
15 अप्रैल, 2026 को भारत के संसदीय इतिहास में एक ऐसे विजन की नींव रखी गई है जो आने वाली सदियों तक देश की लोकतांत्रिक दिशा को प्रभावित करेगा। केंद्र सरकार ने लोकसभा की सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का एक क्रांतिकारी मसौदा तैयार किया है। इस परिवर्तन के लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी है, जिसे इसी सप्ताह बुलाए जा रहे विशेष संसदीय सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।
यह केवल सीटों की संख्या में वृद्धि नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक और भौगोलिक पुनर्गठन (Political & Geographical Restructuring) का हिस्सा है। इस प्रस्ताव के केंद्र में महिला आरक्षण को धरातल पर उतारना, बढ़ती जनसंख्या को प्रभावी प्रतिनिधित्व देना और 2029 के आम चुनावों के लिए एक नया लोकतांत्रिक ढांचा तैयार करना है।
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, लोकसभा का स्वरूप अब तक के सबसे बड़े विस्तार से गुजरेगा। सरकार का तर्क है कि 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई 543 सीटें अब 145 करोड़ से अधिक की जनसंख्या के लिए अपर्याप्त हैं। प्रस्तावित ढांचे में भारत के 28 राज्यों को कुल 815 सीटें आवंटित की जाएंगी। इसका अर्थ है कि लगभग हर बड़े राज्य की सीटों की संख्या में 40% से 60% तक की वृद्धि होगी।
देश के 8 केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए 35 सीटें आरक्षित की गई हैं। दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे बड़े UTs को इसमें प्रमुख हिस्सा मिलेगा। वर्तमान में एक लोकसभा सांसद औसतन 25 लाख से अधिक नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है। सीटों की संख्या 850 होने पर यह अनुपात घटकर 15 से 17 लाख प्रति सांसद रह जाएगा। इससे निर्वाचन क्षेत्र छोटे होंगे, जिससे सांसदों का अपने क्षेत्र के विकास और जनता से जुड़ाव अधिक प्रभावी हो सकेगा।
सीटों के इस विस्तार के लिए संविधान के अनुच्छेद 81 और अनुच्छेद 82 में संशोधन की आवश्यकता है। 2002 में पारित 84वें संविधान संशोधन ने 2026 तक सीटों की संख्या को फ्रीज (Freeze) कर दिया था। अब वह समय सीमा समाप्त हो रही है। 131वां संशोधन इस ‘फ्रीज’ को हटाकर नए परिसीमन का मार्ग प्रशस्त करेगा। सरकार का प्रस्ताव है कि परिसीमन को 2011 की जनगणना के आधार पर तत्काल शुरू किया जाए, जबकि 2027 की डिजिटल जनगणना के आंकड़ों को भविष्य के संशोधनों के लिए सुरक्षित रखा जाए। एक उच्चाधिकार प्राप्त ‘परिसीमन आयोग’ का गठन किया जाएगा। यह आयोग न केवल सीटों की संख्या बढ़ाएगा, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण भी करेगा ताकि प्रत्येक सीट पर जनसंख्या का भार लगभग समान रहे।
2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) को लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना एक गणितीय और राजनीतिक आवश्यकता बन गई थी। यदि 543 सीटों में ही 33% आरक्षण दिया जाता, तो लगभग 180 मौजूदा पुरुष सांसदों की सीटें कम हो जातीं। इससे राजनीतिक दलों के भीतर भारी असंतोष और विद्रोह की संभावना थी। 850 सीटों के साथ, 283 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसके बावजूद, लगभग 567 सीटें सामान्य श्रेणी के लिए बचेंगी, जो वर्तमान की कुल सीटों (543) से भी अधिक हैं। इस प्रकार, किसी भी मौजूदा वर्ग के प्रतिनिधित्व को कम किए बिना महिलाओं को उनका हक दिया जा सकेगा।
इस प्रस्ताव का सबसे विवादित पहलू क्षेत्रीय असंतुलन है। दक्षिण भारतीय राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में इस विस्तार को लेकर गहरी चिंताएं हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों ने पिछले 50 वर्षों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए उत्कृष्ट कार्य किया है। वहीं, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। परिसीमन का वर्तमान फॉर्मूला उन राज्यों को अधिक सीटें देता है जिनकी जनसंख्या अधिक है।
सीटों का अनुमानित वितरण:
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उत्तर प्रदेश: 80 से बढ़कर ~140 सीटें होने का अनुमान।
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बिहार: 40 से बढ़कर ~75 सीटें।
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तमिलनाडु/केरल: इनकी सीटों में मामूली वृद्धि होगी, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में इनकी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) कम हो सकती है।
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विपक्षी दलों और दक्षिणी मुख्यमंत्रियों की मांग है कि सीटों का आवंटन केवल जनसंख्या पर नहीं, बल्कि विकास के पैमानों पर भी होना चाहिए। सरकार इस चिंता को दूर करने के लिए राज्यों को दिए जाने वाले वित्तीय अनुदान (Finance Commission) में बदलाव पर विचार कर रही है।
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यह विस्तार आकस्मिक नहीं है। 2023 में उद्घाटित नया संसद भवन इसी दिन के लिए तैयार किया गया था। नए संसद भवन के लोकसभा चैंबर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वहां 888 सदस्य एक साथ बैठ सकें। संयुक्त सत्र के दौरान इसकी क्षमता 1,272 सदस्यों तक बढ़ाई जा सकती है। प्रत्येक सीट पर बायोमेट्रिक वोटिंग, अनुवाद प्रणाली और डिजिटल टैबलेट की सुविधा है, जिससे 850 सांसदों के साथ भी सदन की कार्यवाही को कुशलतापूर्वक संचालित किया जा सकेगा।
| चरण | अवधि | अपेक्षित कार्य |
| विधेयक पारित होना | अप्रैल-मई 2026 | संसद के दोनों सदनों और कम से कम 50% राज्य विधानसभाओं से मंजूरी। |
| परिसीमन आयोग का कार्य | 2026-2027 | राज्यों का दौरा, आपत्तियां सुनना और सीमाओं का अंतिम निर्धारण। |
| जनगणना एकीकरण | 2027-2028 | डिजिटल जनगणना 2027 के आंशिक आंकड़ों का मिलान। |
| आरक्षण रोटेशन | 2028 के अंत में | महिलाओं के लिए 283 सीटों का चयन और रोटेशन पॉलिसी की घोषणा। |
| ऐतिहासिक चुनाव | मई 2029 | 850 सीटों पर भारत का पहला ‘वृहद’ आम चुनाव। |
लोकसभा सीटों को 850 करना केवल एक संख्यात्मक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह “अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार” की दिशा में एक कदम है। यह छोटे निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से जमीनी स्तर की समस्याओं को संसद के पटल तक पहुँचाने का प्रयास है।
हालांकि, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं और संघीय संतुलन को बनाए रखना सरकार के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो 2029 की लोकसभा न केवल महिलाओं की भारी भागीदारी की गवाह बनेगी, बल्कि यह बदलते भारत की जनसांख्यिकीय हकीकत का सही प्रतिबिंब भी होगी।



