
भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण का सवाल न सिर्फ प्रतिनिधित्व, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक बराबरी और लोकतंत्र की गहराई का संकेत है। आज, जब ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के तहत आगामी वर्षों में संसद और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने जा रही हैं, बहस फिर तेज़ है क्या यह असली सशक्तिकरण का रास्ता है, या राजनीतिक टोकनिज्म का एक नया स्वरूप?
भारत में महिलाओं का राजनैतिक सफर स्वतंत्रता संग्राम की अग्रणी नेताओं, सामाजिक सुधार आंदोलनों और आरंभिक संविधान सभा से शुरू हुआ लेकिन सत्ता की सबसे ऊंची परतों में महिलाओं की मौजूदगी हमेशा सीमित रही। 1990 के दशक में 73वें और 74वें संविधान संशोधन से पंचायती राज संस्थाओं में स्त्री आरक्षण का मार्ग खुला, जिससे लाखों महिलाएं पहली बार नेतृत्व के मंच पर आईं। यह अनुभव बताता है कि आरक्षण से ग्रासरूट की राजनीति में महिलाओं का बोलबाला तो बढ़ा, पर शीर्ष नेतृत्व और नीति-निर्धारण में महिलाओं की संख्या अब भी बेहद कम है संसद में लगभग 15% और विधानसभा में भी यही हाल।
2023 में पारित ‘महिला आरक्षण विधेयक’ के तहत संविधान में नए अनुच्छेद जोड़े गए हैं, जिससे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में तीस फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। रोचक यह भी है कि अनुसूचित जाति-जनजाति महिलाओं के लिए भी इसी अनुपात में सब-कोटा निर्धारित है। हालांकि कानून के प्रभावी होने के लिए जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है मतलब 2029 का आम चुनाव ही पहला ऐसा मौका हो सकता है जब इस व्यवस्था का असली रूप दिखेगा। इसमें 15 साल की ‘सनसेट क्लॉज’ भी है, यानी अवधि के बाद नीति की फिर समीक्षा जरूरी होगी।
समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के बिना कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता। महिलाएं न सिर्फ परिवार की रीढ़ हैं, वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा, सत्ता हर विषय में नीति को नई दृष्टि और संवेदनशीलता देती हैं। ग्रामीण निकायों में महिला नेताओं की पहल ने पानी, शिक्षा, शराबबंदी, वाजिब खर्च, घरेलू हिंसा पर प्रभावशाली काम किया है।
लेकिन सवाल यह भी कि क्या केवल आरक्षित सीटें असली नेतृत्व, नीति-निर्धारण की ‘आज़ाद ताकत’ देंगी? कई बार देखा गया है कि चुनी गई महिलाओं के फैसले भी पुरुष रिश्तेदार या राजनीतिक परिवारों के प्रभाव में रहते हैं। ‘प्रॉक्सी’ प्रतिनिधित्व बनाम असली सशक्तिकरण की बहस यहीं से शुरू होती है।
आरक्षण के आलोचक अक्सर इसे ‘टोकनिज्म’ मानते हैं यानी सिर्फ उपस्थिति का आंकड़ा सुधारना, असली सत्ता और फैसलों की ज़मीन वही पुरानी ताकतों के हाथ। असली चुनौती यह है कि जाति, धर्म, क्षेत्र, वर्ग सभी के स्तर पर महिला नेतृत्व विविध रहे। बिल में ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाओं की अलग-अलग समस्याओं को कैसे ठोस प्रतिनिधित्व मिलेगा? क्या शहरी, पढ़ी-लिखी महिलाओं को ही अधिक मौका मिलेगा, या ग्रामीण, कमजोर तबकों की भी वास्तविक हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी?
पंचायती राज, ग्राम सभा और नगर निकाय में मिली सफलता ने समानांतर रूप से हमें यह सिखाया है कि सिर्फ आरक्षण नहीं, बल्कि जागरूकता, नेतृत्व निर्माण, सामाजिक सहयोग, कानूनी प्रवर्तन और महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी भी जरूरी है। त्रासदी तब होती है जब महिलाएं संसाधन, संरक्षण और प्रशिक्षण के अभाव में महज़ ‘मोहर’ बनकर रह जाती हैं, या राजनीतिक प्रतियोगिता में उन्हें गंभीर विकल्प की तरह नहीं देखा जाता।
महिला आरक्षण बिल ऐतिहासिक ज़रूर है, पर असली मायने तभी बदलेंगे जब नीति का ध्येय ‘आंकड़ों का सच’ नहीं, ज़मीन पर असर, नेतृत्व की विविधता और महिला नीति-निर्माताओं के लिए सुरक्षित, समर्थ और स्वतंत्र मंच बने। आरक्षण ‘शुरुआत’ है, मुकाम नहीं आवश्यक है कि महिलाएं हर स्तर पर स्वयं संवाद, नेतृत्व, नीति और बदलाव की धुरी बनें।



