक्षधर रही है। संगम युग के दार्शनिक कवि कणियन पूंगुन्रनार का यह सूत्र विश्व बंधुत्व (Universal Brotherhood) की सबसे प्राचीन उद्घोषणा है। यह संकीर्ण सीमाओं, भाषाओं और क्षेत्रों से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने का आह्वान करता है।
मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि 21वीं सदी के तकनीकी युग में जब समाज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष विज्ञान की ओर बढ़ रहा है, तब भी कई बार रूढ़िवादी सोच और संकीर्णताएं सिर उठाने लगती हैं। ऐसे समय में पेरियार का तर्कवाद हमें सिखाता है कि किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार न करें क्योंकि वह परंपरा से चली आ रही है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि और विज्ञान की कसौटी पर कसें।
तमिलनाडु सरकार के निर्देश पर 17 और 18 सितंबर को राज्य भर के सभी प्रशासनिक संभागों में बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों का आयोजन किया गया मदुरै, कोयंबटूर, तिरुचिरापल्ली, सेलम, तिरुनेलवेली, इरोड, वेल्लोर और तंजावुर समेत सभी 38 जिला मुख्यालयों में संबंधित जिला कलेक्टरों ने सरकारी कर्मियों को सामाजिक न्याय की शपथ दिलाई।
पेरियार की जन्मस्थली इरोड स्थित उनके पैतृक आवास (पेरियार-अन्ना मेमोरियल) में विशेष स्मरणोत्सव आयोजित किया गया, जहां हजारों की संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने पहुंचकर उनके संघर्षों को याद किया। राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘पेरियार का तर्कवाद और आज का युवा’ तथा ‘डिजिटल युग में सामाजिक न्याय’ विषयों पर वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर समाज कल्याण विभाग द्वारा एकल महिलाओं, दिव्यांगजनों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए स्वरोजगार किट, सिलाई मशीनें और छात्रवृत्तियां वितरित की गईं।
तमिलनाडु की राजनीति और समाज में पेरियार केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की संपूर्ण नीतिगत संरचना के मार्गदर्शक प्रकाशस्तंभ हैं तमिलनाडु आज देश के सबसे विकसित और औद्योगिकीकृत राज्यों में शुमार है, और इसका सबसे बड़ा श्रेय यहां के सामाजिक न्याय मॉडल को जाता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में किए गए भारी सार्वजनिक निवेश ने राज्य के हर वर्ग के व्यक्ति को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं।
मुख्यमंत्री विजय ने इस बात पर बल दिया कि सरकार का लक्ष्य केवल आर्थिक आंकड़े बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास का फल समाज के सबसे पिछले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। जब तक हर व्यक्ति को सम्मान, समान अवसर और सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक सच्चा सामाजिक न्याय अधूरा है।
चेन्नई के सिम्प्टन चौराहे से लेकर राज्य सचिवालय तक गूंजता ‘सामाजिक न्याय’ का यह संकल्प इस बात का प्रमाण है कि शरीर भले ही नश्वर हो, लेकिन न्याय, बराबरी और मानवीय गरिमा के विचार अमर होते हैं। तंथई पेरियार ई.वी. रामासामी ने आज से एक सदी पूर्व जिस सामाजिक गैर-बराबरी के खिलाफ अकेली आवाज उठाई थी, आज वह तमिलनाडु के शासन तंत्र और नागरिक चेतना की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।
मुख्यमंत्री विजय द्वारा दिलाई गई यह शपथ केवल शब्दों का विन्यास नहीं है, बल्कि यह उस अटूट सामाजिक अनुबंध (Social Contract) का नवीनीकरण है जो यह सुनिश्चित करता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में समाज के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्ग कभी पीछे न छूटें। तर्कवाद की मशाल, मानवता का प्रेम और जन्म-आधारित समानता का पावन सिद्धांत ही आने वाले समय में एक सशक्त, समृद्ध और प्रगतिशील समाज की दिशा तय करता रहेगा।



