
2025 में महिलाओं की सुरक्षा पर बात करना आज भी उतना ही ज़रूरी है, जितना सालों पहले था। देश भर में कानूनों की संख्या बढ़ती जा रही है, पुलिस की रणनीतियाँ बदल रही हैं, लेकिन असली सवाल है क्या आम भारतीय महिला खुद को वाकई सुरक्षित महसूस करती है?
2025 की रिपोर्ट बताती है कि आज भी 40% महिलाएँ अपने शहर या इलाके को ‘सुरक्षित’ नहीं मानतीं। सिर्फ़ छह में से चार महिलाएँ ही दिन में स्कूल, दफ्तर या बाजार में खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन शाम या रात होते ही डर लौट आता है। मुंबई, कोहिमा, विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर जैसे शहर सबसे सुरक्षित माने गए, जबकि दिल्ली, पटना, जयपुर, कोलकाता सबसे असुरक्षित हैं। शहरों में सुरक्षा की वजह मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, सक्रिय पुलिस और नागरिक भागीदारी है। वहीं कमजोर शहरों में पुरानी सोच, कानून का डर न होना और कमजोर प्रशासन कारण हैं।
पिछले कई सालों में दहेज, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर सुरक्षा, और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी कई कानून बने हैं। महिला हेल्पलाइन, वन स्टॉप सेंटर, निर्भया फंड जैसी सरकारी मिसालें बढ़ी हैं। बावजूद इसके, पीड़िता की शिकायत दर्ज कराने में डर, शर्म, केस के लंबा चलने का डर और समाजिक कलंक जैसी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं। सरकार की तरफ से महिला सुरक्षा के लिए पैसे और सिस्टम जरूर बढ़े हैं, लेकिन हर महिला को जब असली ज़िंदगी में डर लगे, तो कानून कागज पर ही रह जाता है।
चुनौती है रात में सफर करते वक्त, सार्वजनिक वाहन में, पड़ोस या अजनबी से डर का सामना करना। अधिकांश महिलाएँ छेड़छाड़, उत्पीड़न के मामलों को रिपोर्ट ही नहीं करतीं, और जो करती हैं उनमें से भी ज्यादातर को संतोषजनक न्याय नहीं मिलता। पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक जगहों पर 7% महिलाओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, और यह आंकड़ा युवाओं में दोगुना है। भारतीय समाज में संकोच, शर्म और न्याय प्रणाली पर भरोसे की कमी ने यह समस्या और बढ़ा दी है।
घर, स्कूल, दफ्तर से लेकर बाजार तक असली सुरक्षा सिर्फ़ कैमरों, पुलिस या कानून से नहीं आती, बल्कि समाज की सोच से आती है। महिलाओं की सुरक्षा तब असली होगी, जब हर आदमी, हर परिवार, और हर संस्था लड़कियों व महिलाओं को बराबर, सम्मानजनक और आत्मनिर्भर माने। अब भी 38% महिलाओं को पड़ोस में और 29% को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में उत्पीड़न का डर सताता है। रिपोर्टिंग में भरोसा केवल 25% महिलाओं को है कि उनकी समस्याओं पर पुलिस या संस्था कार्रवाई करेगी।
यह ज़रूरी है हर इलाके में स्ट्रीट लाइट, कैमरा, सुरक्षित ट्रांसपोर्ट, और महिला पुलिस हो; स्कूल-कॉलेज में लड़कों को भी सम्मान का पाठ पढ़ाया जाए; केस दर्ज करने और पैरवी का सिस्टम आसान और सहायक हो; मीडिया डर, अफवाह या सनसनी से परे, सुरक्षा और जागरूकता की सकारात्मक बातें प्रसारित करे; समाज पीड़िता को दोषी मानने के बजाय उसे हौसला और सुरक्षा दे।
भारत टेक्नॉलॉजी, चाँद, स्पोर्ट्स और वैज्ञानिक कामयाबी में आगे बढ़ रहा है। लेकिन महिलाओं की सुरक्षा का सवाल केवल कानून या पुलिस नहीं, रोजाना के जीवन और सामाजिक सोच में छुपा है। जब हर महिला दिन-रात, घर-दफ्तर-रास्ते पर बिना डर के ज़िन्दगी जिए तभी असली सुरक्षा संभव है। कानून और सिस्टम से ज़्यादा ज़रूरी है समाज में भरोसा, इज्ज़त और मदद की भावना। महिलाओं की सुरक्षा किसी एक व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे परिवार, समाज और सरकार की है। तभी 2025 के भारत में महिलाएँ हिम्मत, स्वतंत्रता और भरोसे के साथ आगे बढ़ सकेंगी.



