मयमनसिंह, बांग्लादेश से आई एक खबर ने न केवल उस देश को, बल्कि पूरी दुनिया को दहला दिया है। दीपू चंद्र दास, जो एक हिंदू परिवार से ताल्लुक रखते थे, उन्हें एक उग्र भीड़ ने इस बेरहमी से पीटा कि उनकी जान चली गई। बात यहीं खत्म नहीं हुई; उनकी मौत के बाद उनके शरीर को आग के हवाले कर दिया गया। यह खबर सुनकर मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है क्या हम वाकई एक सभ्य समाज में रह रहे हैं? या हम वापस उस दौर में जा रहे हैं जहाँ ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का कानून चलता था?
जब कोई भीड़ किसी इंसान को घेरकर मारती है, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं करती, बल्कि वह उस देश के संविधान और कानून की भी हत्या करती है। दीपू चंद्र दास की हत्या ‘मॉब जस्टिस’ (भीड़ का न्याय) का एक ऐसा उदाहरण है, जो दरअसल न्याय नहीं, बल्कि सरेआम किया गया कत्ल है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यह अधिकार सिर्फ अदालत के पास है कि वह तय करे कि कौन अपराधी है और कौन नहीं। लेकिन जब भीड़ खुद जज और जल्लाद बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि वहां का प्रशासन और पुलिस पूरी तरह नाकाम हो चुके हैं।
इस घटना का सबसे डरावना पहलू यह है कि मरने के बाद शव को जला दिया गया। यह नफरत की उस चरम सीमा को दिखाता है जहाँ इंसान के मन से दया और सम्मान पूरी तरह खत्म हो चुका है। जब भीड़ को लगता है कि वे किसी खास धर्म या समुदाय के खिलाफ हिंसा करके ‘पुण्य’ का काम कर रहे हैं, तो समझ लेना चाहिए कि समाज में कट्टरपंथ का जहर बहुत गहरा फैल चुका है।
अक्सर हम अखबारों में ऐसी खबरें पढ़ते हैं और अगले दिन भूल जाते हैं। लेकिन जो लोग वहां अल्पसंख्यक (माइनॉरिटी) के तौर पर रह रहे हैं, उनके लिए यह खबर सिर्फ एक ‘हेडलाइन’ नहीं है। यह उनकी रोज की जिंदगी का डर है। बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। कभी उनके घरों को निशाना बनाया जाता है, तो कभी उनके धर्मस्थलों को।
यह अब सिर्फ एक देश का अंदरूनी मामला नहीं रह गया है। यह ‘मानवाधिकार’ यानी इंसान होने के नाते मिलने वाले अधिकारों का बड़ा मुद्दा है। दुनिया में कहीं भी अगर किसी इंसान को सिर्फ इसलिए मार दिया जाए कि वह एक अलग भगवान को मानता है, तो यह पूरी मानवता के लिए शर्म की बात है।
सिर्फ निंदा करने या दुख जताने से कुछ नहीं बदलेगा। अगर दीपू चंद्र दास को वाकई इंसाफ देना है, तो सरकार को कुछ कड़े फैसले लेने होंगे जब तक भीड़ में शामिल लोगों को यह डर नहीं होगा कि उन्हें फांसी या उम्रकैद हो सकती है, तब तक ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी। सजा इतनी कड़ी और जल्दी होनी चाहिए कि कोई दोबारा ऐसा करने की हिम्मत न करे। जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां की पुलिस क्या कर रही थी? क्या उन्हें भनक नहीं लगी? पुलिस अफसरों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि वे अपनी ड्यूटी ठीक से निभाएं।नफरत को सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि सही सोच से मिटाया जा सकता है। स्कूलों और मोहल्लों में लोगों को यह समझाना होगा कि धर्म से बड़ा इंसानियत का रिश्ता होता है।
दीपू चंद्र दास की हत्या ने हमें आईना दिखाया है। यह आईना हमें बताता है कि अगर हम चुप रहे, तो कल यह नफरत किसी और के दरवाजे पर भी दस्तक देगी। मयमनसिंह की यह घटना एक चेतावनी है। हमें तय करना होगा कि हमें कैसा समाज चाहिए ऐसा समाज जहाँ कानून का राज हो, या ऐसा समाज जहाँ भीड़ ही सब कुछ तय करे।



