राष्ट्रीय
लाल किले की प्राचीर से गूंजा आजादी का अमर महामंत्र
80वें स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार औपचारिक रूप से प्रस्तुत हुआ राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्'

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर से एक अभूतपूर्व, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना को झकझोर देने वाला नया इतिहास रचा गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आयोजित इस भव्य राष्ट्रीय समारोह में स्वतंत्रता के बाद पहली बार आधिकारिक रूप से राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का औपचारिक गायन और सैन्य बैंड द्वारा वादन किया गया।
वर्ष 2026 का यह स्वतंत्रता दिवस कई मायनों में ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बन गया है। यह वर्ष महान साहित्यकार और चिंतक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित अमर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने (150th Anniversary) का राष्ट्रीय स्मरणोत्सव वर्ष भी है। लाल किले के प्राचीर से 140 करोड़ से अधिक देशवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इस क्षण को स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को नमन करने और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को सिद्ध करने का महापर्व बताया।
लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराने और 21 तोपों की गगनभेदी सलामी के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने राष्ट्रगीत की पावन पंक्तियों और स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को नमन करते हुए की।
“आज हर दिल वंदे मातरम् की धड़कन से धड़क रहा है। आज हर घर तिरंगा है, हर मन तिरंगा है। आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब 15 अगस्त के पावन पर्व पर लाल किले के प्राचीर से ‘वंदे मातरम्’ की अमर गूंज औपचारिक रूप से सुनाई दी है। आज जब पूरा देश वंदे मातरम् के 150 वर्ष मना रहा है, तो इस ऐतिहासिक भूमि से उस महामंत्र का उच्चारण हमारे संकल्पों को असीम ऊर्जा देता है जिसने कभी देश के लाखों क्रांतिकारियों को फांसी के फंदों पर हंसते-हंसते झूल जाने का हौसला दिया था।”
— प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में निम्नलिखित 4 प्रमुख संकल्पों पर विशेष बल दिया 2047 में आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक भारत को एक पूर्ण विकसित, आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से अग्रणी राष्ट्र बनाने का रोडमैप प्रस्तुत किया गया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), अंतरिक्ष अनुसंधान, ग्रीन एनर्जी और सेमीकंडक्टर विनिर्माण में भारत के युवाओं को दुनिया का नेतृत्व करने का आह्वान किया गया।
‘लखपति दीदी’ योजना, सेना में महिला अधिकारियों की भर्ती और विज्ञान-तकनीक में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना की गई। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भाषाओं और स्वदेशी दर्शन को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में इस वर्ष कई अनूठी और नवीन परंपराओं का समावेश किया गया जिसने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। लाल किले की प्राचीर के ठीक सामने स्थित विशाल ‘ज्ञानपथ’ पर थल सेना, नौसेना और वायुसेना विंग के 2,500 एनसीसी कैडेट्स तथा युवा मामले मंत्रालय के ‘माई भारत’ (MY Bharat) स्वयंसेवकों ने बैठकर विशालकाय देवनागरी और अंग्रेजी अक्षरों में ‘वंदे मातरम्’ की जीवंत आकृति बनाई।
जैसे ही प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया, भारतीय वायुसेना के दो Mi-17 1V हेलीकॉप्टरों ने आसमान से उपस्थित दर्शकों पर गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा की। पहले हेलीकॉप्टर पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहरा रहा था, जबकि दूसरे हेलीकॉप्टर पर ‘वंदे मातरम् 150 वर्ष’ का प्रतीक चिन्ह अंकित था।
भारतीय थल सेना, नौसेना, वायुसेना और दिल्ली पुलिस के 150 सदस्यीय संयुक्त बैंड ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ ‘वंदे मातरम्’ की मधुर और ओजस्वी धुन प्रस्तुत की, जिसके साथ दर्शक दीर्घा में उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने खड़े होकर राष्ट्रगीत का सस्वर गायन किया।
महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को इस अमर गीत की रचना की थी। बाद में 1882 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इसे संन्यासी विद्रोह के संदर्भ में शामिल किया गया। इस गीत ने भारत भूमि को साक्षात ‘माता’ के रूप में प्रतिष्ठित कर देशवासियों के हृदय में राष्ट्रभक्ति का संचार किया।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इस गीत को अपनी मधुर आवाज में गाकर इसे राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की, तब ‘वंदे मातरम्’ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति का सबसे शक्तिशाली हथियार बना। सड़कों पर जुलूस निकालते समय, लाठियां खाते समय और ब्रिटिश जेलों में यातनाएं सहते समय क्रांतिकारियों की जुबान पर केवल एक ही शब्द होता था—वंदे मातरम्।
खुदीराम बोस, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद जैसे अनगिनत हुतात्माओं ने फांसी के फंदे को चूमते हुए इसी गीत को अपना अंतिम उद्घोष बनाया था।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के ऐतिहासिक सत्र में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आधिकारिक घोषणा करते हुए कहा था कि:
“गीत ‘वंदे मातरम्’, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समकक्ष समान आदर और समान दर्जा प्राप्त होगा।”
इस वर्ष के समारोह को ‘जन-भागीदारी’ का प्रतीक बनाते हुए सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से 5,000 से अधिक ‘विशेष अतिथियों’ (Special Guests) को आमंत्रित किया था देश की उत्तरी सीमाओं पर स्थित सुदूर वाइब्रेंट विलेज (Vibrant Villages) के सरपंच और स्थानीय नागरिक।
ओलंपिक, पैरालंपिक और विश्व चैंपियनशिप में भारत का परचम लहराने वाले युवा एथलीट। कृषि क्षेत्र में नवाचार करने वाले प्रगतिशील किसान, ड्रोन दीदियां और ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मी। अंतरिक्ष, रोबोटिक्स और एआई क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने वाले युवा इनोवेटर्स।
80वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर लाल किले की प्राचीर से गूंजा ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत की औपचारिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों के आत्मसम्मान, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक महाशक्ति बनने के अदम्य संकल्प का शंखनाद है।
यह ऐतिहासिक दिन देशवासियों को स्मरण कराता है कि जिस राष्ट्रगीत ने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया था, वही ‘वंदे मातरम्’ आज 2047 के स्वर्णिम भारत के निर्माण का सबसे बड़ा मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बना हुआ है।



