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भारत की ऊर्जा सुरक्षा: कच्चे तेल की मजबूरी

पश्चिमी दबाव का गणित कूटनीतिक दुविधा

पिछले कुछ वर्षों में, खासकर रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद, दुनिया की भू-राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदले हैं। एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देश हैं जो रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और दूसरी तरफ भारत है जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। इस जटिल समय में, भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्रीय रक्षा आवश्यकताओं और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक स्वायत्तता  के बीच एक नाजुक संतुलन साधना है।

रूस की ओर से भारत को “निर्बाध” ईंधन आपूर्ति का वादा इस संतुलन का एक अहम हिस्सा है। यह वादा केवल व्यापारिक नहीं है, बल्कि गहरे कूटनीतिक भरोसे और दशकों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों की नींव पर टिका है। लेकिन इस भरोसे की कीमत पश्चिमी देशों के बढ़ते दबाव के रूप में चुकानी पड़ सकती है। यह संपादकीय इसी बारीक संतुलन को समझने का प्रयास करता है: तेल, हथियार और स्वायत्तता क्या भारत इन तीनों को साधते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बरकरार रख सकता है?

किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा उसकी जीवनरेखा होती है। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, अपनी 80% से अधिक कच्चे तेल की ज़रूरतों को आयात से पूरा करता है। जब रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगे, तो सस्ते रूसी तेल ने भारत के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान किया, जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को दोहरी मार से बचाया।

यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। रूस ने भारत को रियायती दर पर तेल की पेशकश की। भारत ने समझदारी दिखाते हुए इस अवसर को भुनाया। यह भारत की जनता और उद्योग दोनों के लिए महंगाई से बड़ी राहत थी। आंकड़ों की ज़ुबानी जहाँ 2021 में रूस से भारत का तेल आयात कुल आयात का 1% से भी कम था, वहीं 2023 तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। यह दिखाता है कि भारत ने पश्चिमी हितों की परवाह किए बिना, राष्ट्रीय आर्थिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को डॉलर-आधारित व्यापार प्रणाली से बाहर कर दिया। भारत ने इसका समाधान “रुपया-रुबल व्यापार तंत्र” या अन्य स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से ढूंढा। यह केवल रूस के साथ व्यापार जारी रखने का तरीका नहीं था, बल्कि डॉलर पर हमारी निर्भरता कम करने और रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा देने की दिशा में एक साहसिक कदम था। भारत ने साफ कह दिया कि हमारे लिए देश की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा ज़रूरतें, पश्चिमी देशों के राजनीतिक हितों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। यह एक शुद्ध आर्थिक निर्णय था, जिसे भारत ने अपनी संप्रभुता का प्रयोग करते हुए लिया।

तेल तो आज की ज़रूरत है, लेकिन रक्षा संबंध भारत और रूस के बीच दशकों पुराने, भरोसे की नींव हैं। भारत की लगभग 60% रक्षा उपकरण आपूर्ति रूस या सोवियत संघ के समय के हथियारों पर निर्भर करती है। भारत की सेना, नौसेना और वायु सेना में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म जैसे सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान, T-90 टैंक, और S-400 वायु रक्षा प्रणाली—रूस से ही आते हैं। ये केवल उपकरण नहीं हैं; ये भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पश्चिमी देशों को रूस पर पुर्जों की आपूर्ति रोकने के लिए दबाव बनाने का मौका दिया। पश्चिमी देश चाहते थे कि भारत S-400 जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियों का आयात बंद कर दे। लेकिन भारत जानता था कि इन हथियारों के पुर्जे और रखरखाव केवल रूस ही सुनिश्चित कर सकता है। अगर भारत अचानक आपूर्ति रोकता है, तो उसकी सैन्य तत्परता पर सीधा असर पड़ेगा, खासकर चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवादों को देखते हुए।

अमेरिका का ‘काउंटरिंग अमेरिका’ज एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन्स एक्ट’ (CAATSA) एक ऐसा कानून है जिसके तहत रूस से रक्षा सौदे करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अमेरिका ने भारत को S-400 खरीदने के लिए CAATSA प्रतिबंधों से छूट दी है, लेकिन यह तलवार हमेशा लटकी रहती है। भारत ने लगातार यह रुख बनाए रखा है कि वह अपनी रक्षा ज़रूरतों को किसी बाहरी दबाव में तय नहीं करेगा। भारत के लिए रूस के साथ रक्षा संबंध, जीवन बीमा पॉलिसी की तरह हैं। इस पर समझौता करना, अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को दांव पर लगाने जैसा होगा, जो भारत कतई नहीं कर सकता।

पश्चिमी देश खासकर अमेरिका भारत को रूस से दूर रखने के लिए लगातार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव बनाते रहे हैं। यह दबाव बहुआयामी है। G7 देशों ने रूसी तेल पर प्राइस कैप (मूल्य सीमा) लगाई हुई है। उनका मकसद है कि रूस को तेल से होने वाली कमाई को कम किया जाए। भारत ने तकनीकी रूप से इस प्राइस कैप का पालन करने की कोशिश की है, लेकिन साथ ही रूस से सस्ते में तेल खरीदा है, जिससे पश्चिमी देशों को यह संदेश गया है कि भारत उनके एजेंडे का हिस्सा नहीं बनेगा।

पश्चिमी देश, भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए, रूस की कार्रवाइयों के खिलाफ खड़े होने का नैतिक दबाव भी बनाते हैं। वे चाहते हैं कि भारत, संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ वोट करे और उसे अलग-थलग करने में मदद करे। भारत ने इस पर “तटस्थ” रहने का रास्ता अपनाया है संयुक्त राष्ट्र में अक्सर मतदान से दूर रहकर।

पश्चिमी दबाव केवल नकारात्मक नहीं है। वे भारत को वैकल्पिक रक्षा उपकरण (जैसे अमेरिकी और यूरोपीय लड़ाकू विमान) और उन्नत तकनीक की पेशकश करके भी लुभा रहे हैं। इसका उद्देश्य भारत की रक्षा बास्केट में रूस की हिस्सेदारी को कम करना है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को नुकसान पहुँचाए बिना, रूस के साथ अपने पुराने और ज़रूरी संबंधों को कैसे बरकरार रखे।

रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में इसे और मजबूती मिली है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर, किसी भी प्रमुख शक्ति या गुट के दबाव में आए बिना, अपने निर्णय स्वयं लेगा। यह शीत युद्ध के ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ से अलग है।

आज की नीति को ‘बहु-संरेखण’ कहा जाता है, जिसका मतलब है चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ QUAD जैसे समूहों में सक्रिय साझेदारी। रक्षा और ऊर्जा ज़रूरतों के लिए ऐतिहासिक भागीदार को बनाए रखना। क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाना। व्यापार, निवेश और हरित ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए संपर्क बढ़ाना।

भारत ने सफलतापूर्वक यह साबित किया है कि वह एक समय में अलग-अलग भू-राजनीतिक समूहों के साथ काम कर सकता है, बशर्ते वह उसके राष्ट्रीय हित में हो। पश्चिमी देशों को यह समझना होगा कि भारत 1970 के दशक का कमजोर देश नहीं है, बल्कि एक उभरती हुई शक्ति है जिसके अपने नियम हैं।

भारत ने इस जटिल परिस्थिति में संतुलन साधने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। रूस पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने इज़राइल, फ्रांस (राफेल), अमेरिका (अपवाद के बावजूद) और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से उच्च-स्तरीय रक्षा तकनीकें और उपकरण खरीदना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत देश में ही रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

रूसी तेल पर निर्भरता के बावजूद, भारत सक्रिय रूप से मध्य पूर्व, अफ्रीका और अमेरिका से भी तेल खरीद रहा है। यह सुनिश्चित करता है कि अगर किसी भी एक स्रोत से आपूर्ति बाधित होती है, तो दूसरा स्रोत उपलब्ध रहे। भारत, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर भी बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, ताकि लंबी अवधि में आयात पर निर्भरता कम हो सके।

भारत ने यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत तेज कर दी है। पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी को मजबूत करके, भारत कूटनीतिक रूप से यह सुनिश्चित करता है कि वे रूस के साथ उसके संबंधों के कारण उस पर गंभीर प्रतिबंध लगाने से पहले दो बार सोचें। भारत का पक्ष मानवीय और आर्थिक ज़रूरतों पर आधारित है। भारत लगातार पश्चिमी देशों को समझाता रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा का सीधा संबंध लाखों लोगों के जीवन-यापन से है, और इस पर समझौता करना अव्यावहारिक है।

यह संतुलन साधना आसान नहीं है, और आने वाले वर्षों में चुनौतियाँ बढ़ेंगी पश्चिमी देश भारत को उन्नत तकनीक देने में हमेशा संकोच करते हैं, खासकर रक्षा क्षेत्र में, जब तक कि भारत रूस से पूरी तरह दूर न हो जाए। भारत को अपनी सौदेबाजी की शक्ति का उपयोग करके यह प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सुनिश्चित करना होगा।

रूस स्वयं अंतर्राष्ट्रीय दबाव में है। भारत को यह भी आकलन करना होगा कि क्या रूस भविष्य में एक विश्वसनीय और स्थिर आपूर्तिकर्ता बना रहेगा, या क्या भारत को अपनी दीर्घकालिक योजनाओं को और तेजी से विविधता की ओर ले जाना चाहिए। अमेरिका के साथ भारत का रणनीतिक तालमेल काफी हद तक चीन की बढ़ती शक्ति पर निर्भर करता है। अगर चीन-अमेरिका संबंध बदलते हैं, या चीन किसी बड़े टकराव में शामिल होता है, तो भारत के लिए संतुलन साधना और भी मुश्किल हो जाएगा।

“तेल, हथियार और स्वायत्तता” की यह त्रिमूर्ति ही आज के भारत की विदेश नीति को परिभाषित करती है। रूस के “निर्बाध” ईंधन आपूर्ति के वादे को स्वीकार करके और पुराने रक्षा संबंधों को बनाए रखकर, भारत ने न केवल अपनी राष्ट्रीय ज़रूरतों को सुरक्षित किया है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी अन्य देश की विदेश नीति का अनुपालन नहीं करेगा।

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