ओपिनियनजेंडर

विवाह की भारतीय अवधारणा और समलैंगिकता की स्वीकार्यता

सामाजिक दबाव और पहचान की चुनौती

भारत में समान-लिंग विवाह पर चर्चा अब शहरों और न्यायालयों के दायरे से निकलकर आम लोगों के घरों, सामाजिक मंचों और सार्वजनिक संवादों तक पहुंच चुकी है। इतिहास में परिवार की अवधारणा हमेशा पुरुष और महिला के संबंध के इर्द-गिर्द रही है जहाँ विवाह सिर्फ निजी रिश्ता नहीं, समाज, धर्म और परंपरा की बुनियाद से जुड़ा है। ऐसे में जब समलैंगिक जोड़ों को बराबरी, मान्यता और अधिकार देने की बात आती है, तो सामाजिक असहजता और विरोध की दीवारें दिखाई देती हैं।

भारतीय समाज में परंपरा के नाम पर समान लिंग संबंध और विवाह को अभी खुलकर जगह नहीं मिली। कई बड़े समुदायों और धार्मिक वर्गों ने इसे भारतीय संस्कृति या मूल्य व्यवस्था के खिलाफ बताया है। अक्सर मीडिया, टीवी डिबेट और सामाजिक प्लेटफॉर्म पर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे संबंध देश के सामाजिक संतुलन, परिवार व्यवस्था या बच्चों के भविष्य के लिए सही हैं? पुराने सोच वाले लोग इसे पश्चिमी प्रभाव, अश्लीलता या सामाजिक संकट मानते हैं।

लेकिन दूसरी ओर, आधुनिक शिक्षा, युवा सोच, शहरीकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना ने नई पीढ़ी के भीतर बदलती दृष्टि पैदा की है। आज के पढ़े-लिखे, शहरों में रहने वाले युवा विवाह को व्यक्तिगत चयन, प्रेम और आत्म-सम्मान का मुद्दा मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ऐतिहासिक फैसला सुनाकर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया इससे समुदाय को जीने, साथ रहने और अपने रिश्ते को समाज के सामने खुलकर स्वीकारने की आज़ादी मिली। मगर विवाह, संपत्ति, उत्तराधिकार, मेडिकल अधिकार और गोद लेने की वास्तविक कानूनी मान्यता अब भी नहीं मिली है।

2023-24 में उच्चतम न्यायालय ने कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि विवाह का अधिकार देना संसद की जिम्मेदारी है, न कि न्यायपालिका की। अदालत ने समलैंगिक जोड़ों के साथ होने, चुनने और सम्मान के अधिकार को स्वीकार तो किया, लेकिन शादी के कानूनी अधिकार, संपत्ति, बच्चे या अन्य पारिवारिक लाभ नहीं दिए। इसका मतलब यह है कि वे साथ रह सकते हैं, परिवार की तरह जीवन बना सकते हैं, मगर सामाजिक सुरक्षा या नागरिक अधिकार की बातें अधूरी हैं।

इसी अनुपस्थिति के कारण, समलैंगिक जोड़ों को रोज़मर्रा के जीवन में भेदभाव, अस्वीकार, मानसिक दबाव या सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। कई युवा अपने परिवार से दूर होते हैं, तो कुछ हिम्मत करके अपने संबंध को स्वीकार करते हैं। माता-पिता, रिश्तेदार और समाज अक्सर इसे ‘इलाज’ या ‘छुपाने’ की चीज़ मानते हैं, जिसका प्रत्यक्ष असर उनकी मानसिक और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ता है।

समलैंगिक विवाह के समर्थक मानते हैं कि यह संविधान के समता, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकार के मूल्यों के अनुरूप है। वे कहते हैं कि व्यक्तिगत चयन, प्यार और सहभागिता को सीमित करना कानून, समाज व इंसानियत के खिलाफ है। इसके विरोधी चिंतित हैं कि इससे पारंपरिक परिवार का स्वरूप बदल जाएगा, सामाजिक ढांचा टूट सकता है, और बच्चों की परवरिश में बाधा आएगी। जबकि दुनिया के कई देशों ने अब ऐसे विवाह को पूरी मान्यता देकर, अपने समाज में बदलाव, स्वीकार्यता और कानूनी सुरक्षा दी है।

आगे बढ़ते हुए समाधान की राह केवल कानून या नीति बनाने तक सीमित नहीं। इसमें ज़रूरी है कि परिवार, मीडिया, शिक्षा, नौकरशाही, और समाज विभिन्न स्तरों पर संवेदनशील, जानकारीपूर्ण और स्वीकार्य संवाद करें। युवा पीढ़ी को लैंगिक विविधता, सम्मान, प्रेम, समानता और अधिकार के विषय में सही शिक्षा मिले; मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों; अदालतें और प्रशासन शिकायतों को संवेदनशीलता के साथ निपटाएँ।

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