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दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिलाओं को मिले वही पुराना पद

वेतन और पदनाम बनाए रखना ही काफी नहीं, कार्यस्थल पर मातृत्व के आधार पर भेदभाव पर 10 लाख रुपये का जुर्माना

भारत के श्रम कानून, कॉर्पोरेट कार्यसंस्कृति और कामकाजी महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के इतिहास में एक युगांतरकारी नजीर पेश करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में फैसला दिया है कि मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) से कार्यस्थल पर लौटने वाली प्रत्येक महिला कर्मचारी सामान्य तौर पर उसी पद (Same Position) पर बहाल होने की कानूनी हकदार है, जिस पर वह अवकाश पर जाने से ठीक पहले कार्यरत थी।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने 88 पृष्ठों के अपने विस्तृत निर्णय में निर्धारित किया कि यदि किसी वास्तविक, अनिवार्य और प्रमाणित संगठनात्मक कारण (Bona fide Organisational Reasons) से पुराना पद उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता (Employer) को महिला कर्मचारी को एक ऐसा समतुल्य पद (Equivalent Role) देना होगा, जो वेतन (Pay), ग्रेड (Grade), पद के दर्जे (Status), वरिष्ठता (Seniority), जिम्मेदारियों (Responsibilities), प्रबंधकीय व निर्णय लेने के अधिकार (Managerial Authority) और करियर में पदोन्नति के अवसरों (Career Growth Prospects) के मामले में लगभग पूरी तरह समान हो।
अदालत ने रेखांकित किया कि मातृत्व संरक्षण केवल छुट्टी देने और वेतन जारी रखने तक सीमित नहीं है। केवल पदनाम (Designation) और वेतन सुरक्षित रखकर किसी महिला के अधिकार छीन लेना, जिम्मेदारियों से मुक्त करना या उसे कम महत्व वाले विभाग में भेजना ‘अप्रत्यक्ष पदावनति’ (Constructive Demotion) और मातृत्व के आधार पर किया गया अवैध भेदभाव है।
हाईकोर्ट ने एक निजी कंपनी द्वारा मातृत्व अवकाश से लौटी एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) महिला को दरकिनार करने के मामले में कंपनी पर 10 लाख रुपये का मुआवजा और 1.5 लाख रुपये का अदालती खर्च (कुल 11.5 लाख रुपये) अदा करने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) के तहत अगले 6 महीनों के भीतर कार्यस्थल पर मातृत्व संरक्षण, भूमिका संरक्षण, शिशुगृह (Creche) और शिकायत निवारण से जुड़े सख्त नियम अधिसूचित करे।
याचिकाकर्ता को जून 2022 में ₹2,60,000 प्रति माह के वेतन पर एक निजी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ‘मैनेजर (अकाउंटिंग)’ के रूप में नियुक्त किया गया था। मई 2023 में उन्होंने प्रबंधन को अपनी गर्भावस्था की सूचना दी। आरोप है कि सूचना देने के तुरंत बाद सितंबर 2023 में उनकी जिम्मेदारियों में कटौती कर उन्हें दूसरी टीम में स्थानांतरित कर दिया गया।
दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 तक मातृत्व अवकाश पूरा करने के बाद जब वे काम पर लौटीं, तो प्रबंधन ने उन्हें बताया कि उनकी मूल टीम में अब कोई पद रिक्त नहीं है। उन्हें ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, नए पद पर उनका कोई रिपोर्टिंग स्टाफ नहीं था, उन्हें कोर अकाउंटिंग और प्रबंधकीय बैठकों से बाहर कर दिया गया और उनके अधीन कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं था। इस दौरान उनके समकक्ष पुरुष सहकर्मियों को ‘सीनियर मैनेजर’ के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। विवश होकर महिला को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
कंपनी ने अदालत में तर्क दिया कि यह एक निजी कंपनी है, इसलिए इसके खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका विचारणीय नहीं है। महिला का वेतन, पदनाम (Manager) और वार्षिक इंक्रीमेंट सुरक्षित रखा गया था, इसलिए कोई पदावनति (Demotion) नहीं हुई।
पुनर्गठन संगठनात्मक आवश्यकताओं के तहत किया गया एक सामान्य प्रशासनिक कदम था। अदालत ने कंपनी के इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम एक सामाजिक कल्याणकारी विधान है और निजी संस्थान भी संविधान के मानवीय मूल्यों और मातृत्व सुरक्षा की बाध्यता से बाहर नहीं हो सकते।
अदालत ने कड़े शब्दों में कहा:
“कार्यस्थल पर किसी भी महिला के साथ केवल इसलिए असमान व्यवहार या पेशेवर नुकसान नहीं किया जा सकता क्योंकि वह मां बनी है। यदि किसी महिला कर्मचारी को गर्भावस्था या मातृत्व अवकाश के आधार पर पेशेवर विकास से वंचित किया जाता है, पदोन्नति से रोका जाता है, उसकी जिम्मेदारियां छीनी जाती हैं या किसी भी प्रतिकूल स्थिति में डाला जाता है, तो यह कृत्य न केवल मातृत्व लाभ अधिनियम की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे पर हमला है।”
कंपनी का तर्क था कि धारा 12 केवल नौकरी से बर्खास्तगी (Dismissal/Discharge) पर रोक लगाती है। अदालत ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया धारा 12(1) का दायरा केवल नौकरी से निकालने तक सीमित नहीं है। ‘सेवा की शर्तें’ (Conditions of Service) में कर्मचारी का वास्तविक काम, उसकी शक्तियां, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और पदोन्नति के अवसर शामिल हैं। यदि कोई कंपनी महिला की सैलरी जस की तस रखकर उससे सारे अधिकार छीन लेती है, तो वह कानूनन परोक्ष रूप से प्रताड़ित करने का अपराध करती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी रोजगार नीति जो किसी महिला को मातृत्व अधिकार का उपयोग करने पर दंडित करती है, या उसे ‘मातृत्व और करियर में आगे बढ़ने’ में से किसी एक को चुनने के लिए विवश करती है, वह सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध) का खुला उल्लंघन है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अपरिहार्य व्यावसायिक पुनर्गठन के कारण महिला का पद समाप्त हो गया है नियोक्ता को महिला के काम पर लौटने से पहले उसे लिखित रूप में स्थिति से अवगत कराना होगा। कंपनी को यह साबित करना होगा कि पद हटाने का कारण वास्तविक और मातृत्व से असंबंधित था। प्रस्तावित नए पद की पूरी जानकारी (ग्रेड, वेतन, रिपोर्टिंग संरचना और कर्तव्य) पहले देनी होगी, और यदि महिला कोई आपत्ति दर्ज करती है, तो उस पर विचार कर तार्किक आदेश देना होगा।
अदालत ने ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित विभिन्न कॉमन लॉ न्यायक्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि विकसित देशों में मातृत्व को केवल अवकाश का अधिकार नहीं माना जाता, बल्कि अवकाश के बाद उसी रुतबे, अधिकार और प्रतिष्ठा के साथ काम पर लौटने का सुरक्षित अधिकार माना जाता है।
अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत अवकाश तो मिलता है, लेकिन अवकाश के बाद कार्यस्थल पर महिला के पुनर्नियोजन (Reintegration), पद की सुरक्षा और डिमोशन से बचाव के लिए कोई स्पष्ट नियामक तंत्र मौजूद नहीं है।
अदालत ने केंद्र सरकार (श्रम एवं रोजगार मंत्रालय) को निर्देश दिया सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए केंद्र सरकार राज्य सरकारों और उद्योग मंडलों (FICCI, CII आदि) से परामर्श करे। अगले 6 महीनों के भीतर व्यापक नियम, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।
इन नियमों में निम्नलिखित बिंदुओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए मातृत्व अवकाश के बाद पद, ग्रेड और जिम्मेदारियों की निरंतरता की सुरक्षा। कार्यस्थल पर स्तनपान (Lactation Support) के लिए अनुकूल वातावरण और समय। 50 से अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों में शिशुगृह (Creche) की अनिवार्य स्थापना और पारदर्शिता। मातृत्व संबंधी शिकायतों के निपटारे के लिए सख्त समय-सीमा (Grievance Redressal Timelines) और प्रतिशोध (Retaliation) से सुरक्षा।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला भारत के निजी क्षेत्र, आईटी कंपनियों, स्टार्टअप्स और बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के मानव संसाधन (HR) विभागों के लिए एक बड़ा ‘वेक-अप कॉल’ है कई कंपनियों में यह आम प्रथा थी कि 6 महीने की छुट्टी से लौटने वाली महिला को ‘कम महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स’ या सपोर्ट रोल्स में डाल दिया जाता था, जिससे तंग आकर महिलाएं इस्तीफा दे देती थीं। अब ऐसा करना सीधे तौर पर अदालत की अवमानना और भारी वित्तीय जुर्माने का कारण बनेगा।
अब यदि कोई कंपनी किसी महिला का विभाग बदलती है, तो उसे यह सिद्ध करने के लिए पुख्ता ऑडिट ट्रेल और व्यावसायिक कारण प्रस्तुत करने होंगे कि यह निर्णय उसके मातृत्व से प्रेरित नहीं था। भारत में कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी (FLFP) में मातृत्व के बाद भारी गिरावट दर्ज की जाती रही है। यह फैसला महिलाओं को यह भरोसा देगा कि मां बनने का अर्थ उनके करियर का अंत नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह 88 पृष्ठों का ऐतिहासिक फैसला केवल एक महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों कामकाजी कार्यबल के लिए एक प्रगतिशील घोषणापत्र है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मातृत्व कोई व्यक्तिगत रियायत नहीं, बल्कि समाज के अस्तित्व की धुरी है। किसी भी आधुनिक, सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में किसी महिला को इस बात की सजा नहीं दी जा सकती कि उसने मातृत्व का चयन किया। वेतन और पदनाम की औपचारिकता से आगे बढ़कर वास्तविक जिम्मेदारियों, प्रबंधकीय अधिकारों और करियर की उड़ानों को सुरक्षित रखने का यह न्यायिक आदेश भारत में लैंगिक समानता (Gender Equality) की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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