
मुंबई क्लाइमेट वीक के मंच पर जब भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला और प्रसिद्ध पत्रकार गौरव सावंत के बीच संवाद शुरू हुआ, तो उम्मीद की जा रही थी कि चर्चा अंतरिक्ष के रोमांच और भविष्य के मिशनों पर केंद्रित होगी। लेकिन शुभांशु ने जो अंतर्दृष्टि साझा की, वह मानव अस्तित्व के सबसे मौलिक प्रश्न की ओर मुड़ गई हम पृथ्वी पर कैसे जीवित रहेंगे?
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के भीतर के जीवन का विवरण देते हुए उन्होंने एक ऐसी हकीकत बयान की, जो हमारे ग्रह की वर्तमान ‘उपयोग करो और फेंको’ (Use and Throw) वाली संस्कृति को पूरी तरह चुनौती देती है। उनके द्वारा साझा किया गया यह सूत्र कि “अंतरिक्ष में, निरंतरता (Sustainability) ही जीवन का एकमात्र तरीका है”, आने वाले दशकों में मानवता के लिए अस्तित्व का मंत्र साबित होने वाला है।
अंतरिक्ष यात्री जब पृथ्वी के वायुमंडल को पार करते हैं, तो वे केवल गुरुत्वाकर्षण को ही पीछे नहीं छोड़ते, बल्कि वे संसाधनों की प्रचुरता के भ्रम को भी त्याग देते हैं। पृथ्वी पर हमें लगता है कि हवा मुफ्त है, पानी अंतहीन है और जमीन असीमित कचरा सोख सकती है। लेकिन शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अंतरिक्ष में यह विलासिता (Luxury) मौजूद नहीं है।
शुभांशु शुक्ला ने जो सबसे चौंकाने वाला तथ्य साझा किया, वह है 98% जल पुनर्चक्रण। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन एक ‘क्लोज्ड-लूप सिस्टम’ (Closed-loop system) पर काम करता है। अंतरिक्ष में, अंतरिक्ष यात्रियों के पसीने, केबिन की नमी और यहाँ तक कि उनके मूत्र को भी परिष्कृत (Purify) किया जाता है। अत्याधुनिक निस्पंदन (Filtration) प्रणालियों के माध्यम से, इस ‘अपशिष्ट’ को वापस उस पानी में बदल दिया जाता है जिसे वे पीते हैं और भोजन बनाने में उपयोग करते हैं। आज दुनिया के कई शहर ‘डे ज़ीरो’ (पानी खत्म होने का दिन) की ओर बढ़ रहे हैं। शुभांशु की यह सीख हमें बताती है कि यदि हम अपनी अपशिष्ट जल प्रणालियों को अंतरिक्ष स्टेशन की तरह कुशल बना सकें, तो पृथ्वी पर जल संकट का समाधान हमारे अपने ही घरों के पुनर्चक्रण में छिपा है।
अंतरिक्ष की निर्वात शून्यता में ऑक्सीजन की कमी सबसे बड़ा खतरा है। ISS पर कार्बन डाइऑक्साइड को हवा से निकाला जाता है और ऑक्सीजन को फिर से उत्पन्न किया जाता है। वहाँ ‘ताजी हवा’ नाम की कोई चीज नहीं होती; वहाँ केवल ‘साफ की गई हवा’ होती है। यह तकनीक हमें सिखाती है कि यदि हम पृथ्वी के वायुमंडल को एक सीमित बॉक्स (जो कि वह वास्तव में है) की तरह समझें, तो हम कार्बन उत्सर्जन के प्रति अधिक गंभीर होंगे। जिस तरह एक अंतरिक्ष यात्री हवा की शुद्धता के लिए जिम्मेदार होता है, उसी तरह हर नागरिक को पृथ्वी की हवा के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
अंतरिक्ष में ‘वेस्ट’ (Waste) शब्द का अस्तित्व ही नहीं है। शुभांशु ने बताया कि भोजन का एक कण भी फेंकना असंभव है। वहां भोजन को कैलोरी और पोषण के आधार पर मापा जाता है, न कि स्वाद या दिखावे के लिए। वहां कपड़े हर दिन नहीं बदले जा सकते। सीमित संसाधनों के कारण, कपड़ों का बार-बार उपयोग किया जाता है। यह आज के ‘फास्ट फैशन’ के दौर में एक बहुत बड़ी चेतावनी है, जहाँ करोड़ों टन कपड़े हर साल कचरे के ढेर में बदल जाते हैं।
शुभांशु शुक्ला ने गौरव सावंत से बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि सस्टेनेबिलिटी (निरंतरता) अंतरिक्ष में कोई ‘चॉइस’ नहीं है, बल्कि यह जीवित रहने की एकमात्र शर्त है। पृथ्वी पर सस्टेनेबिलिटी को अक्सर एक ‘ट्रेंड’ या केवल पर्यावरणविदों का मुद्दा माना जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में, यदि आप पुनर्चक्रण नहीं करते हैं, तो आप जीवित नहीं रह सकते। मुंबई क्लाइमेट वीक का यह मंच इस बात का गवाह बना कि हमें अपनी पृथ्वी को भी एक ‘विशाल अंतरिक्ष स्टेशन’ की तरह देखना शुरू करना होगा। हम इस ‘ब्रह्मांडीय जहाज’ के यात्री हैं, और हमारे संसाधन सीमित हैं।
अंतरिक्ष यात्री अक्सर ‘ओवरव्यू इफेक्ट’ का अनुभव करते हैं अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर आने वाला एक संज्ञानात्मक बदलाव। ऊपर से देखने पर पृथ्वी केवल एक ‘ब्लू मार्बल’ दिखती है, जिसके चारों ओर वायुमंडल की एक बहुत पतली चादर है। यह दृष्टि हमें बताती है कि हमारी सुरक्षा के लिए कोई दूसरा ग्रह तैयार नहीं है। शुभांशु का अनुभव यह कहता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए हमें राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक ‘ग्रह-व्यापी सोच’ (Planetary Thinking) विकसित करनी होगी।
शुभांशु शुक्ला ने संकेत दिया कि अंतरिक्ष में विकसित की गई तकनीकें अब पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए उपयोग की जा रही हैं। अंतरिक्ष में सीमित स्थान में उगाई जाने वाली फसलें अब ‘वर्टिकल फार्मिंग’ और कम पानी वाली खेती के लिए प्रेरणा बन रही हैं।
शुभांशु शुक्ला ने मुंबई क्लाइमेट वीक में जो कहा, वह विज्ञान से अधिक एक जीवन-दर्शन है। “सस्टेनेबिलिटी” को एक कठिन अनुशासन के बजाय एक ‘स्वाभाविक संस्कार’ बनाना होगा। यदि हम अंतरिक्ष यात्री की तरह यह समझ लें कि जो हम फेंकते हैं, वह कहीं ‘बाहर’ नहीं जाता, बल्कि हमारे ही इकोसिस्टम में वापस आता है, तो हम कचरा पैदा करना बंद कर देंगे।
अंतरिक्ष हमें विनम्रता सिखाता है। यह हमें सिखाता है कि हम तकनीक के कितने भी धनी क्यों न हो जाएं, हम प्रकृति के उन चक्रों (Cycle) पर निर्भर हैं जिन्हें हम नष्ट कर रहे हैं। शुभांशु शुक्ला की बातें हमें याद दिलाती हैं कि हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितनी दूर तक अंतरिक्ष में जा सकते हैं, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि हम कितनी अच्छी तरह अपनी पृथ्वी को सहेज सकते हैं।



