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ट्रंप-ताकााइची मेगा-डील: अमेरिकी औद्योगिक पुनर्जागरण और प्रशांत साझेदारी का नया युग

36 बिलियन डॉलर का पहला प्रहार: प्रमुख रणनीतिक परियोजनाएं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापानी प्रधानमंत्री साने ताकााइची के बीच संपन्न हुआ यह नया व्यापार समझौता केवल दो देशों के बीच का आर्थिक लेन-देन नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की “नई औद्योगिक कूटनीति” का घोषणापत्र है। 550 बिलियन डॉलर के जापानी निवेश का संकल्प और उसके पहले चरण में 36 बिलियन डॉलर की परियोजनाओं की तत्काल शुरुआत, वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक भूकंपीय बदलाव का संकेत देती है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” और जापानी प्रधानमंत्री साने ताकााइची के “आर्थिक सुरक्षा” (Economic Security) सिद्धांतों का मिलन इस समझौते की आधारशिला है। यह सौदा ऐसे समय में आया है जब दुनिया चीन पर अपनी निर्भरता कम करने और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) बनाने के लिए संघर्ष कर रही है।

इस समझौते के पहले चरण में तीन ऐसी परियोजनाओं को चुना गया है जो अमेरिका की आधारभूत शक्ति ऊर्जा और खनिज को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। टेक्सास में एक विशाल तेल निर्यात सुविधा का निर्माण अमेरिका को ‘ऊर्जा प्रभुत्व’ (Energy Dominance) की ओर ले जाएगा। यह सुविधा अमेरिका के पर्मियन बेसिन से निकलने वाले कच्चे तेल को सीधे वैश्विक बाजारों, विशेष रूप से एशिया तक पहुँचाने में मदद करेगी। इससे न केवल अमेरिका का व्यापार घाटा कम होगा, बल्कि वैश्विक तेल कीमतों पर वाशिंगटन का नियंत्रण भी बढ़ेगा।

जॉर्जिया में स्थापित होने वाला क्रिटिकल मिनरल्स प्लांट (Critical Minerals Plant) इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक हिस्सा है। वर्तमान में लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा खनिजों (Rare Earth Minerals) के प्रसंस्करण पर चीन का एकाधिकार है। यह प्लांट इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरी और उन्नत हथियार प्रणालियों के लिए आवश्यक खनिजों का शुद्धिकरण करेगा, जिससे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी।

ओहियो में एक विशाल प्राकृतिक गैस बिजली संयंत्र का निर्माण किया जाएगा। सस्ती और विश्वसनीय बिजली के बिना भारी उद्योग (Heavy Industry) प्रतिस्पर्धी नहीं रह सकते। यह प्लांट ओहियो के बंद हो चुके कारखानों में फिर से जान फूँकने का काम करेगा।जापान की उन्नत टर्बाइन तकनीक और अमेरिका के प्रचुर प्राकृतिक गैस भंडार का यह समन्वय पर्यावरण के अनुकूल और उच्च क्षमता वाला होगा।

इस समझौते की सबसे बड़ी घोषणा जापानी उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ (आयात शुल्क) को घटाकर 15% करना है। यह ट्रंप की पिछली टैरिफ नीतियों से एक बड़ा विचलन (Shift) है। जापानी ऑटोमोबाइल कंपनियों (टोयोटा, होंडा, निसान) और टेक दिग्गजों के लिए अब अमेरिकी बाजार में प्रवेश करना सस्ता हो जाएगा। यह उन्हें दक्षिण कोरियाई और यूरोपीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बढ़त दिलाएगा। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जापान अमेरिका में कारखाने लगाता है और नौकरियां पैदा करता है (550 बिलियन डॉलर का निवेश), तो अमेरिका अपने बाजार के दरवाजे जापान के लिए खोल देगा। यह एक ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo) सौदा है।

प्रधानमंत्री साने ताकााइची ने अगले एक दशक में अमेरिका में 550 बिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया है। यह किसी भी एक देश द्वारा दूसरे देश में किया जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा निवेश संकल्प हो सकता है। इस निवेश का बड़ा हिस्सा सेमीकंडक्टर, एआई (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग और हाइब्रिड ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में जाने की उम्मीद है। जापान अपनी कंपनियों को चीन से निकालकर अमेरिका में स्थानांतरित (Reshoring/Friend-shoring) करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे एक ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ आर्थिक क्षेत्र का निर्माण हो सके।

व्हाइट हाउस के अनुसार, इस सौदे से अमेरिका में सैकड़ों-हजारों नई नौकरियां पैदा होंगी। ओहियो और जॉर्जिया जैसे राज्यों में लगने वाले संयंत्रों से हजारों कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को रोजगार मिलेगा। जापानी निवेश के साथ-साथ जापानी प्रबंधन और प्रशिक्षण तकनीक भी आएगी, जिससे अमेरिकी कार्यबल को एआई और उन्नत विनिर्माण में प्रशिक्षित होने का मौका मिलेगा।

प्रधानमंत्री ताकााइची की वाशिंगटन यात्रा से ठीक पहले इस सौदे का अनावरण एक गहरा राजनीतिक संदेश है। अमेरिका और जापान अब केवल सैन्य सहयोगी नहीं हैं, बल्कि वे एक एकीकृत आर्थिक इकाई (Economic Bloc) की तरह काम कर रहे हैं। यह चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) का एक मजबूत लोकतांत्रिक विकल्प है। अमेरिका द्वारा जापान को ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी (तेल और गैस निर्यात के माध्यम से) देना, जापान की मध्य-पूर्व और रूस पर निर्भरता को कम करेगा।

इतने बड़े पैमाने के सौदे में चुनौतियां भी कम नहीं हैं जापानी कार्य संस्कृति और अमेरिकी श्रम संघों (Unions) के बीच तालमेल बिठाना एक चुनौती होगी। तेल और गैस परियोजनाओं के विस्तार का पर्यावरणविदों द्वारा विरोध किया जा सकता है। क्या यह समझौता ट्रंप प्रशासन के बाद भी टिक पाएगा? यह एक बड़ा सवाल है, हालांकि निवेश की प्रकृति इतनी विशाल है कि इसे पलटना मुश्किल होगा।

ट्रंप-ताकााइची व्यापार समझौता यह सिद्ध करता है कि साझा मूल्यों और आर्थिक हितों के मेल से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं। जहाँ दुनिया संरक्षणवाद (Protectionism) की ओर बढ़ रही है, वहीं अमेरिका और जापान ने एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ पेश किया है जहाँ टैरिफ कम हैं लेकिन निवेश और नौकरियां स्थानीय हैं।

यह समझौता अमेरिका को फिर से दुनिया का ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाने और जापान को अपनी आर्थिक शक्ति को पुनर्जीवित करने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है। यदि यह 550 बिलियन डॉलर का निवेश वास्तव में धरातल पर उतरता है, तो यह 2026 के बाद की वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित होगा।

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