जब पीने का पानी ही जानलेवा बन जाए: इंदौर की त्रासदी और सार्वजनिक स्वास्थ्य की चेतावनी
त्रासदी का मंजर: 10 मौतें, 1,400 बीमार और एक सहमा हुआ शहर

इंदौर यह नाम सुनते ही हमारे मन में भारत के सबसे स्वच्छ शहर की तस्वीर उभरती है। वह शहर जिसने स्वच्छता के मामले में सात बार छक्का मारा है। लेकिन पिछले कुछ दिनों में इसी ‘स्वच्छ’ इंदौर की गलियों से जो चीखें सुनाई दी हैं, उन्होंने पूरे देश को सन्न कर दिया है। जब खबर आई कि दूषित पानी पीने से 10 लोगों की मौत हो गई और 1,400 से अधिक लोग अस्पतालों में भर्ती हैं, तो यह केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रही, बल्कि यह एक प्रशासनिक और नैतिक विफलता का प्रतीक बन गई।
इंदौर के कुछ खास इलाकों में अचानक उल्टी-दस्त और पेट दर्द के मामले बढ़ने लगे। देखते ही देखते अस्पतालों के वार्ड भरने लगे। जो पानी प्यास बुझाने के लिए था, वह शरीर को अंदर से खोखला कर रहा था। सबसे दुखद पहलू यह है कि ये मौतें टाली जा सकती थीं। पानी का दूषित होना कोई ‘दैवीय आपदा’ नहीं है। यह सीधे तौर पर लापरवाही का नतीजा है। 10 परिवारों ने अपनों को खोया है, और यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन बच्चों और बुजुर्गों की कहानी है जिनका सिस्टम पर भरोसा टूट गया। 1,400 लोगों का एक साथ बीमार होना किसी भी शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमर तोड़ सकता है। इंदौर ने इस दबाव को झेला, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई?
शुरुआती जांच और स्थानीय लोगों की शिकायतों से जो हकीकत सामने आई, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। इंदौर के कई पुराने इलाकों में पेयजल की पाइपलाइनें दशकों पुरानी हैं। समय के साथ ये पाइपें गल चुकी हैं और इनमें सुराख हो गए हैं। जब प्रशासन ड्रेनेज या सीवेज का काम करता है, तो अक्सर इन पाइपों में गंदा पानी रिसने लगता है।
शहरी नियोजन (Urban Planning) की एक बड़ी गलती यह रही है कि कई जगहों पर पीने के पानी की पाइपलाइन और सीवेज की लाइन बिल्कुल साथ-साथ बिछी हुई हैं। जैसे ही प्रेशर कम होता है या पाइप फटता है, सीवेज का पानी सीधे घरों के नलों तक पहुँचने लगता है। यह ‘क्रॉस-कंटामिनेशन’ ही मौत का सबसे बड़ा कारण बना।
इंदौर ने सफाई में जो मुकाम हासिल किया है, उस पर कोई शक नहीं है। लेकिन क्या हमने ‘दिखने वाली सफाई’ (सड़कें, डस्टबिन) को ‘बुनियादी सुरक्षा’ (भूमिगत पाइपलाइनें) पर वरीयता दे दी? सड़कों की झाड़ू और कचरा प्रबंधन बहुत ज़रूरी है, लेकिन ज़मीन के नीचे दबी पाइपलाइनों का स्वास्थ्य उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। इंदौर की यह त्रासदी बताती है कि ‘स्मार्ट सिटी’ का असली मतलब सिर्फ चमक-धमक नहीं, बल्कि हर नागरिक को सुरक्षित पानी की गारंटी देना है। क्या नियमित रूप से पानी के नमूनों की जांच हो रही थी? क्या पाइपलाइनों के लीकेज की निगरानी के लिए कोई आधुनिक तकनीक इस्तेमाल की जा रही थी? जवाब शायद ‘नहीं’ में है।
जब इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार होते हैं, तो यह किसी एक कर्मचारी की गलती नहीं होती, बल्कि यह पूरे ‘सिस्टम’ की लापरवाही है।स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे हफ्तों से गंदे और बदबूदार पानी की शिकायत कर रहे थे। लेकिन नगर निगम का तंत्र सोया रहा। अगर पहली शिकायत पर ही पानी की सप्लाई रोक दी जाती या लीकेज ठीक कर दिया जाता, तो शायद आज ये 10 लोग ज़िंदा होते। अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद छोटे कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया जाता है, लेकिन बड़े अधिकारी और ठेकेदार बच निकलते हैं। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसी त्रासदी दोबारा होगी।
इंदौर की यह घटना पूरे देश के नगर निगमों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभागों के लिए एक चेतावनी है। हर शहर को अपनी पाइपलाइनों का ‘हेल्थ ऑडिट’ करना चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि कौन सी पाइपलाइन बदलने लायक है और कहाँ जोखिम सबसे ज़्यादा है।आज के दौर में ऐसे सेंसर मौजूद हैं जो पानी की गुणवत्ता में ज़रा सा बदलाव होते ही अलर्ट भेज सकते हैं। क्या हम इन तकनीकों पर निवेश कर रहे हैं? नागरिकों को भी जागरूक होना होगा। अगर पानी का रंग या गंध बदली हुई है, तो उसे उबालकर पिएं और तुरंत प्रशासन को सूचित करें। लेकिन प्रशासन की ज़िम्मेदारी इससे कम नहीं हो जाती।
इन मौतों के पीछे उन गरीब परिवारों की कहानी है जिनके पास ‘वाटर प्यूरीफायर’ (RO) खरीदने की ताकत नहीं थी। वे पूरी तरह से सरकार द्वारा दिए जाने वाले नल के पानी पर निर्भर थे। जब सरकार यह पानी देती है, तो वह एक वादा करती है कि यह पीने योग्य है। उस वादे का टूटना एक ‘मानवीय अपराध’ है।
इंदौर ने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन इस त्रासदी ने उसे अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा गौर करने के लिए मजबूर कर दिया है। सुरक्षित पेयजल कोई विलासिता (Luxury) नहीं है, यह एक ‘मौलिक मानवाधिकार’ है। 10 लोगों की मौत का बदला केवल मुआवज़ा नहीं हो सकता। इसका असली इंसाफ तब होगा जब इंदौर और भारत का हर शहर यह सुनिश्चित करे कि दोबारा कभी किसी माँ को अपने बच्चे को सिर्फ इसलिए न खोना पड़े क्योंकि उसने प्यास लगने पर एक गिलास पानी पी लिया था।



