‘पंच’ की महागाथा: एक निर्जीव खिलौने के साये से सामाजिक स्वीकृति के उजाले तक
'ओरा-मामा': कल्पना और वास्तविकता का संगम

जापान के इचिकावा सिटी चिड़ियाघर (Ichikawa City Zoo) की चहारदीवारी के भीतर से उपजी ‘पंच’ की कहानी केवल एक नन्हे बंदर के जीवित बचने की गाथा नहीं है; यह अकेलेपन, करुणा, और अंततः ‘अपनेपन’ (Belonging) की उस सार्वभौमिक खोज का दस्तावेजीकरण है, जो मनुष्य और पशु दोनों को एक ही धरातल पर खड़ा करती है। जुलाई 2025 में एक अनाथ के रूप में शुरू हुआ पंच का सफर आज एक सामाजिक क्रांति और मनोवैज्ञानिक चमत्कार बन चुका है।
जब हम ‘अपनेपन’ की बात करते हैं, तो अक्सर इसे मानव समाज के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन ‘पंच’ ने दुनिया को दिखाया कि स्पर्श की भूख और समुदाय की तलाश जैविक रूप से हमारे डीएनए (DNA) में अंकित है। जुलाई 2025 में जब पंच का जन्म हुआ, तो इचिकावा चिड़ियाघर के कीपर्स को बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन प्रकृति कभी-कभी बहुत क्रूर होती है। जन्म के कुछ ही समय बाद, पंच की माँ ने उसे दूध पिलाने या उसे गले लगाने से इनकार कर दिया। प्राइमेट (बंदरों की प्रजाति) के बच्चों के लिए अपनी माँ से अलग होना केवल भावनात्मक आघात नहीं, बल्कि एक मृत्युदंड के समान होता है, क्योंकि वे सुरक्षा और गर्मी के लिए पूरी तरह माँ पर निर्भर होते हैं। बिना किसी सामाजिक सहारे के, पंच के जीवित बचने की संभावना बहुत कम थी। वह डरा हुआ था और पिंजरे के एक कोने में सिमट कर बैठा रहता था।
जब चिड़ियाघर के कीपर्स ने देखा कि पंच अवसाद में जा रहा है, तो उन्होंने एक रचनात्मक लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से गहरा प्रयोग किया। उन्होंने उसे एक नरम, नारंगी रंग का भरवां ओरंगुटान खिलौना दिया, जिसे इंटरनेट ने बाद में “ओरा-मामा” (Ora-mama) का नाम दिया। वीडियो में देखा गया कि पंच उस खिलौने से इस तरह लिपट जाता था जैसे वह उसकी अपनी माँ हो। वह उसे अपने साथ हर जगह खींचता, उसके साथ सोता और जब भी डरता, उसके बालों में अपना चेहरा छिपा लेता। हैरी हार्लो के प्रसिद्ध ‘सरोगेट मदर’ प्रयोगों की तरह, पंच ने उस खिलौने में ‘आरामदेह स्पर्श’ (Contact Comfort) खोज लिया। हालाँकि वह खिलौना उसे दूध नहीं दे सकता था, लेकिन उसने उसे वह सुरक्षा का अहसास दिया जो उसके मानसिक विकास के लिए अनिवार्य था।
जैसे ही पंच और उसके खिलौने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, दुनिया भर में एक भावनात्मक लहर दौड़ गई। टोक्यो से लेकर न्यूयॉर्क और दिल्ली तक, लाखों लोग पंच के वीडियो देखने लगे। अजनबी लोग एक-दूसरे से पूछने लगे, “क्या आज पंच ने कुछ खाया?” या “क्या वह आज भी खिलौने के साथ है?” लोगों ने पंच में अपने स्वयं के अकेलेपन और संघर्ष को देखा। #KeepGoingPunch केवल एक हैशटैग नहीं, बल्कि एक वैश्विक प्रार्थना बन गया, जिसने पशु कल्याण और चिड़ियाघरों में जानवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर एक नई बहस शुरू कर दी।
चिड़ियाघर से हाल ही में आई रिपोर्टें किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। पंच ने धीरे-धीरे खिलौने पर अपनी निर्भरता कम की और अपनी प्रजाति के अन्य बंदरों की ओर कदम बढ़ाए। बंदरों के समाज में, ‘ग्रूमिंग’ (एक-दूसरे के शरीर से परजीवी निकालना या बाल संवारना) केवल स्वच्छता नहीं है। यह ‘सोशल ग्लू’ (Social Glue) है। यह विश्वास, अधीनता और स्वीकृति का संकेत है। जब एक अन्य मकाक ने पहली बार पंच को ग्रूम करना शुरू किया, तो वह पंच के लिए एक ‘नागरिकता प्रमाण पत्र’ मिलने जैसा था। अब पंच अन्य युवा बंदरों के साथ खेलता है। शुरुआत में वह सहमा हुआ था, लेकिन अब वह पूरे आत्मविश्वास के साथ उनके साथ कुश्ती करता है और पेड़ों पर छलांग लगाता है। वह खिलौना, जो कभी उसकी पूरी दुनिया था, अब केवल एक बचपन की याद बनकर रह गया है।
इचिकावा चिड़ियाघर की इस सफलता ने वन्यजीव संरक्षणवादियों को एक नया दृष्टिकोण दिया है। जानवरों को केवल भोजन और पानी देना पर्याप्त नहीं है; उनके भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खिलौनों का उपयोग ‘एनरिचमेंट’ (Enrichment) के रूप में करना यह दर्शाता है कि कैसे छोटी-छोटी मानवीय कोशिशें बड़े बदलाव ला सकती हैं।
पंच की कहानी हमें तीन महत्वपूर्ण जीवन-पाठ सिखाती है घावों को भरने में समय लगता है। पंच को खिलौने से वास्तविक साथियों तक पहुँचने में सात महीने लगे। कभी-कभी एक ‘नकली’ सहारा भी हमें वास्तविक दुनिया का सामना करने के लिए तैयार कर सकता है। हम चाहे मनुष्य हों या बंदर, हम अकेले रहने के लिए नहीं बने हैं। हमारा असली अस्तित्व हमारे रिश्तों में है।
आज जब पंच अपने साथियों के साथ इचिकावा चिड़ियाघर के पेड़ों पर खेलता है, तो वह उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन में ‘रिजेक्शन’ (अस्वीकृति) का सामना कर रहे हैं। जिस बच्चे को उसकी अपनी माँ ने ठुकरा दिया था, उसे आज पूरी दुनिया ने अपना लिया है।
पंच अब एक ‘अकेला बंदर’ नहीं है; वह एक ऐसे समुदाय का हिस्सा है जहाँ उसे सुना जाता है, उसे ग्रूम किया जाता है और उसे प्यार किया जाता है। #KeepGoingPunch की यात्रा यह सिद्ध करती है कि ‘घर’ (Home) वह स्थान नहीं है जहाँ आप पैदा होते हैं, बल्कि वह स्थान है जहाँ आपको अपनाया जाता है।



