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होर्मुज जलडमरूमध्य में भारत को ‘सेफ पैसेज’: ईरान-भारत संबंधों की कूटनीतिक जीत और ऊर्जा सुरक्षा का संकल्प

भारत की विदेश नीति: 'बैलेंसिंग एक्ट' की मास्टरक्लास

13 मार्च, 2026 को नई दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में एक बड़ी हलचल तब हुई जब भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने घोषणा की कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में फंसे भारत आने वाले दो बड़े एलपीजी (LPG) टैंकरों को सुरक्षित रास्ता दे दिया है। राजदूत का यह संक्षिप्त लेकिन शक्तिशाली बयान “हमने ऐसा किया क्योंकि भारत हमारा मित्र है” केवल एक द्विपक्षीय सौहार्द की बात नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया के भीषण युद्ध के बीच भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की एक बड़ी जीत है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ‘ऊर्जा धमनी’ कहा जाता है, इस समय वैश्विक संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में ईरान का भारत को विशेष रियायत देना दक्षिण एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक युगांतरकारी घटना है।

यह समझना अनिवार्य है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित रास्ता मिलना भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है। यह संकीर्ण जलमार्ग फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है। इसका सबसे संकीर्ण हिस्सा मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा है। वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20% और दुनिया की 25% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) इसी रास्ते से गुजरती है। भारत अपनी एलपीजी (LPG) और कच्चे तेल की जरूरतों के लिए सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर पर निर्भर है। इन सभी देशों से आने वाले जहाज इसी मार्ग का उपयोग करते हैं।

राजदूत फथाली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जिस गर्मजोशी से भारत को ‘मित्र’ संबोधित किया, उसके पीछे वर्षों की ‘बैक-चैनल कूटनीति’ (Back-channel Diplomacy) काम कर रही है। ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी युद्ध के कारण ईरान ने चेतावनी दी थी कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। ऐसी स्थिति में भारत के लिए ‘अपवाद’ बनाना यह दर्शाता है कि ईरान भारत को अपने पश्चिमी विरोधियों के पाले में नहीं देखता है।

यूएई के राजदूत ने जहाँ ईरान की आलोचना की थी, वहीं ईरानी राजदूत ने भारत के प्रति उदारता दिखाकर यह संदेश दिया कि ईरान अपने ‘मित्रों’ के हितों की रक्षा करना जानता है। इस मित्रता का एक बड़ा आधार चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) में भारत का निवेश भी है, जो ईरान के लिए आर्थिक ऑक्सीजन की तरह है।

पिछले कुछ हफ्तों से भारत “गैस संकट” की चर्चाओं से घिरा हुआ था। ईंधन की कमी और बढ़ती कीमतों ने सरकार पर दबाव बना दिया था। ईरान द्वारा जिन दो टैंकरों को रास्ता दिया गया, वे लगभग 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर आ रहे थे। यह मात्रा भारत के महानगरों में कम से कम एक सप्ताह की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है। आपूर्ति में निरंतरता का अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘सप्लाई शॉक’ (Supply Shock) के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। जब ईरान जैसे देश सुरक्षा की गारंटी देते हैं, तो जहाजों का ‘वार रिस्क इंश्योरेंस’ (War Risk Insurance) कम हो जाता है, जिससे आयात लागत में कमी आती है।

यह घटनाक्रम प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय की उस नीति की सफलता है जिसे ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ (Multi-alignment) कहा जाता है। भारत के इजरायल के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं, लेकिन उसने ईरान के साथ अपने ऊर्जा और ऐतिहासिक संबंधों को भी आंच नहीं आने दी। भारत ने युद्ध के दौरान शांति और कूटनीति की वकालत की है। ईरान का यह कदम दिखाता है कि तेहरान भारत को एक ऐसे निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में देखता है जो न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी प्रतिबद्ध है।

ईरान के आश्वासन के साथ-साथ, भारतीय नौसेना की सक्रियता ने भी इस सुरक्षित मार्ग को संभव बनाया है। भारतीय नौसेना के युद्धपोत फारस की खाड़ी में भारतीय ध्वज वाले व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। भारतीय नौसेना और ईरानी नौसेना के बीच संचार लाइनों ने यह सुनिश्चित किया कि कोई ‘गलतफहमी’ (Miscalculation) न हो।

भले ही ईरान ने अभी सहयोग किया है, लेकिन भविष्य की चुनौतियां बरकरार हैं यदि युद्ध और अधिक व्यापक होता है, तो क्या ईरान अपनी इस ‘मित्रता’ को बनाए रख पाएगा? कूटनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। इस संकट ने भारत को ऊर्जा के वैकल्पिक मार्गों और स्रोतों (जैसे अमेरिका और अफ्रीका से आयात) पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर किया है। यदि खाड़ी क्षेत्र में इसी तरह का तनाव बना रहता है, तो भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) खटाई में पड़ सकता है।

ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय जहाजों को रास्ता देना 2026 की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं में से एक है। यह केवल तेल और गैस की बात नहीं है; यह भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति और उसकी ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रमाण है।

राजदूत मोहम्मद फथाली के शब्दों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत ने अपनी तटस्थता और विश्वसनीयता के दम पर जो कूटनीतिक पूंजी कमाई है, वह संकट के समय में सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी है। भारत के लिए अब चुनौती यह है कि वह इस ‘सेफ पैसेज’ का उपयोग करते हुए अपनी ऊर्जा भंडार क्षमता (Strategic Reserves) को बढ़ाए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति के लिए अपनी आवाज बुलंद रखे।

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