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बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल विवाद का ऐतिहासिक स्थायी समाधान: 7.75 MAF पानी के बंटवारे पर ऐतिहासिक समझौता

गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में एमओयू पर हस्ताक्षर, लाखों किसानों को मिलेगा सिंचाई व पेयजल

पूर्वी भारत के जल संसाधन प्रबंधन और अंतरराज्यीय संबंधों के इतिहास में एक युगांतरकारी अध्याय जुड़ गया है। बिहार और झारखंड के बीच पिछले लगभग 25 वर्षों (नवंबर 2000 में झारखंड के गठन के बाद) से चले आ रहे सोन नदी जल बंटवारे के जटिल और संवेदनशील विवाद का स्थायी समाधान निकाल लिया गया है।
सोमवार को नई दिल्ली स्थित गृह मंत्रालय के तत्वावधान में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की गरिमामयी उपस्थिति में दोनों राज्यों के बीच 7.75 मिलियन एकड़-फीट (Million Acre-Feet – MAF) पानी के पारस्परिक बंटवारे के लिए एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU – Memorandum of Understanding) पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए गए।
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत अविभाजित बिहार को 1973 के बाणसागर समझौते से मिले कुल 7.75 MAF पानी में से बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2.00 MAF जल का वैधानिक आवंटन तय किया गया है।
हस्ताक्षर समारोह में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, बिहार के जल संसाधन मंत्री सह उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी, केंद्रीय गृह सचिव और दोनों राज्यों के शीर्ष जल संसाधन अधिकारी उपस्थित रहे।
केंद्र सरकार ने इस समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘टीम भारत’ दृष्टिकोण और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की ऐतिहासिक जीत करार दिया है, जिसने दक्षिण बिहार के ‘चावल के कटोरे’ कहे जाने वाले शाहाबाद क्षेत्र और झारखंड के सूखा प्रवण पलामू-गढ़वा प्रमंडल में जल सुरक्षा की नई नींव रखी है।
16 सितंबर 1973 को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सोन नदी पर बनने वाले बाणसागर बांध के निर्माण, लागत और जल बंटवारे को लेकर त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। सोन बेसिन के 14.25 MAF आकलित जल में से मध्य प्रदेश को 5.25 MAF, उत्तर प्रदेश को 1.25 MAF, और अविभाजित बिहार को 7.75 MAF पानी आवंटित किया गया था।
15 नवंबर 2000 को जब बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना, तो सोन नदी की कई प्रमुख सहायक नदियों (जैसे उत्तर कोयल, कन्हार, औरंगा) का जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) और पहाड़ी बेसिन झारखंड के हिस्से में चला गया। झारखंड सरकार का कहना था कि चूंकि सोन बेसिन का बड़ा जलग्रहण क्षेत्र और वर्षा जल उसके पहाड़ी इलाकों से आता है, इसलिए उसे 7.75 MAF में से बड़ा हिस्सा (कम से कम 2.5 से 3 MAF) मिलना चाहिए। बिहार सरकार का तर्क था कि 1973 का समझौता राज्य के मैदानी इलाकों में 1874 से संचालित ऐतिहासिक सोन नहर प्रणाली (Sone Canal System) और दक्षिण बिहार के लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई आवश्यकताओं के आधार पर हुआ था, इसलिए उसके आवंटित कोटे में कटौती नहीं की जा सकती।
पिछले दो दशकों में केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतरराज्यीय परिषदों की दर्जनों बैठकें हुईं, लेकिन बराज की ऊंचाई, झारखंड के सीमावर्ती गांवों में डूब क्षेत्र (Land Submergence) और मुआवज़े को लेकर बात अटकती रही। गतिरोध तब टूटा जब 10 जुलाई 2025 को रांची में आयोजित 27वीं पूर्वी क्षेत्रीय परिषद (Eastern Zonal Council) की बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों मुख्यमंत्रियों के साथ आमने-सामने बैठकर वैज्ञानिक डेटा के आधार पर समाधान का फॉर्मूला तैयार किया।
समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस समझौते के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय महत्व को रेखांकित किया:
“आज का दिन बिहार और झारखंड दोनों राज्यों की करोड़ों जनता और विशेष रूप से अन्नदाता किसानों के लिए एक ऐतिहासिक और स्वर्णिम दिन है। सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर पिछले 25 वर्षों से बना गतिरोध आज हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। 7.75 MAF पानी का यह सौहार्दपूर्ण बंटवारा दोनों राज्यों के कृषि परिदृश्य को बदल देगा। इससे बिहार के 8 जिलों और झारखंड के पलामू-गढ़वा में न केवल सुनिश्चित सिंचाई पहुंचेगी, बल्कि पीने के पानी का स्थायी समाधान होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार अंतरराज्यीय विवादों को मुकदमेबाजी और ट्रिब्यूनलों के बजाय आपसी संवाद और ‘टीम भारत’ की भावना से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है। सभी राज्यों की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन जब हम एक टीम के रूप में राष्ट्रीय हित में आगे बढ़ते हैं, तो कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जिसका समाधान न हो सके। यह समझौता दर्शाता है कि राजनीतिक विचारधाराएं अलग होने के बावजूद जब जनता और किसानों के हित की बात आती है, तो सहकारी संघवाद की जीत होती है।”
अमित शाह, केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री
गृह मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2026 में अंतरराज्यीय परिषद के माध्यम से सुलझाया गया यह चौथा बड़ा जल समझौता है किशाऊ बहुउद्देश्यीय बांध परियोजना पर उत्तरी राज्यों के बीच सहमति (16 जून 2026)। यमुना जल समझौता (राजस्थान और हरियाणा के बीच – 29 जून 2026)। नर्मदा ट्रिब्यूनल अवार्ड बकाया निपटान (महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश – 7 जुलाई 2026)। सोन नदी जल समझौता (बिहार और झारखंड – 31 अगस्त 2026)।
बिहार को आवंटित 5.75 MAF जल राज्य के 8 प्रमुख जिलों भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना के लिए जीवन रेखा साबित होगा रोहतास, कैमूर और भोजपुर जिलों में धान और गेहूं की खेती पूरी तरह सोन नहर प्रणाली पर निर्भर है। पिछले कई वर्षों से ग्रीष्मकाल और खरीफ सीजन में पानी की कमी के कारण नहरों के टेल-एंड (अंतिम छोर) तक पानी नहीं पहुंच पाता था। 5.75 MAF के वैधानिक आवंटन से अब पूरे कमांड क्षेत्र को नियमित पानी मिलेगा।
समझौते के तहत झारखंड सरकार ने रोहतास जिले में स्थित इंद्रपुरी बराज/जलाशय के सुदृढ़ीकरण और अतिरिक्त जल भंडारण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने पर सहमति जताई है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि इस समझौते से प्रस्तावित सोन-फल्गु लिंक परियोजना को गति मिलेगी। सोन नदी का अतिरिक्त पानी नहरों के जरिए गया की सूखी फल्गु नदी में पहुंचाया जाएगा, जिससे गया में भूजल स्तर सुधरेगा और विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले के दौरान देश-विदेश से आने वाले लाखों तीर्थयात्रियों को ‘पिंडदान’ और ‘तर्पण’ के लिए पवित्र जल की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
झारखंड को मिले 2.00 MAF वैधानिक जल ने राज्य के सर्वाधिक पिछड़े और सूखा प्रभावित पलामू प्रमंडल (Palamu Division) के भाग्य को बदल दिया है पलामू और गढ़वा जिले ऐतिहासिक रूप से सूखे, वर्षा की कमी और गिरते भूजल स्तर से जूझते रहे हैं। 2.00 MAF पानी का कोटा मिलने के बाद झारखंड सरकार अब सोन और उसकी सहायक नदियों से कई बड़ी पाइपलाइन और लिफ्ट सिंचाई (Lift Irrigation) परियोजनाएं शुरू कर सकेगी, जिससे किसानों को सिंचाई और गांवों को पेयजल मिलेगा।
झारखंड के लातेहार-पलामू सीमा पर स्थित उत्तर कोयल (मंडल) जलाशय परियोजना 1970 के दशक से अधूरी पड़ी थी। बेतला नेशनल पार्क के डूब क्षेत्र और बिहार-झारखंड के बीच विवाद के कारण इस पर काम रुका था। अब नए समझौते और तय ऊंचाई के तहत इसके गेट लगाने और डाउनस्ट्रीम वितरण का काम तेजी से पूरा हो सकेगा। झारखंड के स्थानीय गांवों को डूबने से बचाने के लिए बराज और जलाशयों के जलस्तर (Water Level) को वैज्ञानिक रूप से तय किया गया है, जिसमें पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा के कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं।
समझौते के बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसे पूर्वी भारत के विकास का टर्निंग पॉइंट बताया:
  • झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा:
    “आज हमारे राज्य के लिए विशेष रूप से पलामू और गढ़वा की जनता के लिए ऐतिहासिक दिन है। 25 वर्षों से झारखंड अपने वाजिब जल अधिकार की प्रतीक्षा कर रहा था। गृह मंत्री अमित शाह जी की मध्यस्थता और सकारात्मक संवाद से आज हमें 2.00 MAF पानी का कानूनी अधिकार मिला है। यह समझौता दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच भाईचारे, विश्वास और समावेशी विकास की नई मिसाल पेश करेगा।”
  • बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा:
    “यह समझौता केवल पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि बिहार और झारखंड के विकास के साझा संकल्प का प्रमाण है। 5.75 MAF पानी हमारे दक्षिण बिहार के 8 जिलों के किसानों की समृद्धि का आधार बनेगा। हम प्रधानमंत्री जी और गृह मंत्री जी के आभारी हैं जिन्होंने 25 साल पुराने इस गतिरोध को संवाद के जरिए सुलझाकर एक नया इतिहास रच दिया है।”
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल समझौते पर हुआ यह ऐतिहासिक हस्ताक्षर भारतीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे की परिपक्वता को दर्शाता है।
ऐसे समय में जब देश के कई हिस्सों में अंतरराज्यीय नदी जल विवाद दशकों तक अदालतों और ट्रिब्यूनलों में खिंचते रहते हैं, बिहार और झारखंड ने यह साबित कर दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और परस्पर विश्वास के जरिए किसी भी जटिल गतिरोध को सौहार्दपूर्ण तरीके से समाप्त किया जा सकता है। यह समझौता आने वाले दशकों में दोनों राज्यों के करोड़ों नागरिकों की कृषि, पेयजल और आर्थिक समृद्धि का सबसे मजबूत आधार स्तंभ सिद्ध होगा।

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