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भारत में ‘पितृत्व अवकाश’ (Paternity Leave) को कानूनी अधिकार बनाने की मांग: राघव चड्ढा का संसदीय प्रस्ताव और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य

'पितृत्व अवकाश' को कानूनी दर्जा देने की आवश्यकता क्यों?

31 मार्च, 2026 को संसद के बजट सत्र के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) के युवा सांसद राघव चड्ढा ने एक अत्यंत प्रगतिशील और समसामयिक मुद्दा उठाकर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी है। उन्होंने भारत में ‘पितृत्व अवकाश’ (Paternity Leave) को एक कानूनी अधिकार (Legal Right) बनाने की पुरजोर वकालत की है। उनका तर्क है कि बच्चे का पालन-पोषण और देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि माता-पिता की एक ‘साझा जिम्मेदारी’ (Shared Responsibility) होनी चाहिए।

राघव चड्ढा ने जोर देकर कहा कि आधुनिक भारत के कार्यबल (Workforce) में पिता को अपने रोजगार और अपने परिवार की देखभाल के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

सांसद राघव चड्ढा ने संसद में अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में ‘पितृसत्तात्मक’ (Patriarchal) सोच के कारण बच्चों की देखभाल को केवल महिलाओं के कर्तव्य के रूप में देखा जाता रहा है। चड्ढा ने तर्क दिया कि यदि हम कार्यस्थल पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर देखना चाहते हैं, तो हमें घर पर पुरुषों को महिलाओं के बराबर जिम्मेदारियां निभाने के अवसर देने होंगे।

प्रसव (Childbirth) के बाद एक महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से उबरने में समय लगता है। इस संवेदनशील समय में पति की उपस्थिति और सहयोग अनिवार्य है, न कि एक ‘लक्जरी’। उन्होंने कहा कि एक पिता के रूप में अपने नवजात शिशु के साथ शुरुआती दिनों में समय बिताना एक भावनात्मक अधिकार है, जिसे केवल ‘छुट्टी’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भारत में ‘मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961’ (Maternity Benefit Act) महिलाओं को 26 सप्ताह का सवैतनिक अवकाश प्रदान करता है, लेकिन पितृत्व अवकाश के लिए कोई व्यापक केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है।

क्षेत्र वर्तमान स्थिति (2026) विवरण
केंद्रीय सरकारी सेवा 15 दिन केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 के तहत केवल 15 दिनों का सवैतनिक अवकाश मिलता है।
निजी क्षेत्र (Private Sector) अनिश्चित कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं। यह पूरी तरह कंपनी की ‘पॉलिसी’ पर निर्भर करता है।
असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) शून्य दिहाड़ी मजदूरों और अनौपचारिक क्षेत्र के पिताओं के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

राघव चड्ढा ने इसी ‘कानूनी शून्य’ (Legal Vacuum) को भरने के लिए एक ‘पितृत्व लाभ विधेयक’ (Paternity Benefit Bill) लाने का प्रस्ताव दिया है, जो सभी क्षेत्रों (सरकारी और निजी) पर अनिवार्य रूप से लागू हो।

भारत जैसे देश में, जहाँ सामाजिक ढांचा तेजी से बदल रहा है, यह कानून केवल एक ‘छुट्टी’ नहीं बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है वर्तमान में, कंपनियां अक्सर युवा महिलाओं को भर्ती करने से कतराती हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि 26 सप्ताह की सवैतनिक मातृत्व छुट्टी से कंपनी की उत्पादकता प्रभावित होगी। यदि पुरुषों के लिए भी अनिवार्य लंबी पितृत्व छुट्टी होगी, तो लिंग के आधार पर भर्ती में होने वाला भेदभाव कम हो जाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, प्रसव के बाद कई महिलाएं गंभीर मानसिक अवसाद से गुजरती हैं। जब पिता घर पर मौजूद होता है और जिम्मेदारियों को साझा करता है, तो मां के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और परिवार का भावनात्मक संतुलन बना रहता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि जिन बच्चों के पिता उनके जीवन के शुरुआती 3-6 महीनों में सक्रिय रूप से शामिल रहते हैं, उन बच्चों का संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास और सामाजिक कौशल दूसरों की तुलना में बेहतर होते हैं।

राघव चड्ढा ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला देते हुए भारत को ‘पिछड़ा’ बताया। यहाँ माता-पिता को कुल 480 दिनों की छुट्टी मिलती है, जिसे वे आपस में बांट सकते हैं। इसमें से 90 दिन विशेष रूप से पिता के लिए आरक्षित (Reserved) होते हैं। यहाँ पिता को 15 सप्ताह का पूर्ण सवैतनिक अवकाश मिलता है। यहाँ जनवरी 2021 से माता और पिता दोनों को बराबर 16 सप्ताह का अनिवार्य अवकाश मिलता है। यहाँ माता-पिता को 12 महीने का साझा अवकाश मिलता है, जिसमें 5 महीने माता, 5 महीने पिता और 2 महीने साझा होते हैं।

राघव चड्ढा के प्रस्ताव पर कुछ उद्योगपतियों और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) ने चिंता व्यक्त की है छोटे उद्योगों का तर्क है कि सवैतनिक पितृत्व अवकाश से उनकी परिचालन लागत (Operational Cost) बढ़ जाएगी। यदि प्रमुख कर्मचारी 2-3 महीने की छुट्टी पर जाते हैं, तो परियोजनाओं में देरी हो सकती है। चड्ढा ने सुझाव दिया है कि इस लागत को साझा किया जा सकता है। सरकार कंपनियों को कर में छूट (Tax Breaks) दे सकती है या एक ‘सोशल सिक्योरिटी फंड’ (Social Security Fund) बना सकती है जो इन छुट्टियों के दौरान वेतन का भुगतान करे, जैसा कि कई यूरोपीय देशों में होता है।

यदि राघव चड्ढा की मांग को कानून का रूप दिया जाता है, तो इसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हो सकते हैं कम से कम 4 से 8 सप्ताह का सवैतनिक अवकाश। पिता को यह अधिकार हो कि वह इस छुट्टी को प्रसव के 6 महीने के भीतर कभी भी टुकड़ों में ले सके। छुट्टी के दौरान पिता की नौकरी जाने या पदोन्नति (Promotion) प्रभावित होने के खिलाफ कानूनी संरक्षण। गोद लेने वाले पिताओं को भी समान अवकाश का अधिकार।

राघव चड्ढा का यह कदम केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत में ‘पुरुषत्व’ (Masculinity) की परिभाषा को बदलने की कोशिश है। एक ‘मजबूत’ पिता केवल वह नहीं है जो बाहर जाकर पैसा कमाता है, बल्कि वह भी है जो आधी रात को बच्चे का डायपर बदलता है और अपनी पत्नी को आराम देने के लिए घर के काम संभालता है।

संसद में इस चर्चा ने उन लाखों पिताओं को आवाज दी है जो चुपचाप अपने बच्चों को बड़ा होते देखने का मौका खो देते हैं क्योंकि उन्हें अपनी ‘नौकरी’ जाने का डर होता है।

राघव चड्ढा की यह मांग 2026 के आधुनिक, शिक्षित और जागरूक भारत की गूँज है। यदि भारत को वास्तव में एक विकसित राष्ट्र (Viksit Bharat) बनना है, तो हमें अपने घरेलू मोर्चे पर लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना होगा। पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाना न केवल पिताओं के लिए उपहार होगा, बल्कि यह भारत के भविष्य हमारे बच्चों के लिए एक सुरक्षित और प्यार भरा वातावरण तैयार करेगा।

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