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बिहार में ‘सम्राट’ युग का उदय: सम्राट चौधरी ने संभाली कमान

नीतीश कुमार के दो दशक लंबे शासन का अंत और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री

14 अप्रैल, 2026 की तारीख बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है। लगभग 21 वर्षों तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, जिससे राज्य की राजनीति में एक लंबे युग का समापन हुआ। उनके स्थान पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कद्दावर नेता और वर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बिहार का नया मुख्यमंत्री चुना गया है। यह पहला अवसर है जब बिहार में भाजपा का कोई नेता मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेगा। यह राजनीतिक बदलाव न केवल नेतृत्व का परिवर्तन है, बल्कि बिहार में दशकों से चले आ रहे राजनीतिक समीकरणों का पूरी तरह से बदल जाना भी है।

मंगलवार (14 अप्रैल) की दोपहर नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट की अंतिम बैठक बुलाई और सभी मंत्रियों को मंत्रिपरिषद भंग करने के निर्णय की जानकारी दी। इसके तुरंत बाद वे राजभवन पहुँचे और राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनावों में नीतीश कुमार के चुने जाने के बाद यह स्पष्ट था कि वे केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाएंगे। ‘सुशासन बाबू’ के रूप में विख्यात नीतीश कुमार ने 2005 से (बीच में जीतन राम मांझी के कुछ महीनों के कार्यकाल को छोड़कर) बिहार की कमान संभाली थी। नीतीश कुमार के नाम बिहार में सबसे अधिक 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का रिकॉर्ड है। उनके कार्यकाल को सड़क, बिजली और महिला सशक्तिकरण (साइकिल योजना व शराबबंदी) के बड़े सुधारों के लिए याद किया जाएगा।

57 वर्षीय सम्राट चौधरी (राकेश कुमार) का मुख्यमंत्री चुना जाना भाजपा के लिए एक बड़ी जीत है। वे बिहार के मुंगेर जिले के लखनपुर गांव के रहने वाले हैं और एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के दिग्गज रहे हैं और सात बार विधायक व सांसद रह चुके हैं। उनकी माता पार्वती देवी भी तारापुर से विधायक रही हैं। सम्राट चौधरी ने 1990 में राजनीति में कदम रखा था। वे राजद (RJD) और जदयू (JD-U) में रहने के बाद 2017-18 में भाजपा में शामिल हुए। उन्होंने भाजपा में प्रदेश उपाध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और विधान परिषद में विपक्ष के नेता जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। सम्राट चौधरी को बिहार में ओबीसी (कोइरी-कुशवाहा) समाज के एक सशक्त और मुखर चेहरे के रूप में देखा जाता है। उनकी नियुक्ति भाजपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

मुख्यमंत्री पद के लिए नामांकित होने के बाद सम्राट चौधरी ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी भावनाओं को साझा किया। उनकी प्रतिक्रिया में सेवा का भाव और जिम्मेदारी का अहसास दिखा:

“यह मेरे लिए केवल एक पद नहीं, बल्कि बिहार की जनता की सेवा करने का एक पवित्र अवसर है। मैं उनके विश्वास और सपनों को पूरा करने के लिए पूरी निष्ठा, प्रतिबद्धता और ईमानदारी के साथ काम करने का संकल्प लेता हूँ।”

सम्राट चौधरी 15 अप्रैल 2026 को सुबह 11:00 बजे पटना के लोक भवन (या राजभवन परिसर) में शपथ लेंगे। चूंकि यह एनडीए (NDA) की सरकार है, इसलिए सम्राट चौधरी के साथ विजय कुमार सिन्हा (भाजपा) और जदयू के वरिष्ठ नेताओं को उपमुख्यमंत्री या महत्वपूर्ण मंत्रियों के रूप में शपथ दिलाई जा सकती है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में भाजपा 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। सम्राट चौधरी को जदयू और अन्य छोटे सहयोगी दलों (जैसे चिराग पासवान की लोजपा-आर और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम) का पूर्ण समर्थन प्राप्त है।

एक नए मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां होंगी बिहार में पलायन को रोकना और बड़े उद्योगों को लाना उनकी प्राथमिकता होगी। उन्होंने पहले भी ’50 लाख रोजगार’ के लक्ष्य की बात की है। नीतीश कुमार के दौर की कानून-व्यवस्था (सुशासन) को बनाए रखना और उसे और अधिक सख्त बनाना भाजपा के एजेंडे में प्रमुख है। सम्राट चौधरी ने अक्सर राजद शासन के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार पर हमला किया है। अब सत्ता में आने के बाद, वे पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दे सकते हैं। हाल ही में उन्होंने बिहार के सीमावर्ती इलाकों में ‘घुसपैठियों’ की पहचान करने और उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाने की बात कही थी, जो उनके ‘प्रखर राष्ट्रवाद’ के एजेंडे को दर्शाता है।

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में एक ‘स्ट्रक्चरल शिफ्ट’ (संरचनात्मक बदलाव) है अब तक भाजपा बिहार में बैसाखी (नीतीश कुमार) पर निर्भर मानी जाती थी, लेकिन अब पार्टी ने अपना स्वयं का नेतृत्व स्थापित कर लिया है। भाजपा ने सम्राट चौधरी (कोइरी-कुशवाहा) के माध्यम से ‘मंडल’ राजनीति के वोट बैंक में सेंध लगाने और उसे ‘कमंडल’ (हिंदुत्व) के साथ जोड़ने का प्रयास किया है।

14 अप्रैल 2026 को राजभवन में हुआ यह सत्ता परिवर्तन बिहार के लिए केवल चेहरे का बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जहाँ बिहार अब केंद्र के साथ मिलकर ‘डबल इंजन’ की रफ्तार से चलने को तैयार है। सम्राट चौधरी के सामने नीतीश कुमार जैसी महान विरासत को आगे बढ़ाने और अपनी एक नई छाप छोड़ने की दोहरी चुनौती है।

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