
आज का समाज काफी तेजी से बदल रहा है। महिलाएं और पुरुष पुरानी परंपराओं से हटकर नए स्वरूप में परिवार बनाना चाहते हैं। ऐसे बदलावों ने तकनीकी और चिकित्सकीय उन्नति को बढ़ावा दिया, जिसके चलते अब उन जोड़ों को भी माता-पिता बनने का मौका मिल पा रहा है, जिन्हें कभी ऐसा संभव नहीं लगता था। IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) और सरोगेसी जैसी तकनीकों ने न केवल दंपतियों को संतान सुख दिया है, बल्कि समाज में मातृत्व-पितृत्व की परिभाषा भी विस्तारित की है।
लेकिन तकनीक जितनी उन्नत हो गई, उसके साथ समाज और कानून की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वे इन नए मातृत्व-पितृत्व के रूपों को न्यायसंगत, सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से स्वीकार करें। सवाल उठते हैं कि क्या वर्तमान कानून बच्चों, माता-पिता और सरोगेट मदर्स के अधिकारों की पूरी रक्षा कर पा रहा है? या यह बदलाव सामाजिक विसंगतियों को गहरा करने का कारण बन रहा है?
IVF का आविष्कार उन दंपतियों के लिए आशा की किरण लेकर आया है जो लंबे समय से संतान सुख की कोशिश में असफल रहे हैं। यह एक ऐसा साधन है जो लैब में अंडाणु और शुक्राणु के मिलन से जीवन की शुरुआत करता है, जब प्राकृतिक गर्भधारण संभव नहीं होता। IVF कोई केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उस माता-पिता की उम्मीदों, संघर्षों और सामर्थ्य की भी कहानी है जो माता-पिता बनने के लिए कई बार निराश हो चुके होते हैं।
सरोगेसी, अपने आप में, एक और संवेदनशील विषय है। जब कोई महिला किसी दूसरे व्यक्ति या दंपती के लिए अपना गर्भ उधार देती है, तो इस प्रक्रिया में भले ही वैज्ञानिक तकनीक हो, लेकिन उसमें मानवीय भावनाएँ, दायित्व और संवेदनाएं घुली होती हैं। सरोगेट माँ अपनी सीमाओं के साथ न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक रूप से भी इस प्रक्रिया से गुजरती है। उस पर शोषण के खतरे, सामाजिक दबाव और न्याय की तलाश का भार भी हो सकता है। इसलिए सरोगेसी के मामलों में उसकी स्वतंत्र इच्छा, स्वास्थ्य सुरक्षा और सम्मान बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
भारत में सरोगेसी और IVF की प्रक्रिया पिछले कुछ वर्षों से कानून द्वारा नियंत्रित है, जिससे इसका गलत प्रयोग रोका जा सके और इसमें शामिल सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रह सकें। 2021 में लागू हुए ‘सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट’ ने व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाते हुए केवल अल्ट्रुइस्टिक यानी नि:स्वार्थ सरोगेसी को अनुमति दी है। यह कदम सरोगेट माँ के शोषण को रोकने, स्वास्थ्य संरक्षण बढ़ाने और संतान के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से लिया गया है।
हालांकि, इस कड़े नियमों के कारण कई ऐसे कार्य-समूह और लोग निश्चित रूप से लाभ से वंचित रह गए हैं, जो पिता या माता बनने की इच्छा रखते हैं, लेकिन कानूनी प्रतिबंधों के कारण इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पा रहे। खासकर समलैंगिक जोड़े, अकेले इच्छुक व्यक्ति, या ऐसे दंपती जो विवाहित नहीं हैं, वे इस अधिकार से दूर रह जाते हैं। यही नहीं, सरोगेट मदर के लिए भी कई बार यह प्रक्रिया उनकी मर्जी, उनके स्वास्थ्य और भावनात्मक स्थिति के मद्देनजर सुरक्षित नहीं हो पाती।
इस बदलती ज़िंदगी और परिवार के स्वरूप को देखते हुए जरुरी हो गया है कि कानून अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और लचीला बने। केवल पति-पत्नी आधारित परिवार की परंपरा को छोड़कर, सिंगल पैरेंट्स, LGBTQ+ समुदाय जैसे परिवारों की ज़रूरतों को भी मान्यता मिले। सभी को मातृत्व-पितृत्व का अधिकार मिले, फिर वह प्राकृतिक या तकनीकी प्रक्रिया से प्राप्त हो।
महिलाओं की भूमिका, विशेषकर सरोगेट मदर्स की, एक संवेदनशील मुद्दा है। कई बार आर्थिक या सामाजिक मजबूरियों के कारण महिलाएं इस प्रक्रिया में शामिल होती हैं। इसलिए उनकी सहमति की स्वतंत्रता, इस पूरे सफर में उचित मेडिकल सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक समर्थन और कानूनी संरक्षण अनिवार्य है। सरोगेसी के बाद उन्हें स्वस्थ जीवन के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
सबसे अहम विषय हमेशा से बच्चे का अधिकार रहा है। बच्चे को जन्म के बाद उसका पूरा अधिकार, सुरक्षा, शिक्षा और संवेदनात्मक समर्थन मिलना चाहिए। सरोगेसी और IVF के माध्यम से जन्मे बच्चों का सामाजिक और कानूनी दर्जा स्पष्ट रूप से सुनिश्चित होना चाहिए, ताकि वे अपने जीवन में किसी तरह के कलंक या असुरक्षा से बचे रहें।
दुनिया के अन्य देशों में भी IVF और सरोगेसी के लिए व्यापक नियम बने हुए हैं, जो मानवाधिकारों और व्यावसायिक नैतिकता के संतुलित मिश्रण पर टिका है। समलैंगिक और सिंगल पैरेंट्स को भी जन्म देने के अधिकार दिए गए हैं। भारत के लिए जरूरी है कि वह इन अनुभवों से सीखें और अपने सामाजिक और कानूनी ताने-बाने को बदलते हुए सुरक्षित वातावरण बनाए, जहाँ हर माँ-बाप, हर सरोगेट मदर और हर बच्चा समानाधिकारी और सम्मानित महसूस करे।
समाज की सोच भी बदलनी चाहिए। परिवार की परिभाषा केवल ‘जैविक संबंध’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इंसानियत, जिम्मेदारी और प्यार के तत्व परिवार की बुनियाद हैं। जाति, धर्म, लिंग या विवाह की परंपरा उसके ऊपर हावी नहीं होनी चाहिए। विज्ञान और तकनीक का मकसद केवल समस्याओं को हल करना नहीं, बल्कि मानवता का उत्थान भी है। इसलिए कानून, समाज और विज्ञान को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन लोगों के लिए ये तकनीकें विकास की किरण हैं, वे समानता, स्वतंत्रता और गरिमा से जी सकें।
इस नयी दुनिया में नई उम्मीदों, नई चुनौतियों और नए अधिकारों का मार्ग प्रशस्त करना हम सबकी जिम्मेदारी है। इसलिए पैरेंटहुड के हर स्वरूप को सम्मान दें और हर बच्चे को वह जिंदगी नसीब हो जो उसके सपनों की परिभाषा में हो, न कि सिर्फ परंपरागत या कानूनी दायरे में।



