युद्ध नहीं, एक चेतावनी: कैसे अमेरिका-वेनेजुएला तनाव लैटिन अमेरिका को बदल रहा है
तेल, प्रतिबंध और संप्रभुता: वेनेजुएला अमेरिका के लिए क्यों ज़रूरी है?

वेनेजुएला की राजधानी कराकस और अमेरिका के व्हाइट हाउस के बीच की दूरी हज़ारों मील हो सकती है, लेकिन इनके बीच का राजनीतिक तनाव पूरी दुनिया को महसूस होता है। वेनेजुएला, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, आज अपनी संप्रभुता (Sovereignty) और आर्थिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। वहीं अमेरिका के लिए वेनेजुएला एक ऐसी पहेली है जिसे वह दशकों से सुलझाने की कोशिश कर रहा है। आज का तनाव महज़ एक युद्ध की आहट नहीं है, बल्कि यह एक ‘चेतावनी’ है। यह चेतावनी है कि कैसे प्रतिबंधों (Sanctions) का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जा सकता है और कैसे तेल की राजनीति किसी देश को बना या बिगाड़ सकती है।
सवाल उठता है कि एक छोटा सा लैटिन अमेरिकी देश महाशक्ति अमेरिका की नींद क्यों उड़ाए हुए है? जवाब तीन अक्षरों में छिपा है OIL (तेल)। वेनेजुएला के पास सऊदी अरब से भी ज़्यादा कच्चा तेल है। अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा के लिए वेनेजुएला का तेल हमेशा से एक रणनीतिक संपत्ति रहा है। अमेरिका का आधिकारिक तर्क यह है कि वह वेनेजुएला में लोकतंत्र की बहाली चाहता है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि अमेरिका की असली दिलचस्पी वहां की सत्ता को अपने हिसाब से चलाने और तेल संसाधनों पर नियंत्रण पाने में है।
वाशिंगटन ने वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका इसे ‘लोकतंत्र के लिए दबाव’ कहता है, लेकिन वेनेजुएला इसे ‘आर्थिक युद्ध’ मानता है। जब अमेरिका वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर प्रतिबंध लगाता है, तो उसका असर केवल वहां की सरकार पर नहीं पड़ता। इसका असली असर वहां की आम जनता पर पड़ता है। वेनेजुएला में मुद्रास्फीति (Inflation) इतनी अधिक है कि वहां की मुद्रा की कीमत कागज़ के टुकड़े के बराबर रह गई है।
भूख और बेरोज़गारी से तंग आकर लाखों वेनेजुएलाई नागरिक अपना देश छोड़कर पड़ोसी देशों में शरण ले रहे हैं। यह लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा मानवीय संकट बन चुका है। क्या प्रतिबंधों से सत्ता बदली? जवाब है नहीं। निकोलस मादुरो की सरकार ने रूस, चीन और ईरान जैसे अमेरिका के प्रतिद्वंद्वियों से हाथ मिलाकर खुद को बचाए रखा है। इससे अमेरिका की ‘प्रतिबंध रणनीति’ पर सवाल खड़े होते हैं।
वेनेजुएला अब रूस और चीन के लिए अमेरिका के ‘बैकयार्ड’ (पिछवाड़े) में पैर जमाने का एक ज़रिया बन गया है। जब अमेरिका ने वेनेजुएला से नाता तोड़ा, तो रूस ने उसे सैन्य मदद दी और चीन ने उसे कर्ज़ दिया। अब वेनेजुएला वैश्विक शक्ति राजनीति का एक अखाड़ा बन चुका है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब दुनिया में तेल की कमी हुई, तो अमेरिका को मजबूरी में वेनेजुएला से बातचीत शुरू करनी पड़ी। यह दर्शाता है कि जब ‘तेल’ और ‘ज़रूरत’ की बात आती है, तो नैतिकता और सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं।
अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते हमेशा ‘तेल के उतार-चढ़ाव’ के साथ बदलते रहे हैं। अमेरिका की रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल (Heavy Crude) को प्रोसेस करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इसलिए, अमेरिका चाहे कितनी भी नफरत करे, उसे वेनेजुएला के तेल की ज़रूरत है। वेनेजुएला की पूरी अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा नकद भुगतान करने वाला बाज़ार था। इस बाज़ार के छिन जाने से वेनेजुएला की कमर टूट गई है।
एक मध्यमवर्गीय वेनेजुएलाई परिवार के लिए अमेरिका-वेनेजुएला तनाव का मतलब ‘भूख’ है। प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला ज़रूरी दवाइयां और चिकित्सा उपकरण नहीं खरीद पा रहा है। वहां के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। क्या किसी देश की सरकार को बदलने के लिए वहां के मासूमों को सज़ा देना जायज़ है? यह एक ऐसा नैतिक सवाल है जिसे वाशिंगटन अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।
72 घंटे का संघर्षविराम हो या सालों के प्रतिबंध, समाधान हमेशा मेज़ पर ही निकलता है। अमेरिका को उन प्रतिबंधों को हटाना होगा जो सीधे तौर पर जनता को प्रभावित कर रहे हैं। बदले में, वेनेजुएला को निष्पक्ष चुनाव की गारंटी देनी होगी। मेक्सिको या कोलंबिया जैसे पड़ोसी देश इस मामले में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वेनेजुएला के तेल संसाधनों का उपयोग वहां की जनता की भलाई के लिए होना चाहिए, न कि केवल सत्ता बचाने या वैश्विक शक्तियों के खेल के लिए।
अमेरिका और वेनेजुएला का तनाव हमें सिखाता है कि ‘आर्थिक शक्ति’ को हथियार बनाना कितना खतरनाक हो सकता है। वेनेजुएला आज एक चौराहे पर खड़ा है। अगर अमेरिका अपनी रणनीति नहीं बदलता, तो वेनेजुएला पूरी तरह रूस और चीन के खेमे में चला जाएगा, जो अमेरिका के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती होगी।



