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क्या मोटापा भारत के लिए अगला बड़ा जन-स्वास्थ्य खतरा है?

राष्ट्रीय स्वास्थ्य रणनीति: रोकथाम ही एकमात्र समाधान

जब हम ‘महामारी’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में तुरंत कोविड-19 या संक्रामक रोगों का चित्र आता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के लिए, एक धीमी, खामोश और अधिक स्थायी महामारी दशकों से आकार ले रही है यह है मोटापे और अधिक वजन  की महामारी। दुनिया भर में, मोटापे की दरें चिंताजनक रूप से बढ़ रही हैं, और भारत, जो कभी कुपोषण से जूझता था, अब एक नए और दोहरे बोझ का सामना कर रहा है एक तरफ कुपोषण, और दूसरी तरफ मोटापा।

क्या मोटापा, भारत के लिए अगला बड़ा जन-स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। क्या हम अनजाने में एक ऐसी स्वास्थ्य चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं, जो हमारी स्वास्थ्य प्रणाली को अपंग कर सकती है, हमारी आर्थिक उत्पादकता को कम कर सकती है, और हमारी युवा आबादी की जीवन प्रत्याशा को कम कर सकती है? बढ़ते वैश्विक रुझानों को देखते हुए, भारत को तुरंत एक व्यापक राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है, इससे पहले कि यह धीमी महामारी एक गंभीर संकट बन जाए।

भारत में मोटापा अब केवल उच्च-आय वर्ग  या शहरी घटना नहीं रहा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के नवीनतम आंकड़े स्पष्ट रूप से इस खतरे की पुष्टि करते हैं भारत में आज भी बच्चों में स्टंटिंग और वेस्टिंग मौजूद है। लेकिन इसके साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में, अधिक वजन वाले पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रतिशत में भारी वृद्धि हुई है। यह पोषण का दोहरा बोझ है यानी एक ही समुदाय या परिवार में कुपोषण और मोटापे का एक साथ होना जो भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव डालता है।

मोटापा अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों में दरें सबसे अधिक हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में भी जीवनशैली में बदलाव  के कारण अधिक वजन और मोटापे के मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। यह दिखाता है कि यह समस्या अब वर्ग या क्षेत्र विशेष की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की हो चुकी है।

शायद सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति बच्चों और किशोरों में मोटापे का बढ़ना है। कम उम्र में मोटापा बढ़ने का सीधा मतलब है कि ये बच्चे बड़े होने पर उच्च रक्तचाप, टाइप 2 मधुमेह और हृदय रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होंगे। यह न केवल उनके व्यक्तिगत भविष्य को धूमिल करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को भी खतरे में डालता है।

मोटापे के पीछे के कारण जटिल हैं, लेकिन भारत में इसके लिए मुख्य रूप से जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव जिम्मेदार हैं भारतीय परिवारों में अब पारंपरिक, फाइबर युक्त भोजन के बजाय उच्च कैलोरी, उच्च चीनी और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तेजी से बढ़ रहे हैं। शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में फास्ट फूड चेन्स का विस्तार, और ऑनलाइन फूड डिलीवरी की आसानी ने स्वस्थ भोजन की आदतों को बुरी तरह प्रभावित किया है। त्योहारों और सामाजिक समारोहों के नाम पर भारतीय आहार में तेल, घी और चीनी का उपयोग पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। मीठे पेय और स्नैक्स का बढ़ता सेवन अप्रत्यक्ष रूप से कैलोरी की मात्रा बढ़ा रहा है।

आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि तेजी से कम हो रही है। बच्चों और युवाओं में गैजेट्स, टीवी और कंप्यूटर पर बिताया जाने वाला समय बढ़ा है, जिससे खेलने-कूदने का समय कम हो गया है। सार्वजनिक परिवहन या पैदल चलने के बजाय निजी वाहनों का बढ़ता उपयोग शारीरिक मेहनत को कम कर रहा है। आईटी और सेवा क्षेत्रों में लंबे समय तक डेस्क पर बैठने की संस्कृति मोटापे और पेट के मोटापे को बढ़ा रही है, जो हृदय रोग का सीधा कारण है।

भारत में मोटापे का बढ़ना आर्थिक विकास के साथ जुड़ा हुआ है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, लोग पारंपरिक दाल-रोटी जैसे सस्ते भोजन के बजाय प्रसंस्कृत, कैलोरी युक्त भोजन की ओर रुख करते हैं। इसे “पोषण संक्रमण” कहा जाता है, जहाँ देश गरीबी से समृद्धि की ओर बढ़ते हुए, एक अस्वस्थ आहार को अपना लेता है।

मोटापा केवल सौंदर्य या वजन बढ़ने की समस्या नहीं है; यह कई गैर-संक्रामक रोगों  की जड़ है, जो भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को पतन की ओर ले जा सकते हैं। मोटापा सीधे तौर पर निम्नलिखित रोगों के जोखिम को बढ़ाता है भारत को पहले ही “दुनिया की मधुमेह राजधानी” कहा जाता है। मोटापा इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ाता है, जिससे टाइप 2 मधुमेह तेजी से फैलता है। उच्च रक्तचाप, हाई कोलेस्ट्रॉल और स्ट्रोक। जैसे कोलोरेक्टल, स्तन और गर्भाशय कैंसर। शरीर का अतिरिक्त भार जोड़ों पर दबाव डालता है।

मोटापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज में भारी खर्च आता है। अगर देश की बड़ी आबादी इन पुरानी बीमारियों से ग्रस्त हो जाती है, तो स्वास्थ्य देखभाल का खर्च आसमान छू जाएगा, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। यह सरकार के लिए भी एक चुनौती है, क्योंकि उसे इन बीमारियों के इलाज, रोकथाम और जागरूकता पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

स्वस्थ कार्यबल किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है। मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों के कारण लोग अधिक छुट्टी लेते हैं, उनकी कार्यक्षमता कम होती है, और वे कम उम्र में काम छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इससे राष्ट्रीय उत्पादकता और आर्थिक विकास दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विकसित देशों में मोटापे की दरें पिछले तीन दशकों में बढ़ी हैं, और भारत को उनके अनुभवों से सीखने की आवश्यकता है अमेरिका में 40% से अधिक वयस्क मोटापे से पीड़ित हैं। वहाँ की सरकारें अब स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए अरबों खर्च कर रही हैं, जिसमें शल्य चिकित्सा और महंगी दवाएँ शामिल हैं। भारत को ऐसी स्थिति में पहुँचने से पहले ही, रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। चीन ने भी मोटापे की बढ़ती चुनौती को पहचानकर बच्चों के खेल के समय को अनिवार्य किया है और जंक फूड के विज्ञापनों पर नियंत्रण शुरू किया है। भारत को भी इसी तरह के कड़े नियामक उपायों की आवश्यकता है।

भारत को इस खतरे से निपटने के लिए एक व्यापक, बहुक्षेत्रीय राष्ट्रीय मोटापे और NCD रोकथाम नीति की आवश्यकता है। खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट, बोल्ड और आसान भाषा में लेबलिंग अनिवार्य होनी चाहिए। अत्यधिक चीनी वाले पेय पदार्थों और उच्च प्रसंस्कृत स्नैक्स पर ‘सिन टैक्स’ लगाया जाना चाहिए। इस टैक्स से प्राप्त राजस्व को स्वस्थ भोजन और शारीरिक गतिविधि के बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जाना चाहिए। स्कूलों और उसके 500 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, ताकि बचपन से ही स्वस्थ आदतें विकसित हों।

शहरी नियोजन में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हर मोहल्ले में सुरक्षित पैदल पथ, साइकिल ट्रैक और पार्कों का निर्माण अनिवार्य हो, ताकि लोग आसानी से शारीरिक गतिविधि कर सकें। निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित किया जाए। शारीरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए, और रोज़ाना कम से कम एक घंटे का खेल अनिवार्य हो।

कंपनियों के लिए कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य जांच, योग और व्यायाम के कार्यक्रम चलाना अनिवार्य हो, और उन्हें ‘बैठने’ को कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मोटापा स्क्रीनिंग, आहार परामर्श और जीवनशैली प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। रोकथाम को इलाज से पहले रखना होगा।

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