सिस्टम की सबसे बड़ी चूक: दवा गुणवत्ता जांच के नाम पर लापरवाही
बच्चों की मौत और सिस्टम का अपराध

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में अगस्त-सितंबर 2025 में ऐसा हादसा हुआ, जिसने परिवारों, डॉक्टरों और देश की आत्मा को झकझोर दिया। खांसी से जूझते बच्चे जब डॉक्टर के पास पहुंचे, तो उन्हें ‘Coldrif’ या अन्य सिरप दिए गए, लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई पेशाब रुक गया, बेहोशी, तेज दर्द, कईयों को डायलिसिस तक ले जाना पड़ा। जांच में पता चला इन सिरप्स में Diethylene Glycol (DEG) की मात्रा जानलेवा थी, जिससे कई बच्चों का जीवन छिन गया।
इन बच्चों की मौत सिर्फ एक ‘मेडिकल केस’ या ‘व्यापारिक चूक’ नहीं थी, यह उनके परिवारों पर कयामत बनकर टूटी। माताएँ जिन्होंने अपने बच्चों को भरोसे के साथ दवा पिलाई थी, अब उनसे सवाल कर रही थी “हमने तो डॉक्टर की सलाह मानी, लेकिन हमारा बच्चा चला क्यों गया?” अस्पतालों का माहौल अफरातफरी, डॉक्टरों की आँखों में पछतावा, और सिस्टम की सुस्ती सबका दर्द अलग-अलग, लेकिन त्रासदी एक मासूमों की अकाल मृत्यु।
Coldrif सिरप की पैदावार तमिलनाडु के Sresan Pharmaceuticals में हुई, जहाँ जांच के दौरान सैंकड़ों नियमों का उल्लंघन सामने आया रसायन की टेस्टिंग ठीक से न होना, कुछ बैच में औद्योगिक ग्रेड सॉल्वेंट का इस्तेमाल, कई कच्चे माल बिना सुव्यवस्थित गुणवत्ता जांच के। मानवीय विफलता यह थी सरकारी फार्मा रेगुलेटर, बाजार में आपूर्ति, दुकानें, डॉक्टर और यहां तक कि टेस्टिंग लैब किसी ने भी समय रहते सिरप को रोकने की जिम्मेदारी नहीं निभाई। बच्चों को जहर मिल गया, और सरकारी मशीनरी और विक्रेताओं ने तब जागरूकता दिखाई जब त्रासदी घट चुकी थी।
भारत का दवा नियंत्रक तंत्र, CDSCO, कागज पर मजबूत दिखता है लाइसेंसिंग, इंस्पेक्शन, टेस्टिंग, सप्लाई ट्रैकिंग। लेकिन असलियत में पावर का बँटवारा केंद्र और राज्य स्तर पर इतना जटिल है कि सुरक्षा की गारंटी कहीं नहीं बचती। ऑडिट रिपोर्ट बताती हैं अधकच्चे लैब, स्टाफ की कमी, टेस्टिंग के बेसिक रिसोर्स की तंगी, और छोटे शहरों-कस्बों में खुले में बिका सिरप सबने मिलकर शासन को पंगु बना दिया। बार-बार बच्चों की मौतों के बाद इंस्पेक्शन बढ़ता है, लेकिन सिस्टम रिएक्ट करता है पहले कभी एक्टिव डिटेक्शन, पब्लिक रिव्यू या ओपन रिपोर्टिंग नहीं दिखी।
भारत विश्व में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है, लेकिन जब फायदा प्राथमिकता हो जाए और लागत बचाने के लिए टेस्टिंग या क्वालिटी पर समझौता हो नतीजे हमेशा त्रासदी ही रहे। DEG जैसे रसायन निर्देशित मात्रा से बहुत अधिक निकल जाता है क्योंकि औद्योगिक ग्रेड रसायन को छांटने में कोताही की जाती है, या टेस्टिंग रिपोर्ट की जगह ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’ ही मान्य हो जाता है।
सरकार, राज्य, रेगुलेटर, अस्पताल सबने कहा “हमें नहीं पता था” लेकिन यही लापरवाही सबसे बड़ा अपराध है। बच्चों की जिंदगी सिर्फ डाटा या संख्या नहीं, हर मौत एक परिवार का उजड़ना, समाज के भरोसे का टूटना है। सरकारी कार्रवाई सिरप बैन किया गया, फैक्ट्री सील, इन्स्पेक्शन शुरू हुए मगर तब, जब मौतें हो गईं। दिल्ली सहित देश भर में सैंकड़ों दवाएं हर साल गुणवत्ता टेस्ट में फेल होती हैं, लेकिन फैसलों में तेज़ी, पारदर्शिता, और सख़्त सज़ा अक्सर गायब होती है।
दवा गुणवत्ता की जांच, हर बैच की पब्लिक टेस्ट रिपोर्ट और रीयल टाइम मॉनिटरिंग का सिस्टम बनें। राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत, प्रोएक्टिव रेगुलेटर जो मरीजों, बच्चों और समाज के प्रति जवाबदेह हो। मेडिकल स्टोर, डॉक्टर, अस्पताल मिलकर संदिग्ध दवाओं की शिकायत व ट्रैकिंग के लिए खुला मंच बनाएं। टेस्टिंग लैब्स को संसाधन, स्टाफ और स्वतंत्र शक्ति मिले डर व लॉबिंग से परे। पीड़ित बच्चों के परिवारों को तत्काल राहत, कानूनी मदद और समाज से समर्थन मिले।
भारत का दवा और फार्मा कारोबार गर्व की बात है, लेकिन बच्चों की मौत यदि प्रशासन की सुस्ती, नीति की विफलता और व्यवसाय की लापरवाही से हो तो यह सिर्फ नियम उल्लंघन नहीं, नैतिक अपराध है। हर बार जब किसी मां–बाप ने बच्चे को सुरक्षित समझकर दवा दी वह भरोसा सिर्फ सिस्टम, नियमन और जवाबदेही की बुनियाद पर था। अब जरूरत है हर मौत को आंकड़ा या हादसा नहीं, चेतावनी माना जाए। ऐसा सिस्टम बनाएं, जिससे हर जिंदगी की सुरक्षा व्यवस्था ही सर्वोच्च प्राथमिकता हो।



