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ग्रामीण भारत की हकीकत: डिजिटल पहुंच कहाँ और कितनी है?

डिजिटल डिवाइड: हर बच्चे को बराबरी का हक़

गाँव का बच्चा कच्ची सड़क पर स्कूल जाता है, पुरानी किताबें उसके कंधे पर टंगी रहती हैं और शहर का बच्चा अपने टैबलेट पर उँगलियाँ फेरते हुए देश-दुनिया की हर जानकारी पलक झपकते पा सकता है ये दृश्य दिखाते हैं कि ‘डिजिटल इंडिया’ के इस युग में भी, गाँवों व शहरों के बीच की ‘डिजिटल खाई’ कितनी गहरी है। हम तकनीक से भरे एक नए दौर में जी रहे हैं, जहाँ शिक्षा किताबों के पन्नों से आगे इंटरनेट, वीडियो, ऐप्स और डिजिटल कक्षाओं में पहुँच चुकी है, लेकिन हमारे ग्रामीण बच्चे अभी उस डिजिटल दुनिया की चौखट पर भी नहीं पहुंच पाए हैं।

भारत का बड़ा हिस्सा गाँवों में बसा है, लेकिन यहाँ तकनीकी संसाधनों की स्थिति अभी भी बेहद कमजोर है। ज्यादातर गाँवों में कंप्यूटर, स्मार्टफोन या तेज़ इंटरनेट किसी सपने से कम नहीं हैं। सरकारी आँकड़े भी बताते हैं कि केवल मुट्ठीभर ग्रामीण परिवारों के पास कंप्यूटर या अच्छी इंटरनेट सुविधा है; वहीं, शहरों में डिजिटल साधनों की पहुँच का स्तर काफी ऊँचा है। कहने को सरकार स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और ई-लर्निंग पर जोर देती है, पर गाँव के बच्चे आज भी कंप्यूटर स्क्रीन की जगह ब्लैकबोर्ड और चॉक से ही सीखने के लिए मजबूर हैं।

अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध नहीं है। कई गाँवों में बिजली ही दिनभर नहीं आती, जिससे मोबाइल और कंप्यूटर चार्ज करने जैसी बुनियादी बातें भी संभव नहीं रह पाती। बच्चे ही नहीं, उनके माता-पिता और कई शिक्षक भी तकनीकी ज्ञान से अनजान हैं। स्मार्टफोन तो दूर, उन्हें आसान एप्लिकेशन चलाना भी नहीं आता। ऐसे में उपलब्ध संसाधन भी कई बार बेकार साबित होते हैं।

अक्सर किसी घर में एक ही मोबाइल होता है, जिससे पढ़ाई के साथ-साथ बाकी सभी घर की जरूरतें भी पूरी करनी पड़ती हैं। टैबलेट, लैपटॉप या डेस्कटॉप तो आम ग्रामीण परिवार की पहुंच से बाहर हैं। अधिकांश ऑनलाइन पाठ्यक्रम अंग्रेज़ी या शहरी हिंदी में हैं, जबकि गाँव के बच्चे अपनी स्थानीय भाषा में सहज महसूस करते हैं। नतीजतन, वे उस सामग्री से खुद को जोड़ नहीं पाते। कई परिवार तकनीक को बच्चों के भटकने का जरिया मानते हैं। उन्हें डर लगता है कि इंटरनेट बाँझ विकास की जगह खतरे का रास्ता बन सकता है।

शहर के बच्चों के पास डिजिटल ज्ञान, इंटरएक्टिव वीडियो और ऑनलाइन प्रैक्टिस से न केवल उनकी पढ़ाई बेहतर हो रही है, बल्कि भविष्य के लिए वे दुनिया के साथ कदमताल करना सीख रहे हैं। लेकिन गाँवों में डिजिटल संसाधनों के बिना बच्चे नए अवसरों से कट जाते हैं ये फर्क आगे चलकर उनकी नौकरी, आत्मविश्वास और शहरी युवाओं के साथ प्रतिस्पर्धा में दिखता है। कोविड-19 के लॉकडाउन के समय जब शहरों में ऑनलाइन क्लास चल रही थी, तब गाँव के लाखों बच्चों की पढ़ाई रुक गई थी क्योंकि उनके पास साधन ही नहीं थे।

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने डिजिटल ग्राम अभियान, ‘भारतनेट’, ‘डीआईकेएसएचा’ जैसी परियोजनाओं के जरिए ग्रामीण डिजिटल पहुंच बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। कई एनजीओ ने मोबाइल एजुकेशन वैन, लाइब्रेरी व टैबलेट स्कूल जैसी पहलें की हैं। कुछ गाँवों में सामूहिक कंप्यूटर लैब या वाई-फाई जोन भी शुरू किए गए हैं। इन कोशिशों से उम्मीद ज़रूर जगी है, पर भारत जैसे बड़े देश की विशालता देखते हुए अभी ये प्रयास बहुत कम लगते हैं।

कुछ जगहों पर प्रतिबद्धता और रचनात्मकता से मामूली संसाधनों में भी डिजिटल बदलाव दिखने लगा है। झारखंड के कुछ गाँवों में सौर ऊर्जा से चलने वाले टैबलेट्स चलाए जा रहे हैं, जहाँ स्थानीय टीचर बच्चों को महफूज़ और सहज तरीके से डिजिटल कंटेंट सिखाते हैं। राजस्थान में एक एनजीओ ने स्कूल के पुराने कमरे को “डिजिटल लर्निंग सेंटर” में बदल दिया, जिससे पूरे गाँव के बच्चों को इंटरनेट और ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ दिया गया। महाराष्ट्र के एक सुदूर गांव की लड़कियों ने जब उनके पास टैबलेट आए, तो उनकी स्कूल छोड़ने की दर में अचानक गिरावट आ गई क्योंकि अब पढ़ाई रोचक और ‘उनकी भाषा’ में उपलब्ध हुई।

बुनियादी तौर पर गाँवों में विश्वसनीय इंटरनेट और बिजली की आपूर्ति सुदृढ़ करनी होगी। भारतनेट जैसा प्रोजेक्ट और ज्यादा तेजी से हर पंचायत और स्कूल तक पहुंचे; साथ ही सौर ऊर्जा जैसी वैकल्पिक व्यवस्था भी जरूरी है। डिजिटल शिक्षा के लिए जितना जरूरी बच्चों का तकनीकी ज्ञान है, उतना ही महत्वपूर्ण शिक्षकों और अभिभावकों की ट्रेनिंग भी है। जब टीचर खुद डिजिटल रूप से सक्षम होंगे तो बच्चों में तकनीक का डर नहीं, उत्साह फैलेगा।

जिन गाँवों में बच्चों को अपनी भाषा में ऑनलाइन सामग्री मिलेगी, वहां डिजिटल शिक्षा ज्यादा लोकप्रिय और प्रभावशाली बन सकेगी। हर घर के बजाय, गाँव के साझा केंद्र या स्कूल में कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन उपलब्ध कराए जाएँ, बदले में छोटे शुल्क या सहयोग के जरिए फ़ंडिंग हो। मोबाइल लाइब्रेरी, निःशुल्क इंटरनेट ज़ोन से सामूहिक संसाधनों की शक्ति सामने आती है।

प्राइवेट कंपनियां अपनी जिम्मेदारी के तहत गाँवों में स्कूलों को उपकरण, कनेक्टिविटी, ट्रेनिंग और कंटेंट मुहैया कराने में बड़ा योगदान कर सकती हैं। शिक्षा अभियानों के साथ-साथ डिजिटल साक्षरता पर विशेष बल दिया जाए। स्थानीय पंचायतें, महिला समूह, युवा क्लबों की भागीदारी से घर-घर तकनीकी समझ और जागरूकता लाई जाए। महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों तक टेक्नोलॉजी पहुँचती है, तो समूचे गाँव में उसका असर पड़ता है। इंटरनेट साथी जैसी योजनाएं मजबूत हों।

कठिन हालात के बावजूद जब गाँव के बच्चे डिजिटल दुनिया में पहुँचते हैं, तो उनकी रचनात्मकता और सीखने का उत्साह दोगुना हो जाता है। पढ़ाई सिर्फ कठिन शब्द, झंडी और छड़ी से नहीं, अब एक माउस क्लिक या टच स्क्रीन से भी हो सकती है। अगर डिजिटल डिवाइड की खाई पाट दी जाए, तो गाँव का बच्चा भी डिजिटल नागरिक बनकर न सिर्फ खुद आगे बढ़ेगा, बल्कि पूरे समाज के उन्नयन में भागीदार बनेगा।

आज डिजिटल शिक्षा की पहुँच जीवन का मूल अधिकार है, विलासिता नहीं। अगर हम चाहते हैं कि भारत असली मायनों में ‘डिजिटल देश’ बने, तो उसकी शुरुआत गाँवों से करनी होगी। तभी गाँव के हर कोने में ‘पढ़ो इंडिया, बढ़ो इंडिया’ का सपना सच होगा जब वहाँ के बच्चे तकनीक, आत्मबल और उम्मीद के साथ भविष्य रचेंगे।

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