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स्वच्छ ऊर्जा की दौड़, गंदी ज़मीनी हकीकत: हरित परियोजनाओं की छिपी हुई लागत

"स्वच्छ" तकनीक का "गंदा" कच्चा माल

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों से जूझ रही है। भारत ने भी इस लड़ाई में खुद को सबसे आगे रखा है, 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य साधते हुए। देश में सौर पार्क, विशाल पवन फार्म  और इलेक्ट्रिक वाहनों की बाढ़ आ गई है। यह “स्वच्छ ऊर्जा की दौड़” एक राष्ट्रीय गौरव का विषय है।

लेकिन क्या इस दौड़ की रफ्तार इतनी तेज़ है कि हम अपने पैरों के नीचे की ज़मीन को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? क्या “हरी” ऊर्जा का हमारा जुनून हमें ज़मीन पर होने वाली “गंदी हकीकत” देखने से रोक रहा है? जब हम कोयले से दूर जाते हैं, तो हम अक्सर यह मान लेते हैं कि नई हरित परियोजनाएँ अपने आप में शुद्ध और हानिरहित हैं। लेकिन ये परियोजनाएँ भी बड़ी मात्रा में ज़मीन, पानी और खनिजों की माँग करती हैं, और अक्सर पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों पर ऐसे अदृश्य घाव छोड़ जाती हैं, जिन्हें हम हरित क्रांति की चमक में देख नहीं पाते। ये हैं “हरित परियोजनाओं” की छिपी हुई लागतें, जिनकी अनदेखी करना हमारे दीर्घकालिक पर्यावरण और सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को खतरे में डाल सकता है।

सौर और पवन ऊर्जा का सबसे बड़ा दोष यह है कि ये ऊर्जा-सघन नहीं, बल्कि क्षेत्रफल-सघन हैं। एक कोयला संयंत्र जितनी बिजली पैदा करता है, उसके लिए सौर या पवन परियोजनाओं को उससे कई गुना अधिक ज़मीन की आवश्यकता होती है। यह ज़मीन की भूख ही भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में सबसे बड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती पैदा करती है।

हरित परियोजनाओं के लिए ज़मीन का अधिग्रहण अक्सर जबरन और अपर्याप्त मुआवजे के साथ होता है। भारत के कई हिस्सों, विशेषकर राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु में, किसानों को उनकी उपजाऊ या अर्ध-उपजाऊ ज़मीनें छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उनके लिए ज़मीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि आजीविका, पहचान और जीवनशैली है। विस्थापित किसान अक्सर शहरों की झोपड़-पट्टियों में मज़दूर बनकर रह जाते हैं, जिससे ग्रामीण गरीबी और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है।

कई परियोजनाएँ आदिवासी क्षेत्रों या ऐसे समुदायों की ज़मीनों पर स्थापित की जाती हैं जिनके पास ज़मीन के कानूनी दस्तावेज़ मज़बूत नहीं होते। इन समुदायों के साथ उचित परामर्श और सहमति अक्सर नहीं ली जाती, जिससे वे अपनी पारंपरिक जीवनशैली और वन अधिकारों से वंचित हो जाते हैं।

जिस ज़मीन को हम “बंजर” मानकर सौर पैनलों से भर रहे हैं, वह अक्सर पारिस्थितिकीय रूप से बंजर नहीं होती। कई बड़े सौर पार्क ऐसे अर्ध-शुष्क घास के मैदानों या रेगिस्तानी क्षेत्रों में स्थापित किए जा रहे हैं, जो विशिष्ट वन्यजीवों, जैसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या रेगिस्तानी लोमड़ी, का निवास स्थान हैं। ज़मीन को समतल करने, बाड़ लगाने और पैनल लगाने से इन संवेदनशील आवासों का स्थायी विनाश होता है। एक विशाल सौर संयंत्र ज़मीन पर एक अभेद्य परत बना देता है। इससे वर्षा जल ज़मीन में सोख नहीं पाता, जिससे स्थानीय भूजल पुनर्भरण रुक जाता है, और मिट्टी का कटाव बढ़ता है।

हम बिजली पैदा करने के अंतिम चरण को “स्वच्छ” कह रहे हैं, लेकिन इस तकनीक को बनाने के लिए जिस कच्चे माल की ज़रूरत होती है, वह पूरी तरह से “गंदा” है। हरित ऊर्जा प्रणालियाँ, जैसे बैटरी और सोलर पैनल, लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर, निकल और दुर्लभ पृथ्वी खनिजों पर निर्भर करती हैं।

इन खनिजों का खनन दुनिया के उन गरीब देशों में बड़े पैमाने पर होता है जहाँ पर्यावरणीय नियम कमज़ोर हैं। इस खनन से पानी का अत्यधिक उपयोग होता है, ज़मीन दूषित होती है और स्थानीय वायु प्रदूषण बढ़ता है। हम अपने यहाँ की हवा साफ करने के लिए, दूसरे देशों की ज़मीन और हवा को प्रदूषित कर रहे हैं। यह एक प्रकार का “प्रदूषण निर्यात” है। लिथियम और कोबाल्ट खनन में अक्सर बाल श्रम और अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों के आरोप लगते हैं। जब तक हम एक नैतिक और पारदर्शी आपूर्ति शृंखला विकसित नहीं करते, तब तक हमारी “हरित” ऊर्जा प्रणाली अनैतिक श्रम पर आधारित रहेगी।

सौर पैनलों का जीवनकाल लगभग 25-30 वर्ष होता है। भारत ने लाखों टन पैनल लगाए हैं, और जल्द ही हम इन पैनलों के कचरे के विशाल पहाड़ का सामना करेंगे। सौर पैनलों में भारी धातुएँ जैसे कैडमियम और सीसा होता है। अगर इनका वैज्ञानिक तरीके से पुनर्चक्रण नहीं किया गया, तो ये ज़मीन और भूजल में मिलकर गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करेंगे। वर्तमान में, भारत में सौर पैनल पुनर्चक्रण की क्षमता बहुत कम है। यह एक छिपी हुई लागत है, क्योंकि अगले दशक में इस कचरे को सुरक्षित रूप से संभालने और रीसायकल करने के लिए हमें अरबों रुपये के नए बुनियादी ढाँचे में निवेश करना होगा।

हरित परियोजनाएँ अक्सर ऐसे क्षेत्रों में स्थापित की जाती हैं जहाँ पानी और वन्यजीवों पर इनका अप्रत्याशित प्रभाव पड़ता है। बड़े सौर पार्कों को पैनलों को साफ रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। कई परियोजनाएँ शुष्क या पानी की कमी वाले क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं, जहाँ स्थानीय समुदायों को पीने और कृषि के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

तेज़ घूमते पवन टर्बाइनों के ब्लेड पक्षियों और चमगादड़ों के लिए एक घातक खतरा हैं। कई पवन फार्म महत्वपूर्ण प्रवासी पक्षी मार्गों पर स्थित हैं। भारत में इस मृत्यु दर पर वैज्ञानिक शोध अभी भी अपर्याप्त है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि यह वन्यजीवों के लिए एक गंभीर चुनौती है। पवन टर्बाइनों से निकलने वाला शोर और उनकी कंपन पास के मानव और पशु समुदायों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनती है, जिससे तनाव और स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

स्वच्छ ऊर्जा की दौड़ में, हमने अक्सर जल्दबाजी में ऐसे फैसले लिए हैं जो पर्यावरणीय और सामाजिक लागतों की अनदेखी करते हैं।भारत में कई हरित परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) या तो सतही तौर पर किए जाते हैं या पूरी तरह से बाईपास कर दिए जाते हैं। परियोजनाएँ अक्सर इतनी तेज़ी से स्वीकृत हो जाती हैं कि स्थानीय समुदायों को अपनी चिंताओं को आवाज़ देने का मौका ही नहीं मिलता।

ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए नियमों का अनुपालन अक्सर कमज़ोर होता है। भूमि उपयोग परिवर्तन, अपशिष्ट प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित नियमों का उल्लंघन होने पर भी प्रभावी जुर्माना या कार्रवाई नहीं होती। हमारी नीति भूजल, कृषि और ऊर्जा मंत्रालय के बीच अलग-अलग चलती है। एक बड़ी सौर परियोजना को मंजूरी देने से पहले, यह नहीं देखा जाता कि क्या उस क्षेत्र में पानी की आपूर्ति पर्याप्त है या क्या इससे स्थानीय कृषि पर कोई असर पड़ेगा। हमें जल-ऊर्जा-खाद्य के त्रिकोण को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनानी होंगी।

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