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आर्थिक उछाल के आँकड़ों के बीच असमानता, महँगाई और वास्तविक रोज़गार की चुनौतियों की पड़ताल

आँकड़ों का जश्न और ज़मीनी बेचैनी

भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़े आज दुनिया का ध्यान खींच रहे हैं। IMF ने वित्त वर्ष 2025 के लिए भारत की वृद्धि दर को 6.5 प्रतिशत के आसपास आँका है, जिससे भारत को “विश्व की सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था” कहा जा रहा है। लेकिन क्या यह कहानी पूरी है?

जब शहरों की ऊँची इमारतों और डिजिटल क्रांति की तस्वीरें चमकती हैं, तब गाँवों के खेतों में काम करने वाले हाथ थकावट और अनिश्चितता से झुके नज़र आते हैं। लाखों परिवारों की आय महँगाई की रफ्तार से नहीं चल पा रही, नौकरियों की गुणवत्ता घट रही है, और उपभोक्ता विश्वास में असंतुलन बढ़ रहा है। सरकार और उद्योग जगत इस प्रगति का स्वागत कर रहे हैं, पर सवाल अब यह है कि क्या यह विकास केवल अर्थशास्त्र की तालिकाओं में ही सीमित है या हर घर तक पहुँचा भी है?

हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक कहानी मुख्य शहरों के इर्द-गिर्द घुमती रही है। टेक्नोलॉजी, वित्तीय सेवाओं और ई-कॉमर्स ने शहरी अर्थव्यवस्था को गति दी है। इन क्षेत्रों ने विदेशी निवेश और रोजगार दोनों को बढ़ाया है, लेकिन इसका लाभ केवल आबादी के एक छोटे हिस्से तक सीमित रह गया है। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु, मुंबई और गुरुग्राम जैसे शहरों में IT क्षेत्र नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। वहीं ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसर ठहराव की स्थिति में हैं। कृषि और ग्रामीण उद्योगों में उत्पादकता कम है, और मजदूरी दरों में वास्तविक वृद्धि नहीं हो रही।

यहाँ तक कि ग्रामीण उपभोक्ताओं की खपत भी कम हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वे बताते हैं कि पिछले पाँच सालों में ग्रामीण उपभोग की वृद्धि दर शहरी क्षेत्रों से आधी रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विकास की यह चकाचौंध ग्रामीण भारत के अंधेरे हिस्सों तक नहीं पहुँच पाई है।

आर्थिक असमानता आज भारतीय समाज में जितनी गहराई से पैठ चुकी है, उतनी शायद पहले कभी नहीं थी। ऊँचे आय वर्ग के लोगों की खपत, संपत्ति और निवेश अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि निम्न और मध्यम वर्ग की आमदनी महँगाई के सामने टिक नहीं पा रही। हाल के समाजशास्त्रीय अध्ययनों का कहना है कि देश के शीर्ष 10 प्रतिशत लोग कुल राष्ट्रीय संपत्ति के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। वहीं आधी आबादी अभी भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्षरत है।

महँगाई ने इसमें और आग लगा दी है। खाद्य वस्तुओं, किराए और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों ने सामान्य परिवारों के बजट को हिला दिया है। यद्यपि सरकार महँगाई नियंत्रण के प्रयास कर रही है, पर उनकी वास्तविक राहत सीमित वर्ग तक ही महसूस होती है। भारत में बेरोज़गारी की समस्या केवल नौकरियाँ न होने की नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण रोजगार की है। नए स्नातक बड़ी उम्मीदों के साथ नौकरी बाज़ार में उतरते हैं, पर उन्हें अस्थायी अवसर या गिग इकॉनमी के छोटे अनुबंध ही मिलते हैं।

इन नौकरियों में वेतन कम, सुरक्षा सीमित और भविष्य अनिश्चित होता है। CMIE के आँकड़ों के मुताबिक, रोजगार दर में मामूली सुधार हुआ जरूर है, लेकिन अधिकांश नौकरियाँ असंगठित क्षेत्रों में हैं, जहाँ न्यूनतम वेतन, छुट्टियाँ या बीमा जैसी सुविधाएँ अनुपस्थित हैं। परिणामस्वरूप, युवा वर्ग में निराशा और सामाजिक असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। सुशिक्षित युवाओं का “सस्ते श्रमिक” बन जाना या विदेश पलायन का बढ़ना इस समस्या की गहराई को दिखाता है।

जब GDP आँकड़े ऊपर जा रहे हैं, तब ग्रामीण परिवारों की आमदनी स्थिर या घट रही है। कृषि लागत बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में वृद्धि ने किसानों की स्थिति और कमजोर कर दी है। कृषि क्षेत्र में निवेश अब भी सीमित है, और जो सुविधाएँ पहुँच रही हैं, वे क्षेत्रीय असमानताओं से ग्रस्त हैं। देश के कुछ हिस्सों में आधुनिक कृषि तकनीक और सिंचाई सुविधा उपलब्ध है, जबकि अन्य क्षेत्रों में किसान अब भी मानसून पर निर्भर हैं।

अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है तो केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि बाजार तक पहुँच और मूल्य सुनिश्चित करना भी अनिवार्य होगा। किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देना इस दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

भारत की आर्थिक नीति लंबे समय से GDP आधारित सफलता पर टिकी रही है। लेकिन आज जब दुनिया में “समावेशी और टिकाऊ विकास” की अवधारणा बढ़ रही है, भारत को भी अपने पैमाने बदलने की ज़रूरत है। विकास की गुणवत्ता और वितरण दोनों का मूल्यांकन आवश्यक है। अगर GDP के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु संतुलन जैसे मानकों को भी नीति का हिस्सा बनाया जाए, तो विकास का अर्थ कहीं अधिक व्यापक और मानवीय हो सकता है।

नीति-निर्माताओं के लिए इस समय यह चुनौती है कि वे आंकड़ों से परे जन-जीवन के बदलावों को समझें। किसी भी आर्थिक सुधार की वास्तविक सफलता वहीं मानी जाएगी जहाँ वह व्यक्ति के जीवन की स्थिरता और सम्मान को सुनिश्चित कर सके। भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जो उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। परंतु यह पूँजी तभी उपयोगी होगी जब उसे कौशल और अवसर दोनों मिलें।

राष्ट्रीय कौशल विकास नीति के तहत अनेक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए गए हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता और रोजगार से जुड़ाव को मजबूत करना अभी बाकी है। आज का रोजगार बाजार ऐसे कौशल चाहता है जो बदलती तकनीक के अनुकूल हों चाहे वह डिजिटल कौशल हो, हरित तकनीक या विनिर्माण क्षेत्र के आधुनिक अनुप्रयोग। ग्रामीण युवाओं के लिए स्थानीय उद्योग और हस्तशिल्प आधारित रोजगार योजनाएँ भी समावेशिता को बढ़ा सकती हैं। जब एक गाँव में कौशल प्रशिक्षण केंद्र खुलता है, तो वह केवल रोजगार नहीं देता, बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल देता है।

समावेशी विकास तभी संभव है जब हर नागरिक को जीवन के बुनियादी जोखिमों से सुरक्षा मिले। भारत में सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ जैसे उज्ज्वला, जनधन, आयुष्मान भारत, और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि ने सकारात्मक असर छोड़ा है, लेकिन इनकी पहुँच और प्रभाव को और गहराई तक बढ़ाना जरूरी है।

एक स्थायी सामाजिक सुरक्षा मॉडल जहाँ हर नागरिक के पास न्यूनतम आय, स्वास्थ्य बीमा और बुज़ुर्गावस्था में सुरक्षा हो भारत के विकास को असमानता से मुक्ति दिला सकता है। साथ ही, महिला कामगारों के लिए मातृत्व लाभ, बाल देखभाल सुविधाएँ और घरेलू श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र में लाना भी उस “समावेशी विकास” की आत्मा का हिस्सा है, जिसकी आज हमें जरूरत है।

आर्थिक प्रगति की रफ्तार ने प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक जोखिम बन चुके हैं। “ग्रीन ग्रोथ” की अवधारणा भारत के लिए अनिवार्य दिशा है। सौर ऊर्जा, जैविक कृषि और पुनर्चक्रण आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर हम रोजगार सृजन भी कर सकते हैं और पृथ्वी को राहत भी दे सकते हैं। भारत की नई नीतियों को “सतत विकास” को न केवल आदर्श, बल्कि व्यावहारिक एजेंडा बनाना होगा।

भारत में लोकतंत्र केवल शासन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विकास का आधार होना चाहिए। जब नीति-निर्माण में आम नागरिक की जरूरतें, छोटे व्यापारों की कठिनाइयाँ और किसानों की आवाज़ शामिल होती है तभी आर्थिक उछाल लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ता है। विकास को केवल ऊपर से नीचे तक पहुँचाने की कोशिश अब अतीत का मॉडल है। नई भारत यात्रा नीचे से ऊपर यानी गाँव, समुदाय और छोटे उद्यमों की भागीदारी से शुरू होनी चाहिए। यही वह रास्ता है जो विकास को टिकाऊ और न्यायपूर्ण बना सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में एक संभावनाओं की भूमि है। यहाँ विकास को इंजन की रफ़्तार देनी है, लेकिन साथ ही उसकी दिशा भी तय करनी है। अगर हम केवल GDP ग्राफ देखकर संतुष्ट रहेंगे, तो असमानता और सामाजिक असंतोष की खाई और गहरी होगी। पर अगर विकास के केंद्र में मनुष्य उसके श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा को रखा जाए, तो भारत आर्थिक रूप से नहीं, नैतिक रूप से भी विश्व की शक्ति बन सकता है।

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