इंटरनेट की आज़ादी या नया खतरा: ऑनलाइन उत्पीड़न और सहमति की नई कहानी
डिजिटल युग में सुरक्षा का सवाल

आज के समय में जैसे-जैसे हमारी ज़िंदगी डिजिटल होती जा रही है, हमारे लिए ऑनलाइन सुरक्षा और सम्मान की ज़रूरत भी और बढ़ गई है। इंटरनेट ने हमें नए रिश्ते, नई आज़ादी और अपनी आवाज़ रखने का मंच तो दिया, लेकिन इसके साथ ही यह एक ऐसी जगह भी बन गया है जहाँ महिलाओं और लैंगिक अल्पसंख्यकों को अकसर डर, अपमान और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इस बदलाव के बीच सबसे बड़ा सवाल है क्या हमारी डिजिटल आज़ादी असल में सुरक्षित और बराबरी वाली है?
अब ऑनलाइन उत्पीड़न सिर्फ़ बुरा कमेंट या ट्रोलिंग तक सीमित नहीं रहा। बिना सहमति के फोटो, वीडियो वायरल करना, डीपफेक, बदले की भावना से आईडी हैक करना, डराने वाली धमकियाँ भेजना या किसी महिला की निजता का उल्लंघन ये सब अब बेहद आम हो चुका है। 2025 के हालिया सर्वे के मुताबिक, भारत में 55% महिलाओं ने कभी न कभी साइबर उत्पीड़न का सामना किया है। विशेषकर युवा महिलाएँ, छात्राएँ और डिजिटल एक्टिविस्ट सबसे ज्यादा शिकार बनती हैं।
इंस्टाग्राम, फेसबुक और ट्विटर पर गाली-गलौज, धमकियाँ या छवि बिगाड़ने की घटनाएँ इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि पीड़िता अक्सर अपनी प्रोफाइल बंद कर देती है या ‘सेल्फ-सेंसर’ बन जाती है। इसके साथ ही, बहुत कम लोग पुलिस या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि कोई कार्रवाई होगी।
ऑफलाइन दुनिया में जहाँ ‘ना’ का मतलब ‘ना’ माना जाने लगा है, वही डिजिटल स्पेस में सहमति की बात अभी भी बेहद कमजोर है। लोग बिना पूछे किसी की फोटो, लुक या वॉयस का इस्तेमाल कर लेते हैं, डेटा शेयर कर देते हैं या किसी का डीपफेक बनाकर वायरल कर देते हैं। यह सिर्फ निजता के हनन का मामला नहीं यह आत्मसम्मान, सुरक्षित पहचान और मानसिक शांति पर भी हमला है।
आईटी एक्ट और भारतीय दंड संहिता जैसी कानूनों में साइबर अपराधों के लिए प्रावधान जरूर बने हैं, लेकिन असली दुनिया में इनका पालन और पीड़िता को न्याय मिलना अब भी बेहद मुश्किल है। नए डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन कानून की दिशा सही है, लेकिन वह डिजिटल सहमति, डीपफेक या इमोशनल और मनोवैज्ञानिक नुकसान को अब भी स्पष्ट नहीं पहचानता। कोर्ट-कचहरी में महीनों-बरसों तक चलने वाली लड़ाई और समाज से मिलने वाली “इग्नोर कर दो” वाली सलाह भी हालात बदतर बना देती है।
सोशल मीडिया कंपनियाँ अपने मंच पर लोगों की सक्रियता से कमाती तो बहुत हैं, लेकिन शिकायतों को सुलझाने, आपत्तिजनक कंटेंट हटाने या डिजिटल अपराधों की रोकथाम के लिए उनकी नीति साफ और असरदार बहुत कम है। रिपोर्ट करने वाली महिला को अकसर लंबे इंतज़ार, भावनाहीन जवाब या ‘मामला जांच में है’ सुनने को मिलता है। ज़रूरी है कि रिपोर्टिंग सिस्टम सरल, तेज और पीड़िता के पक्ष में हो, न कि अपराधी के।
आज लिंग न्याय सिर्फ घर या दफ्तर में भेदभाव खत्म करने की बात नहीं रही। ऑनलाइन नुकसान मानसिक तनाव, आत्मविश्वास में कमी और गंभीर ट्रॉमा की वजह बन जाता है। अगर स्कूल-कॉलेजों, परिवारों और कार्यस्थलों में डिजिटल नैतिकता, सहमति और सुरक्षित व्यवहार की शिक्षा दी जाए, तो युवा पीढ़ी को ऑनलाइन दुनिया के जोखिम और सम्मान का अहम पाठ मिल सकता है। साथ ही, साइबर सेल्स में लैंगिक विशिष्टता और साइकोलॉजिकल सपोर्ट ज़रूरी है जैसे डिजिटल फॉरेंसिक और काउंसलिंग दोनों आसानी से उपलब्ध हों।
जब कोई समाज ऑनलाइन दुर्व्यवहार पर चुप रहता है, तो वह असल दुनिया में भी हिंसा को, भेदभाव को जायज़ ठहरा देता है। असली बदलाव वहीं है जहाँ डिजिटल गरिमा और सहमति को मूल अधिकार की तरह माना जाए। पीड़िता को सशक्त बनाना, सोशल प्लेटफॉर्म को जवाबदेह ठहराना, कानूनों को अपडेट करना और डिजिटल संस्कृति में ‘सम्मान और सहमति’ को केंद्र में रखना यही आज लिंग न्याय के असली मायने हैं।
डिजिटल दुनिया जितनी तेज़ी से बदल रही है, कानून और समाज भी उतनी ही तेजी से बदलें, यही समय की मांग है। हमारी तरक्की का पैमाना सिर्फ तेज इंटरनेट या ज्यादा इंस्टॉल्ड ऐप्स नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए सुरक्षित, भरोसेमंद और संवेदनशील ऑनलाइन माहौल होना चाहिएत भी असली डिजिटल आज़ादी, बराबरी और इज्ज़त हर महिला और हर इंसान को मिल पाएगी।



