
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ‘भाषा’ और ‘पहचान’ का मुद्दा केंद्र में आ गया है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की हालिया घोषणा ने मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र के परिवहन क्षेत्र में हलचल मचा दी है। 1 मई, 2026 (महाराष्ट्र दिवस) से राज्य के सभी लाइसेंस प्राप्त ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा की दक्षता साबित करना अनिवार्य कर दिया गया है। यह केवल बोलने तक सीमित नहीं है; अब ड्राइवरों को आरटीओ (RTO) के सामने मराठी पढ़ने और लिखने का औपचारिक टेस्ट देना होगा। ऐसा न करने पर उनके आजीविका के साधन लाइसेंस और परमिट रद्द किए जा सकते हैं।
परिवहन विभाग ने 1 मई से पूरे राज्य में एक सघन सत्यापन अभियान (Verification Drive) चलाने का खाका तैयार किया है। महाराष्ट्र के सभी 59 क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTOs) में विशेष दस्ते तैनात किए जाएंगे। ये दस्ते सड़क पर और कार्यालयों में ड्राइवरों का ‘भाषाई परीक्षण’ करेंगे। इस परीक्षा में ड्राइवरों को मराठी में लिखे हुए साइनबोर्ड पढ़ने, कुछ बुनियादी वाक्य लिखने और आरटीओ अधिकारियों के साथ मराठी में धाराप्रवाह बातचीत करने के लिए कहा जाएगा।
इस अभियान की सफलता और विफलता को परखने के लिए मीरा-भयंदर क्षेत्र में एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। यहाँ लगभग 1,817 ड्राइवरों की जांच की गई, जिनमें से 111 ड्राइवर मराठी संवाद करने में पूरी तरह असमर्थ पाए गए। इसी रिपोर्ट के आधार पर इसे अब पूरे राज्य में लागू किया जा रहा है।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने स्पष्ट किया है कि यह कोई “नया थोपा गया नियम” नहीं है। सरकार का तर्क है कि ‘महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम, 1989’ (नियम 24) में पहले से ही यह प्रावधान है कि कमर्शियल लाइसेंस के लिए “क्षेत्रीय भाषा का कार्यकारी ज्ञान” (Working Knowledge) होना अनिवार्य है। नवंबर 2019 में इस नियम को और अधिक सख्त बनाने के लिए संशोधित किया गया था। पहले केवल एक हलफनामा (Affidavit) देना पर्याप्त होता था, लेकिन अब सरकार ‘प्रत्यक्ष प्रमाण’ की मांग कर रही है। सरकार ने उन अधिकारियों को भी चेतावनी दी है जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में बिना भाषा जांच के लाइसेंस जारी किए हैं। उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जा सकती है।
इस आदेश के बाद ड्राइवर यूनियनों और विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यूनियनों का तर्क है कि कानून में “वर्किंग नॉलेज” (कामकाजी ज्ञान) की बात कही गई है। एक ड्राइवर को यात्री से किराया पूछने और रास्ता समझने के लिए मराठी आनी चाहिए, लेकिन उसे ‘मराठी लिखने’ या ‘पास पढ़ने’ के लिए मजबूर करना कानून की गलत व्याख्या है।
मुंबई रिक्शामेन यूनियन के नेता थम्पी कुरियन और शशांक राव ने आशंका जताई है कि इस तरह के ‘रैंडम टेस्ट’ से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। आरटीओ अधिकारी गैर-मराठी ड्राइवरों से ‘क्लीन चिट’ देने के बदले रिश्वत की मांग कर सकते हैं। मुंबई और आसपास के इलाकों में लगभग 5 लाख ऑटो और टैक्सी ड्राइवर काम करते हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या उत्तर भारतीय प्रवासियों की है जो दशकों से यहाँ रह रहे हैं। ड्राइवरों का कहना है कि उन्होंने लोन पर गाड़ियाँ ली हैं, अगर उनका लाइसेंस रद्द होता है तो वे सड़क पर आ जाएंगे और उनके परिवार भूखे मरेंगे।
महाराष्ट्र में इस मुद्दे का राजनीतिकरण होना अपरिहार्य था। यह मुद्दा ‘मराठी वोट बैंक’ को साधने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता नाना पटोले ने इसे “मूर्खतापूर्ण विचार” करार दिया है। उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश है और भाषा के आधार पर महाराष्ट्र को बांटने की कोशिश राज्य की विरासत को नष्ट कर देगी।
अबू आसिम आजमी ने इसे असंवैधानिक बताया है। उन्होंने कहा कि “बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, लोग यहाँ रोजी-रोटी कमाने आते हैं। सरकार को उन्हें भाषा सिखानी चाहिए, न कि उन पर दबाव डालकर उनका रोजगार छीनना चाहिए।” सरकार में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) और भाजपा के कुछ धड़े इसे ‘स्थानीय अस्मिता’ के सम्मान के रूप में पेश कर रहे हैं। राज ठाकरे की मनसे (MNS) ने भी इस कदम का समर्थन किया है, जिससे सत्ता पक्ष को अपनी ‘मराठी-मानुष’ छवि को मजबूत करने का मौका मिल रहा है।
| श्रेणी | विवरण |
| कुल ऑटो-रिक्शा परमिट | ~2.8 लाख |
| कुल टैक्सी परमिट | ~20,000 |
| अनुमानित ड्राइवर संख्या | ~5 लाख (दो पालियों में) |
| भाषा परीक्षण की तिथि | 1 मई 2026 से प्रभावी |
| दंडात्मक कार्रवाई | परमिट/बैज का निलंबन या रद्दीकरण |
ड्राइवर यूनियनों और कुछ वकीलों ने पहले ही सरकार को 15 दिनों का नोटिस दिया है। अधिवक्ता फैयाज आलम शेख ने इस आदेश को ‘मनमाना, अनुचित और भेदभावपूर्ण’ बताते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की चेतावनी दी है।याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्राप्त ‘आजीविका कमाने के अधिकार’ का उल्लंघन है।
महाराष्ट्र दिवस (1 मई) को भाषाई उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए, लेकिन इस वर्ष यह हजारों ड्राइवरों के लिए एक ‘तनावपूर्ण परीक्षा’ का दिन बनने जा रहा है। जहाँ एक ओर क्षेत्रीय भाषा का संरक्षण और सम्मान आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर ‘भाषा’ को रोजगार छीनने का हथियार बनाना एक आधुनिक लोकतंत्र के लिए बड़ी चुनौती है।
प्रशासन को चाहिए कि वह ‘कैंसिलेशन’ (Cancellation) के बजाय ‘ट्रेनिंग’ (Training) पर जोर दे। यदि सरकार ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा के निःशुल्क ब्रिज कोर्स शुरू करती है, तो यह ‘अस्मिता’ और ‘आजीविका’ के बीच के इस टकराव को एक रचनात्मक समाधान दे सकता है। फिलहाल, महाराष्ट्र की सड़कों पर तनाव साफ देखा जा सकता है।



