राज्यशिक्षा

केरल में प्राथमिक शिक्षक रैंक धारकों का आंदोलन चरम पर

1:25 शिक्षक-छात्र अनुपात पर सरकार से गहराया गतिरोध

केरल सचिवालय के सामने पिछले लगभग चार महीनों से चल रहा प्राथमिक शिक्षक अभ्यर्थियों का आंदोलन एक अत्यंत मार्मिक और आक्रामक मोड़ पर पहुंच गया है। केरल लोक सेवा आयोग द्वारा जारी लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर रैंक सूची में शामिल महिला अभ्यर्थियों ने सरकारी वादों की विफलता और नियुक्ति में हो रही अत्यधिक देरी के खिलाफ अपना संघर्ष और तेज कर दिया है। सचिवालय के मुख्य द्वार के ठीक बाहर धूप और बारिश के बीच जारी विरोध प्रदर्शन के 113वें दिन एक्शन काउंसिल की राज्य सचिव एस. वलारमथी और उनके साथ मौजूद कई अन्य महिला अभ्यर्थियों ने अपना सिर मुंडवा लिया और अनिश्चितकालीन आमरण अनशन का बिगुल फूंक दिया। अपनी आंखों में आंसू और हाथ में बाल लिए जब महिला अभ्यर्थियों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए, तो पूरे सचिवालय परिसर के आसपास एक भावुक और तनावपूर्ण माहौल बन गया।
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का स्पष्ट आरोप है कि सरकार ने उनके भविष्य के साथ केवल खिलवाड़ किया है। सितंबर माह के अंत में सामान्य शिक्षा विभाग और सरकारी प्रतिनिधियों के साथ हुई मैराथन बातचीत के दौरान यद्यपि उनकी चार सहायक मांगों पर सहमति व्यक्त की गई थी, लेकिन प्राथमिक विद्यालयों में नए पदों के सृजन और वास्तविक नियुक्तियों की रीढ़ मानी जाने वाली सबसे अहम मांग को सिरे से खारिज कर दिया गया। अभ्यर्थी मांग कर रहे थे कि प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षक-छात्र अनुपात को 1:30 से घटाकर 1:25 किया जाए, ताकि राज्य भर के विद्यालयों में खाली पड़े पदों की संख्या बढ़ सके और रैंक सूची में शामिल हजारों योग्य उम्मीदवारों को रोजगार मिल सके। किंतु सरकार ने राज्य के कथित गंभीर वित्तीय संकट का हवाला देकर इस मुख्य मांग को लागू करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद वार्ता पूरी तरह टूट गई और गतिरोध बढ़ गया।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि काफी लंबी और पीड़ादायक रही है। केरल लोक सेवा आयोग द्वारा मई 2025 में एलपीएसटी की आधिकारिक रैंक सूची प्रकाशित की गई थी। इस कठिन परीक्षा को उत्तीर्ण करने वाले हजारों युवाओं को उम्मीद थी कि राज्य के प्राथमिक विद्यालयों में सेवानिवृत्ति, पदोन्नति और नए डिवीजनों के निर्माण से खाली होने वाले पदों पर उन्हें जल्द ही नियुक्ति पत्र मिल जाएगा। किंतु समय बीतने के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि शिक्षा विभाग द्वारा रिक्तियों की वास्तविक गणना में भारी लापरवाही बरती जा रही है। महीनों के इंतजार के बाद जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अभ्यर्थियों ने संगठित होकर सचिवालय के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।
अगस्त 2026 में आंदोलन उस समय पहली बार राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था जब अभ्यर्थियों का धरना 37वें दिन में प्रवेश कर चुका था और कई महिलाएं भूख हड़ताल पर बैठी थीं। उस दौरान तेरह दिनों तक चले अनशन के बाद जब अभ्यर्थियों की तबीयत बिगड़ने लगी, तो तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने स्वयं धरना स्थल पर पहुंचकर जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराया था। उस समय सरकार ने लिखित और मौखिक आश्वासन दिया था कि उनकी सभी मांगों, विशेषकर शिक्षक-छात्र अनुपात में संशोधन और हेड टीचर वैकेंसी पर नियुक्तियों के मुद्दे पर विचार करने के लिए पैंतालीस दिनों की मोहलत दी जाए। अभ्यर्थियों ने सरकार के वादे पर भरोसा किया और अपना आमरण अनशन स्थगित कर शांतिपूर्ण धरना जारी रखा।
किंतु आंदोलनकारियों का कहना है कि पैंतालीस दिनों की वह अवधि 24 सितंबर को ही समाप्त हो गई और सरकार की ओर से कोई सकारात्मक आदेश जारी नहीं किया गया। इसके बाद जब 30 सितंबर को शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों के साथ दोबारा वार्ता की मेज सजी, तो सरकार का रवैया पूरी तरह बदला हुआ था। यद्यपि प्रशासनिक स्तर पर कुछ तकनीकी बिंदुओं और प्रक्रियात्मक सुधारों पर सहमति की बात कही गई, लेकिन जब 1:25 के अनुपात की बात आई, तो वित्त विभाग के अधिकारियों ने हाथ खड़े कर दिए। सरकार का तर्क था कि शिक्षक-छात्र अनुपात को संशोधित करने से राज्य के खजाने पर सैकड़ों करोड़ रुपये का स्थायी वेतन और पेंशन का बोझ पड़ेगा, जिसे वर्तमान आर्थिक तंगहाली के दौर में वहन करना कतई संभव नहीं है।
सरकार के इस रुख ने अभ्यर्थियों के धैर्य का बांध तोड़ दिया। सिर मुंडवाने के बाद मीडिया से बात करते हुए एक्शन काउंसिल की राज्य सचिव एस. वलारमथी का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार की असंवेदनशीलता अब मानवीयता की सारी हदें पार कर चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यह सरकार सत्ता में आने से पहले विपक्ष में थी, तब उसके नेता इन्हीं मांगों को जायज ठहराते हुए उनके धरने में शामिल होते थे, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही उन्हें बेरोजगार युवाओं की चीखें सुनाई देना बंद हो गई हैं। वलारमथी ने आरोप लगाया कि वित्तीय संकट का बहाना केवल सरकारी स्कूलों के गरीब और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले मेधावी युवाओं के लिए बनाया जा रहा है। उन्होंने सरकार के दोहरे मापदंडों पर हमला करते हुए कहा कि एक तरफ सरकार कहती है कि उसके पास पैसा नहीं है, वहीं दूसरी तरफ सहायता प्राप्त निजी यानी एडेड स्कूलों में शिक्षकों की नई भर्तियों को धड़ल्ले से मंजूरी दी जा रही है। उन्होंने सीधा सवाल दागा कि क्या एडेड स्कूलों के शिक्षकों का वेतन राज्य के सरकारी खजाने से नहीं जाता, या फिर वित्तीय अनुशासन का सारा बोझ केवल सरकारी स्कूल के अभ्यर्थियों पर ही लादा जाएगा।
प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक-छात्र अनुपात का मुद्दा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता और उनके अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत सामान्यतः प्राथमिक स्तर पर तीस छात्रों पर एक शिक्षक का नियम निर्धारित है। किंतु केरल जैसे राज्य में, जहां गिरती जन्मदर और तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय ढांचे के कारण प्राथमिक कक्षाओं में छात्रों का नामांकन लगातार घट रहा है, वहां तीस छात्रों का मानक अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है। छात्र संख्या कम होने के कारण सरकारी प्राथमिक स्कूलों में कक्षाएं यानी डिवीजनों की संख्या घट रही है, जिसे प्रशासनिक भाषा में ‘डिवीजन फॉल’ कहा जाता है।
डिवीजन फॉल का सीधा असर यह होता है कि स्कूलों में शिक्षकों के पद समाप्त कर दिए जाते हैं और वहां कार्यरत शिक्षकों को अन्यत्र समायोजित कर दिया जाता है, जिससे नए पदों के सृजन का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है। यदि सरकार शिक्षक-छात्र अनुपात को घटाकर 1:25 कर देती है, तो कम नामांकन वाले ग्रामीण और दूरदराज के तटीय या पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूलों में भी कक्षाएं बंद होने से बच जाएंगी। इससे न केवल सरकारी स्कूलों में प्रति बच्चे व्यक्तिगत ध्यान देने की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि पूरे राज्य में सैकड़ों नए पदों का स्वतः सृजन हो जाएगा, जिससे इस वर्तमान रैंक सूची में शामिल उम्मीदवारों को नियुक्ति मिल सकेगी। अभ्यर्थियों का तर्क है कि जब अन्य विकसित राज्यों और अंतरराष्ट्रीय मानकों में प्राथमिक स्तर पर पच्चीस या बीस छात्रों पर एक शिक्षक की पैरवी की जाती है, तो शत-प्रतिशत साक्षरता का दम भरने वाला केरल इस सुधार से पीछे क्यों भाग रहा है।
सचिवालय के सामने का माहौल इस समय अत्यधिक तनावपूर्ण है। महिला अभ्यर्थियों ने अपने अनशन स्थल पर पुलिस और प्रशासन की ज्यादतियों के आरोप भी लगाए हैं। वलारमथी ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए बताया कि जब बारिश के मौसम में अभ्यर्थियों ने खुद को भीगने से बचाने के लिए तिरपाल या शेड लगाने की कोशिश की, तो पुलिसकर्मियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। इसके चलते भूख हड़ताल पर बैठी महिलाओं को खुले आसमान के नीचे बारिश में भीगते हुए रातें गुजारनी पड़ रही हैं। महिला अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के कई वर्ष कड़ी मेहनत, कोचिंग और परीक्षाओं की तैयारी में लगाए हैं। घर-परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को संभालते हुए उन्होंने मेरिट लिस्ट में जगह बनाई थी, लेकिन अब सरकार की बेरुखी ने उन्हें इस कगार पर ला खड़ा किया है कि उन्हें अपनी अस्मिता और बालों की आहुति देकर न्याय की भीख मांगनी पड़ रही है।
इस आंदोलन ने केरल की राजनीति में भी भारी उबाल ला दिया है। विपक्षी दलों, विभिन्न युवा संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने सचिवालय पहुंचकर अनशनकारियों के प्रति अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर युवाओं के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि जो सरकार वामपंथी विचारधारा और जनपक्षधरता की बात करती है, वह आज खुले आसमान के नीचे बैठी अपनी ही बेटियों के आंसुओं की अनदेखी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार ने समय रहते इस मामले में कोई सम्मानजनक समाधान नहीं निकाला, तो यह आंदोलन राज्यव्यापी सामाजिक असंतोष का कारण बन सकता है, क्योंकि यह मुद्दा केवल कुछ सौ शिक्षकों का नहीं बल्कि पूरे सार्वजनिक शिक्षा तंत्र और प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता से जुड़ा हुआ है।
अभ्यर्थियों के सामने सबसे बड़ी चिंता समय की कमी की है। केरल लोक सेवा आयोग के नियमों के अनुसार किसी भी रैंक सूची की एक निश्चित समयसीमा होती है। अभ्यर्थियों को आशंका है कि सरकार जानबूझकर समय खींच रही है ताकि इस सूची की मियाद पूरी हो जाए और मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाए। यही कारण है कि अभ्यर्थियों ने अब ‘करो या मरो’ की राह चुन ली है। अनशन पर बैठी महिलाओं ने दो-टूक घोषणा कर दी है कि जब तक उनकी मांगों को पूरा करते हुए स्पष्ट शासनादेश जारी नहीं हो जाता, तब तक वे अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगी, चाहे इसके लिए उन्हें अपने प्राणों की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े।
तिरुवनंतपुरम की सड़कों से उठ रही यह पुकार केवल रोजगार का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ एक गहरा आक्रोश है जो परीक्षाओं के आयोजन में तो तत्परता दिखाती है, किंतु जब सफल उम्मीदवारों को उनका वाजिब हक देने की बात आती है, तो वित्तीय बाधाओं का बहाना बनाकर मुंह फेर लेती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिमंडल इस मानवीय संकट की गंभीरता को समझते हुए बीच का कोई व्यावहारिक रास्ता निकालते हैं, या फिर 113 दिनों से न्याय की आस में बैठी ये शिक्षिकाएं व्यवस्था की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ जाएंगी।

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