ओपिनियनमहिला सुरक्षा

शहरी महिलाओं के अनुभव और चुनौतियाँ

आंकड़ों की सच्चाई: स्वतंत्रता पर असुरक्षा का असर

शहरों में महिलाओं की सुरक्षा आज भी भारत के विकास के सफर की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है। हर रोज़ जब कोई महिला शाम को घर पहुंचकर अपने परिजनों को मैसेज करती है, तो वह केवल अपनी चिंता नहीं, देश की सामूहिक असुरक्षा का एहसास भी साझा करती है। हाल के वर्षों में कुछ शहरों में बदलाव जरूर नजर आया, मगर आंकड़े और ज़मीनी अनुभव बताते हैं कि असुरक्षा का डर, महिलाओं के रोज़मर्रा के फैसलों और आज़ादी की सीमाओं को आज भी बांधे हुए है।

2025 के “She Shakti Suraksha Survey” की रिपोर्ट पर नज़र डालें तो मालूम चलता है कि मुंबई, इंदौर और अहमदाबाद महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित शहर माने जाते हैं. फिर भी यही सर्वे बताता है कि दिन की तुलना में रात में महिलाओं की सुरक्षा का अनुभव करीब आधा रह जाता है जहां दिन में 82% महिला खुद को सुरक्षित मानती हैं, वहीं रात में यह आंकड़ा 48% तक सिमट जाता है। 23% महिलाओं ने साफ कहा कि वे रात के समय बाहर निकलना असुरक्षित महसूस करती हैं, और सार्वजनिक परिवहन में भी महिलाओं का विश्वास दिन के समय जितना है, वह रात के समय गिरकर 36% पर आ जाता है. सड़क, बस स्टॉप, और मेट्रो जैसे जगहों पर महिलाओं ने उत्पीड़न, छेड़छाड़ और डर का अनुभव भी व्यक्त किया।

ज्यादातर शहरी महिलाएं आज भी अपने कॉलेज, दफ्तर, या शॉपिंग जैसे रोज़ाना के फैसले ‘सुरक्षित रास्ते’ और ‘जानी-पहचानी जगह’ देखकर लेती हैं। कई सर्वे बताते हैं कि खासतौर पर दिल्ली जैसी जगहों पर लड़कियां अपनी पढ़ाई की जगह सुरक्षा के आधार पर चुनती हैं, भले ही उस कॉलेज की रैंकिंग कम हो. सार्वजनिक परिवहन और सुनसान गलियों से परहेज, ऑफिस के बाद अंधेरे में अकेले लौटने का डर, और समय से घर लौटने की हड़बड़ाहट महिलाओं की स्वतंत्रता को बहुत सीमित करती रही है।

आधिकारिक डेटा से तस्वीर और स्पष्ट होती है। NCRB के 2023 के आंकड़े के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराध प्रतिदिन औसतन 88 बलात्कार दर्ज होते हैं. घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, और सार्वजनिक जगहों पर हमले जैसे अपराध अब भी सामान्य हैं, और रिपोर्ट न हो पाने वाले मामलों की असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। नए सर्वे बताते हैं कि हर चौथी महिला ने बीते साल किसी न किसी रूप में उत्पीड़न का अनुभव किया है। सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में मौखिक उत्पीड़न का अनुपात 60% है यह एक गंभीर चेतावनी है कि डर अब भी हवा में तैरता है और महिला सुरक्षा सिर्फ घोषणाओं में सीमित है।

सरकारी पहल की बात करें तो POSH कानून, महिला हेल्पलाइन, सीसीटीवी निगरानी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सुरक्षा, फास्ट ट्रैक कोर्ट सब लागू किए गए हैं. इनसे अधिकारिक आंकड़ों में सुधार दिखता है, पर इस बदलाव की गहराई ज़मीनी हकीकत में अब भी अधूरी है। हाशिए की महिलाएं, निम्न आयवर्ग, घरेलू कामकाजी या अकेली माता इन समूहों का असुरक्षा अनुभव अलग-अलग और अक्सर ज़्यादा गंभीर है। सर्वे में पाया गया कि किसी भी शहर में महिलाओं की सुरक्षा का अनुभव उनकी आय, शिक्षा, वैवाहिक स्थिति और उम्र से भी प्रभावित होता है।

आगे की राह केवल नीतियाँ बनाने या कैमरे लगाने तक सीमित नहीं रह सकती। जरूरी है कि हमारे समाज, प्रशासन और परिवार हर दिन महिलाओं की स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मानजनक सार्वजनिक उपस्थिति को सहज बनाएं। बेहतर रोशनी, प्रभावी पुलिसिंग, महिला अफसरों की भागीदारी, मजबूत हेल्पलाइन और जांच प्रक्रिया, साइबर सुरक्षा, और कानूनी पहुंच जैसी शक्तिशाली कदमों के साथ-साथ, सार्वजनिक जगहों, स्कूल-कॉलेज और ऑफिस में लैंगिक संवेदनशीलता और विश्वास का माहौल बनाना होगा।

हर महिला की सुरक्षा की जिम्मेदारी तब पूरी समझी जाएगी जब वह दिन-रात बिना डर के अपने फैसले ले सके, बेझिझक यात्रा कर सके, आवाज़ उठा सके और अपनी पहचान को संकोच, भय या असुरक्षा के बिना जी सके। शहरों में महिलाओं की सुरक्षा तब सचमुच सुनिश्चित होगी, जब बदलाव केवल रणनीति या बयान नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार, सोच और जगह-जगह अपनी जगह पा लेगा।

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