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नकद बंटवारे: चुनावी सहयोग या वोट खरीदने की चाल?

लोकतंत्र का नया चेहरा या पुराना प्रलोभन?

जब चुनाव आते हैं, तो देश भर की सड़कों पर एक आम नजारा देखने को मिलता है जनता को नकद पैसे, मुफ्त सामान या सब्सिडी के रूप में लाभ देने की होड़। कहीं मुफ्त बिजली, कहीं महिला और युवाओं को पैसे, कहीं वृद्धों को पेंशन। राजनीति का यह तरीका वोटों की लड़ाई को सीधे तौर पर ‘हाथ में पैसे’ तक ले आता है। सवाल उठता है क्या यह सचमुच कल्याणकारी है या लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की दीवार तोड़ने वाला एक बड़ा खतरा?

हालिया चुनावों में सरकारी योजनाओं और चुनावी घोषणाओं के जरिए करोड़ों रुपए का वितरण हुआ है। बिहार में महिलाओं को ₹10,000 नकद मिलने की खबरें थीं, वहीं महाराष्ट्र और झारखंड में भी सीधा फंड ट्रांसफर वोटरों तक पहुंचा। इन योजनाओं के असर से वोटिंग प्रतिशत तेज़ी से बढ़ा, खासकर महिलाओं में। इसका मतलब यह भी निकला कि चुनाव जीतने के लिए वोटरों को ‘लगे हाथ’ कुछ देना जरूरी हो गया है।

क्या सीधे कैश ट्रांसफर या मुफ्त चीज़ें देना गरीबी दूर करने का नुस्खा है? सच यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार में निवेश न होना, मुफ्त कैश-स्कीमों के बार-बार दोहराव के कारण होता है। कुछ राज्य, जैसे हरियाणा, छत्तीसगढ़ या ओडिशा, चुनाव में कम नकदी बाँटते हैं; उन्होंने लोक-कल्याण को केवल वोट के लिए सीमित नहीं किया।​

दूसरी ओर, कई योजनाएँ चुनावी फायदे के बाद पीछे छूट जाती हैं; जनता अधिक मजबूत नहीं होती, पर अस्थायी राहत जरूर पाती है। लंबे समय तक, गरीब की स्थिति बदलने के लिए नौकरी, स्कूल, अस्पताल, और सड़क बनाना जरूरी है। ‘नोट लो, वोट दो’ से बदलाव नहीं आता, वास्‍तविक परिवर्तन का आधार सामाजिक-आर्थिक नीति ही है।

पूरे देश में चुनावों पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं, जिनमें सरकारी खर्च भी शामिल रहता है। बजट का बड़ा हिस्सा इन मुफ्त योजनाओं पर जाता है, जिससे अन्य विकास कार्य प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, बिहार ने 32% राजस्व फ्रीबी योजनाओं पर खर्च कर दिया, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना की पूंजीगत योजनाओं पर असर पड़ा।

इस ‘फ्रीबी कल्चर’ के कारण कई राज्यों की वित्तीय स्थिति दबाव में आ जाती है, और अगले सालों की आर्थिक योजनाएं प्रभावित होती हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चुनावी फंडिंग का यह तरीका दीर्घकाल में राज्यों को नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि विकास कार्य धीमे पड़ जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रथा को ‘रेवड़ी संस्कृति’ बताया है, यानी केवल वोट पाने के लिए आदान-प्रदान। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे को उठाया है, कि क्या नकद या मुफ्त योजनाएं चुनाव प्रक्रिया की नैतिकता को प्रभावित कर रही हैं। सपोर्टर इसे गरीबों की मदद मानते हैं, आलोचक इसे लोकतंत्र की हत्या कहते हैं। कई न्यायालयीय मुकदमों में इस ‘अस्वाभाविक’ प्रथा को चुनावी भ्रष्टाचार के रूप में पहचाना गया है।

आज आम जनता भी सोच रही है कि सिर्फ मुफ्त पैसा देना काम नहीं करता। युवा जो रोजगार चाहते हैं, महिलाएं जो शिक्षा और सुरक्षा चाहती हैं, वे कहती हैं कि दीर्घकालिक विकास ज़रूरी है। ‘नकद देना’ एक तात्कालिक झटका हो सकता है, पर असली आज़ादी तो स्वावलंबी बन जाने में है।

यदि नेता केवल चुनाव में वोट पाने के लिए ‘फ्रीबी’ देते रहेंगे, तो देश की विकास दर कमजोर होगी, और जनता की उम्मीदें खत्म होंगी। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे दीर्घकालिक कल्याण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान दें।चुनाव आयोग को कड़ाई से चुनावी खर्चों की निगरानी करनी होगी, और राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाना होगा। मीडिया और नागरिक समाज को भी इस बहस को मजबूत कर लोकतंत्र को सशक्त करने की ज़रूरत है।

भारत आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। नकद और मुफ्त योजनाओं का दौर लोकतंत्र को शॉर्ट-कट दे सकता है, पर क्या यह दीर्घकालिक विकास, स्थिरता और सामाजिक न्याय का रास्ता है? वोट खरीदने और वोट देने की सांसारिक राजनीति के बीच हमारी असली परीक्षा यह है कि क्या हम एक मजबूत, समृद्ध, और नैतिक लोकतंत्र बना पाएंगे।

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