
भारतीय लोकतंत्र में शिक्षा को हमेशा से ‘सेवा’ की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन पिछले दो दशकों में निजीकरण की आंधी ने इस सेवा को एक आकर्षक निवेश और मुनाफे वाले उद्योग में तब्दील कर दिया है। तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित ‘तमिलनाडु स्कूल (शुल्क संग्रहण का विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026’ केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह उन लाखों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के पक्ष में लिया गया एक नैतिक स्टैंड है, जो अपने बच्चों के भविष्य की खातिर अपनी पूरी जमा-पूंजी निजी स्कूलों की तिजोरियों में झोंकने को मजबूर थे।
तमिलनाडु हमेशा से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। राज्य में निजी स्कूलों का एक विशाल जाल फैला हुआ है, जिसने साक्षरता दर बढ़ाने में तो मदद की, लेकिन साथ ही ‘फीस के अराजकतावाद’ को भी जन्म दिया। अभिभावकों की शिकायतें आम थीं ट्यूशन फीस के अलावा, स्कूलों ने ‘एक्स्टिविटी फीस’, ‘लैब चार्ज’, ‘लाइब्रेरी डिपॉजिट’ और यहाँ तक कि ‘पार्किंग शुल्क’ के नाम पर पैसे वसूलना शुरू कर दिया था। स्कूल परिसर के भीतर ही किताबें, यूनिफॉर्म और जूते खरीदने की बाध्यता ने अभिभावकों को बाजार की प्रतिस्पर्धा से दूर कर दिया, जिससे उन्हें एमआरपी (MRP) से भी अधिक दाम चुकाने पड़ते थे। बिना किसी ठोस आधार के हर साल 15% से 20% तक फीस बढ़ाना एक सामान्य प्रक्रिया बन गई थी। इन्हीं परिस्थितियों ने सरकार को मजबूर किया कि वह 2009 के मूल अधिनियम में व्यापक संशोधन करे और इसे 2026 की जरूरतों के अनुरूप अधिक सख्त और पारदर्शी बनाए।
इस नए कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसका 7-सदस्यीय शुल्क निर्धारण समिति (Fee Determination Committee) है। यह समिति किसी साधारण प्रशासनिक इकाई जैसी नहीं होगी। इसकी संरचना में शिक्षाविद, चार्टर्ड अकाउंटेंट और सरकारी अधिकारी शामिल होंगे, जो स्कूलों के ऑडिटेड खातों की जांच करेंगे। समिति किसी स्कूल की फीस तय करते समय उसके स्थान (शहरी या ग्रामीण), शिक्षकों के वेतन, उपलब्ध बुनियादी ढांचे और बिजली-पानी जैसे प्रशासनिक खर्चों का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण करेगी।
इस कानून का सबसे प्रशंसनीय हिस्सा यह है कि एक बार फीस तय होने के बाद स्कूल अगले तीन वर्षों तक उसमें कोई भी मनमाना बदलाव नहीं कर पाएंगे। यह अभिभावकों को अपने वित्तीय नियोजन (Financial Planning) में स्थिरता प्रदान करेगा। समिति का आदेश अंतिम और बाध्यकारी होगा। यदि कोई स्कूल इसका उल्लंघन करता है, तो उसके पास केवल उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प होगा, लेकिन आदेश पर रोक लगवाना आसान नहीं होगा।
अक्सर निजी स्कूल लॉबी यह तर्क देती है कि यदि सरकार फीस कम करेगी, तो वे बेहतर सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षक नहीं दे पाएंगे। हालांकि, 2026 का यह अधिनियम ‘न्यूनतम’ या ‘अधिकतम’ के बजाय ‘मानक’ (Standard) शब्द पर जोर देता है। इसका अर्थ यह है कि स्कूलों को उनके द्वारा दी जाने वाली वास्तविक सुविधाओं के आधार पर ‘स्लैब’ में बांटा जा सकता है। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि स्कूल अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा शिक्षकों के वेतन और शैक्षणिक विकास पर खर्च कर रहे हैं, न कि उसे व्यापारिक मुनाफे (Profiteering) के रूप में निकाल रहे हैं।
शिक्षा जब महंगी होती है, तो समाज दो वर्गों में बंट जाता है। एक वर्ग वह जिसके पास संसाधन हैं और दूसरा वह जो केवल योग्यता होने के बावजूद पीछे रह जाता है। जब फीस विनियमित होगी, तो प्रतिष्ठित निजी स्कूलों में प्रवेश केवल अमीरों की जागीर नहीं रहेगा। एक प्रतिभाशाली बच्चा, जिसके पिता की आय सीमित है, वह भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना देख सकेगा। वर्तमान में, निजी स्कूलों की फीस से डरकर कई लोग मजबूरी में सरकारी स्कूलों की ओर जाते हैं, जहाँ कभी-कभी बुनियादी ढांचे की कमी होती है। फीस नियंत्रण से निजी और सरकारी शिक्षा व्यवस्था के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा होगी।
कानून बनाना एक पक्ष है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना असली चुनौती है। बड़े शैक्षणिक समूह इस कानून को अपनी स्वायत्तता (Autonomy) पर हमला बताकर न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यदि समिति के सदस्य निष्पक्ष नहीं रहे, तो स्कूलों और समिति के बीच ‘सांठगांठ’ का खतरा बना रहता है। सरकार को इसके लिए एक ‘ऑनलाइन ग्रीवांस पोर्टल’ बनाना चाहिए जहाँ अभिभावक गुमनाम रूप से शिकायत कर सकें। एसी क्लासरूम और साधारण क्लासरूम के बीच शुल्क का अंतर कितना हो, यह तय करना एक जटिल गणितीय कार्य होगा।
तमिलनाडु सरकार ने 2026 में यह संशोधन लाकर एक संदेश दिया है कि ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की जिम्मेदारी केवल सड़कें और पुल बनाना नहीं है, बल्कि अपने नागरिकों को शोषण से बचाना भी है। शिक्षा को जब ‘बाजार की ताकतों’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है, तो वह सबसे पहले गरीबों और मध्यम वर्ग को कुचलती है। यह अधिनियम शिक्षा के बाजारीकरण को रोकने की दिशा में एक ‘चेक एंड बैलेंस’ का काम करेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य राज्य भी तमिलनाडु के इस मॉडल का अध्ययन करेंगे और अपने यहाँ इसी तरह के पारदर्शी कानून लाएंगे। अंततः, राष्ट्र का निर्माण क्लासरूम में होता है, और क्लासरूम के दरवाजे सबके लिए खुले होने चाहिए, न कि केवल भारी भरकम चेक काटने वालों के लिए।



