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भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी 2025: पुराना दोस्त, नया मैदान

शिखर सम्मेलन का सूक्ष्म विश्लेषण

भारत और रूस के बीच संबंध, जिन्हें अक्सर “समय-परीक्षित मित्रता” कहा जाता है, दशकों के इतिहास, शीत युद्ध की साझेदारी और अटूट रक्षा सहयोग पर टिके हैं। ये रिश्ते केवल दो देशों के बीच के नहीं हैं, बल्कि भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की नींव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

लेकिन हम वर्ष 2025 में खड़े हैं। दुनिया नाटकीय रूप से बदल चुकी है। रूस, यूक्रेन संघर्ष के कारण पश्चिमी प्रतिबंधों के घेरे में है और चीन पर उसकी निर्भरता बढ़ी है। दूसरी ओर, भारत, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है खासकर चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए।

इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में, हाल ही में संपन्न भारत-रूस शिखर सम्मेलन का महत्व क्या है? क्या यह वास्तव में उस ऐतिहासिक साझेदारी का “नवीनीकरण” है, जहाँ हम पुराने उत्साह और विश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं? या फिर यह भू-राजनीतिक वास्तविकता के दबाव में किया गया एक सतर्क “पुनर्मूल्यांकन” है, जहाँ भारत अपने हितों को साधते हुए इस संबंध की नाज़ुक डोर को थामे रखने की कोशिश कर रहा है?

भारत-रूस संबंध तीन मुख्य स्तंभों पर टिके रहे हैं: रक्षा, कूटनीति और परमाणु ऊर्जा। भारत की सैन्य शक्ति का लगभग 60% हिस्सा रूसी मूल का है। दशकों से, रूस ने भारत को उस उन्नत रक्षा तकनीक तक पहुँच दी, जिसे पश्चिमी देशों ने देने से इनकार कर दिया था। एस-400 मिसाइल प्रणाली या सुखोई लड़ाकू विमान जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियाँ आज भी हमारी सेना की ताकत हैं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर रूस का लगातार समर्थन भारत के लिए अमूल्य रहा है। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थक हैं, यानी एक ऐसी दुनिया जहाँ अमेरिका का एकाधिकार न हो, बल्कि कई शक्तिशाली केंद्र हों।यूक्रेन युद्ध के बाद, पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। इससे भारत को रूस से रक्षा पुर्जों की आपूर्ति में देरी जैसी तकनीकी और लॉजिस्टिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। साथ ही, पश्चिमी देश लगातार भारत पर दबाव बना रहे हैं कि वह रूस से दूरी बनाए, खासकर रक्षा सौदों के मामले में, ताकि वह अमेरिकी CAATSA (काउंटरिंग अमेरिका’ज एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन्स एक्ट) जैसे प्रतिबंधों के दायरे में न आए।

नवीनतम शिखर सम्मेलन ने निश्चित रूप से यह संकेत दिया है कि दोनों देशों ने इस साझेदारी को बनाए रखने का दृढ़ संकल्प लिया है। नवीनीकरण के प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं इस शिखर सम्मेलन का सबसे बड़ा और ठोस नतीजा ऊर्जा क्षेत्र में दिखा। रूस ने भारत को न केवल कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति का वादा दोहराया, बल्कि अब यह सहयोग गैस और कोयले तक भी बढ़ गया है। भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए सस्ते रूसी तेल पर निर्भर रहा है, जिससे उसे अरबों डॉलर की बचत हुई है। शिखर सम्मेलन ने इस वाणिज्यिक साझेदारी को दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया।

दोनों देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की मात्रा को बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम होगी। यह कदम भारत की अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में रुपये को बढ़ावा देने की महत्वाकांक्षा के अनुरूप है। अब फोकस केवल “खरीद” (Buy) पर नहीं, बल्कि “मिलकर उत्पादन” पर है। रूस ने भारत में ही कई महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के पुर्जे और उत्पादन सुविधाएँ स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है। यह भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के लिए एक बड़ा समर्थन है।

दोनों देशों ने रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी और निवेश बढ़ाने पर जोर दिया है। इसमें चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे को पुनर्जीवित करना शामिल है। यह भारत को आर्कटिक और प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति बनाने का एक नया रास्ता देता है। शिखर सम्मेलन के दौरान लिए गए ये निर्णय दिखाते हैं कि संबंध की जड़ें अभी भी मजबूत हैं और दोनों देश इन्हें अपने राष्ट्रीय हितों के लिए आगे बढ़ाना चाहते हैं।

हालांकि, शिखर सम्मेलन का माहौल गर्मजोशी भरा था, लेकिन पर्दे के पीछे भारत के रणनीतिकारों ने सावधानीपूर्वक पुनर्मूल्यांकन  किया है, जिसके मुख्य कारण भू-राजनीतिक हैं यह पुनर्मूल्यांकन का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण, रूस लगभग पूरी तरह से आर्थिक और सैन्य रूप से चीन पर निर्भर हो गया है। चीन के साथ रूस की बढ़ती ‘सीमित रहित’ (No-Limits) साझेदारी भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि चीन भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक विरोधी है।

पश्चिमी देशों की तुलना में, रूसी रक्षा तकनीक अब कुछ क्षेत्रों में पुरानी पड़ रही है। भारत को अब पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान, उन्नत ड्रोन प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा प्रणालियों की आवश्यकता है, जिसके लिए भारत को फ्रांस, अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों की ओर देखना पड़ रहा है।

चीन के सामने खड़े होने के लिए, भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ QUAD में अपनी भागीदारी मज़बूत करनी है। इन संबंधों को मज़बूत करने के लिए, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि रूस के साथ उसके संबंध पश्चिमी सहयोग को खतरे में न डालें। भारत अमेरिका के साथ एक महत्वपूर्ण आर्थिक और तकनीकी भागीदार बन चुका है।

रूसी तेल खरीदने के बावजूद, रूस से भारत का निर्यात (Export) रुका हुआ है, जिससे व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ जा रहा है। रुपए-रुबल व्यापार तंत्र में भी कुछ अड़चनें आई हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को भुगतान प्राप्त करने में मुश्किल हुई है। शिखर सम्मेलन में इन मुद्दों को सुलझाने पर जोर दिया गया, जो दिखाता है कि आर्थिक संबंधों को अब पुराने भरोसे से नहीं, बल्कि कठोर व्यापारिक शर्तों पर परखा जा रहा है।

भारत ने इस शिखर सम्मेलन के माध्यम से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता  को स्थापित किया है। यह नीति आज भी भारत के लिए सबसे उपयुक्त है। शीत युद्ध के दौरान ‘गुटनिरपेक्षता’ का मतलब था दूर रहना। आज के ‘बहु-संरेखण’ का मतलब है सक्रिय रूप से सभी प्रमुख शक्तियों के साथ जुड़ना अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ और मध्य पूर्व लेकिन अपने हितों की कीमत पर नहीं।

भारत ने अपनी बढ़ती आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करके दोनों गुटों से अधिकतम लाभ उठाया है। पश्चिमी देशों से उच्च तकनीक हासिल करने के लिए रूस के साथ संबंध एक ‘लीवरेज’ का काम करते हैं। रूस से रियायती तेल हासिल करके भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों को अप्रभावी बना दिया है। भारत BRICS और SCO जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ काम करता रहेगा, ताकि एशिया और यूरेशिया में अपनी क्षेत्रीय भूमिका को सुरक्षित रखा जा सके। यह दिखाता है कि भारत गुट-आधारित राजनीति में विश्वास नहीं करता।

2025 का शिखर सम्मेलन एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है। यह न तो आँख बंद करके पुराना “नवीनीकरण” है और न ही पूरी तरह से “त्याग” या “पुनर्मूल्यांकन”। यह एक परिपक्व साझेदारी की ओर बदलाव है। यह संबंध अब भावनात्मक या ऐतिहासिक मित्रता के बजाय विशुद्ध रूप से व्यावहारिक हो गया है। भारत वहीं रूस के साथ सहयोग करेगा जहाँ वह उसके राष्ट्रीय हित को सीधे लाभ पहुँचाता है जैसे ऊर्जा और विशिष्ट रक्षा पुर्जे।

भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा में विविधीकरण की गति को तेज़ करेगा। रूस अब ‘सर्वोच्च’ रक्षा भागीदार नहीं रहा, बल्कि ‘एक महत्वपूर्ण’ भागीदार है। दोनों देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यापार और भुगतान संबंधी मुद्दे  प्राथमिकता पर हल हों। अगर आर्थिक साझेदारी में दिक्कतें आती हैं, तो रणनीतिक संबंध भी प्रभावित होंगे।

भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी 2025 में एक जटिल, लेकिन आवश्यक चरण में है। नवीनतम शिखर सम्मेलन ने इस रिश्ते को टूटने से बचाया है और इसे एक नई, यथार्थवादी नींव दी है।

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