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सरेआम कत्ल, सरेआम सवाल: क्या बांग्लादेश में कानून का राज खत्म हो रहा है?

तीन हफ्ते, पांच हत्याएं: क्या नियंत्रण खो रहा है प्रशासन?

एक समय था जब बांग्लादेश की पहचान उसकी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुधारों से होती थी। लेकिन आज, ढाका से लेकर चटगाँव तक की गलियों में एक अलग ही सन्नाटा है यह शांति नहीं, बल्कि खौफ है। पिछले तीन हफ्तों में जिस तरह से सरेआम बाज़ारों और सार्वजनिक सड़कों पर हत्याएं हुई हैं, उसने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है क्या बांग्लादेश में आम नागरिक की जान की कोई कीमत बची है?

जब कोई व्यक्ति सब्जी खरीदने बाज़ार जाता है या काम से घर लौट रहा होता है, और उसे भीड़ या कुछ हमलावरों द्वारा सरेआम मौत के घाट उतार दिया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं होती। यह उस देश के ‘कानून के इकबाल’ की हत्या होती है।

बाज़ार किसी भी समाज की धड़कन होते हैं। वहां हलचल होती है, मेल-मिलाप होता है और जीवन का पहिया घूमता है। लेकिन पिछले दिनों बांग्लादेश के कई व्यस्त बाज़ारों में जो हुआ, वह किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं था। जब अपराधी इतने बेखौफ हो जाएं कि वे सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में हथियार निकालें और कत्ल करके आराम से निकल जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि पुलिस और खुफिया तंत्र का अस्तित्व केवल कागजों पर रह गया है। लोगों का पूछना वाजिब है कि “हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?” क्या पुलिस केवल वीआईपी सुरक्षा के लिए है?

बाज़ारों में हिंसा का असर केवल उन परिवारों तक सीमित नहीं रहता जिन्होंने अपनों को खोया है। इसका एक बड़ा आर्थिक पहलू भी है। जब बाज़ार ‘क्राइम सीन’ में तब्दील होने लगते हैं, तो लोग बाहर निकलने से कतराते हैं। दुकानदार शाम ढलते ही शटर गिरा देते हैं। निवेश रुक जाता है और डर का माहौल व्यापार को दीमक की तरह चाटने लगता है। सुरक्षा का अभाव अंततः देश को गरीबी की ओर धकेलता है।

आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। तीन हफ्तों के भीतर पांच बड़ी सार्वजनिक हत्याएं यह बताने के लिए काफी हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है। यह एक ‘पैटर्न’ बन चुका है। जब पहले कत्ल के बाद अपराधियों को तुरंत सजा नहीं मिलती, तो दूसरों का मनोबल बढ़ जाता है। “पकड़े जाने का डर” खत्म होना ही अराजकता की शुरुआत है। बांग्लादेश की सड़कों पर बढ़ती हिंसा यह संकेत देती है कि लोग अब कानून को अपने हाथ में लेना ‘न्याय’ समझने लगे हैं। चाहे वह राजनीतिक रंजिश हो या व्यक्तिगत विवाद, सरेआम कत्ल करना अब एक संदेश देने का जरिया बन गया है।

इतनी घटनाओं के बावजूद प्रशासन की ओर से जो प्रतिक्रिया आती है, वह अक्सर “हम जांच कर रहे हैं” तक सीमित रहती है। लेकिन जनता अब ठोस कार्रवाई चाहती है। अक्सर तर्क दिया जाता है कि हालिया राजनीतिक उथल-पुथल के बाद पुलिस का मनोबल गिरा हुआ है। लेकिन क्या यह तर्क किसी की जान बचाने से बड़ा हो सकता है? पुलिस का काम किसी पार्टी या विचारधारा की सेवा करना नहीं, बल्कि नागरिक की रक्षा करना है। यदि पुलिस अपनी ड्यूटी करने में ‘हिचकिचा’ रही है, तो यह राज्य की सबसे बड़ी विफलता है।

अराजक तत्व हमेशा राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाते हैं। जब प्रशासन ढीला होता है, तो आपराधिक गुट अपनी ज़मीन मज़बूत करने लगते हैं। बांग्लादेश को आज एक ऐसे ‘कठोर शासन’ की ज़रूरत है जो अपराधियों के मन में खौफ पैदा कर सके, न कि केवल बयानबाज़ी करे।

इन हत्याओं का सबसे बुरा असर आने वाली पीढ़ी पर पड़ रहा है। जो बच्चे बाज़ारों में या सोशल मीडिया पर इन हत्याओं के वीडियो देख रहे हैं, उनके मन में समाज के प्रति कैसी धारणा बनेगी? एक ऐसा समाज जहाँ हिंसा सामान्य बात हो जाए, वहां के लोग मानसिक रूप से बीमार होने लगते हैं। असुरक्षा की भावना इंसान को चिड़चिड़ा और हिंसक बना देती है। जब नागरिकों का भरोसा अपनी सरकार और पुलिस से उठ जाता है, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए ‘गलत रास्तों’ या ‘भीड़तंत्र’ का सहारा लेने लगते हैं। यह लोकतंत्र के लिए ज़हर के समान है।

हालात कितने भी खराब क्यों न हों, सुधार की गुंजाइश हमेशा होती है। बांग्लादेश को कुछ कड़े और तत्काल कदम उठाने होंगे बाज़ारों और सार्वजनिक स्थलों पर पुलिस की उपस्थिति केवल पेट्रोलिंग तक सीमित न हो, बल्कि अपराधियों में उनकी मौजूदगी का डर दिखना चाहिए। इन पांचों हत्याओं के मामलों को विशेष अदालतों में चलाया जाना चाहिए और महीनों के बजाय हफ्तों में सजा सुनाई जानी चाहिए। जब तक फांसी या उम्रकैद की खबरें हेडलाइंस नहीं बनेंगी, खौफ पैदा नहीं होगा।

हर बड़े बाज़ार को सीसीटीवी निगरानी में लाना होगा और अपराधियों की पहचान के लिए रीयल-टाइम तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। प्रशासन को स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर ‘मोहल्ला सुरक्षा समितियों’ का गठन करना चाहिए ताकि सूचनाओं का आदान-प्रदान तेज़ हो सके।

बांग्लादेश आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ वह रास्ता है जो उसे विकास और स्थिरता की ओर ले जाता है, और दूसरी तरफ वह ढलान है जो उसे गृहयुद्ध जैसी अराजकता और हिंसा के गर्त में धकेल सकती है। सार्वजनिक हत्याएं केवल सुरक्षा की समस्या नहीं हैं; ये देश की आत्मा पर लगे घाव हैं। यदि आज बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और सुरक्षा एजेंसियां नहीं जागीं, तो वह दिन दूर नहीं जब कोई भी नागरिक घर से बाहर निकलते समय अपने परिवार से ‘आख़िरी विदा’ लेकर निकलेगा।

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