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दिल्ली हाई कोर्ट के नए फ़ैसले ने खोला संवाद का नया रास्ता

कामकाजी पत्नी और अलिमनी : बदलते कानून, बदलती सोच

​आज देश में शादीशुदा ज़िंदगी का मतलब सिर्फ़ रिश्तों का बनना या टूटना नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल है अगर रिश्ता खत्म होता है, तो पत्नी या पति को कितना और किस बात का हक़ मिलना चाहिए? खासकर महिलाओं के हक़ में “गुज़ारा भत्ता” यानी अलिमनी की चर्चा कई सालों से होती रही है। लेकिन हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए कहा अगर पत्नी खुद आत्मनिर्भर है, नौकरी में है या आमदनी अच्छी है, तो उसे गुज़ारा भत्ता का हक़ नहीं। यह फ़ैसला हमारी सोच, क़ानून और सामाजिक मानकों को नई दिशा देने वाला है।

पहले जब पति-पत्नी अलग होते थे, तो महिला को ‘कमज़ोर’ और ‘आश्रित’ मानकर कोर्ट अक्सर भत्ता देने का आदेश देता था। वह भत्ता उसकी ज़रूरत या जीवन यापन के लिए तय किया जाता था, मानो लाइफलाइन या सैफ्टी नेट हो। लेकिन आज बड़ी संख्या में महिलाएँ पढ़ी-लिखी हैं, नौकरी करती हैं, अपने नाम से संपत्ति रखती हैं और आर्थिक फैसले भी खुद लेती हैं।​

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा भत्ता अब किसी का हमेशा का अधिकार नहीं, बल्कि केवल जरूरतमंद या आर्थि‍क रूप से असहाय महिला के लिए “सुरक्षा-बाल” है। कोर्ट ने साफ़ किया, “दोनों पति-पत्नी अगर सक्षम या आत्मनिर्भर हैं, तो सिर्फ बराबरी के लिए या जिंदगी स्तर ऊँचा करने के लिए भत्ता नहीं दिया जा सकता।”​

यह फ़ैसला महिला सशक्तिकरण की असल तस्वीर दिखाता है। अब महिला होना मतलब आश्रित होना नहीं। कानून भी यही कहता है अगर कोई महिला अपने पैरों पर खड़ी है, उसे भत्ता लेना ही है, यह सोच सही नहीं। दूसरी ओर, जो महिलाएँ सच में ज़रूरतमंद हैं, उनके लिए ‘गुज़ारा भत्ता’ आज भी पूरी तरह लागू है। यह संदेश हर महिला को आत्मनिर्भर बनने, पढ़ाई-लिखाई, स्किल, सेविंग्स और अपने फैसलों की ताकत अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह महिला-पुरुष दोनों ही को परिवार की साझी ज़िम्मेदारी और स्वाभिमान की शिक्षा देता है।

एक नई दुविधा यह है कि बहुत-सी महिलाएँ आंशिक रूप से कमाती हैं उनकी आमदनी नाममात्र है या वे दोनों बच्चों के पालन, बूढ़े लोगों की देखभाल, या घरेलू काम में व्यस्त हैं। कोर्ट को यही ध्यान रखना होगा कि आत्मनिर्भरता के नाम पर, किसी सचमुच कमजोर महिला का हक़ न मारा जाए।

साथ ही, पुरुष पक्ष के लिए भी यह राहत है कि आर्थिक बराबरी की स्थिति में, उसे भत्ता का दबाव नहीं झेलना होगा। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे बदलावों का सही असर तभी दिखेगा जब समाज में महिलाओं के लिए पढ़ाई, नौकरी और स्वावलंबन के पर्याप्त अवसर हों।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फ़ैसला दरअसल आज के भारत की बदलती सोच का परिचायक है। “गुज़ारा भत्ता” अब ‘तलाक में पत्नी का हक’ नहीं, बल्कि असहाय या ज़रूरतमंद व्यक्ति के लिए ‘सुरक्षा’ का साधन है। यह फ़ैसला महिला सम्मान, आत्मसम्मान और आर्थिक आज़ादी के विचार को मज़बूती देती है। अब ज़रूरत यही है कि हर महिला और परिवार सामाजिक बदलाव के इस दौर में आत्मनिर्भरता और ईमानदारी से अपने रास्ते बनाएं, कानून में सही मामले सामने जाएं, और समाज हर स्तर पर महिलाओं की योग्यता और ज़रूरत के फर्क को समझे।​

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