
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा देश भर में संचालित 32 फर्जी विश्वविद्यालयों की नई सूची जारी करना भारतीय शिक्षा जगत में एक गहरे संकट की ओर इशारा करता है। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि हजारों छात्रों के भविष्य, उनके माता-पिता की गाढ़ी कमाई और देश की उच्च शिक्षा की साख पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। पिछले दो वर्षों में इन संस्थानों की संख्या का 20 से बढ़कर 32 होना यह दर्शाता है कि शिक्षा के नाम पर चल रहा यह अवैध कारोबार कितनी तेजी से अपने पैर पसार रहा है।
भारत दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। लेकिन इसी विशालता की आड़ में ‘फर्जी डिग्री’ का एक समानांतर बाजार भी फल-फूल रहा है। यूजीसी की हालिया रिपोर्ट न केवल फर्जी संस्थानों का पर्दाफाश करती है, बल्कि हमारे नियामक तंत्र की सीमाओं को भी उजागर करती है।
यूजीसी के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के 12 राज्यों में 32 ऐसे संस्थान पाए गए हैं जो खुद को ‘विश्वविद्यालय’ कहते हैं लेकिन उनके पास डिग्री प्रदान करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। 2024 में यह संख्या 20 थी, जो 2026 तक आते-आते 32 हो गई है। यह 60% की वृद्धि दर्शाती है कि डिजिटल युग में इन संस्थानों के लिए छात्रों को फांसना और भी आसान हो गया है। पहले यह समस्या केवल कुछ राज्यों तक सीमित थी, लेकिन अब हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी ऐसे संस्थानों का उदय हुआ है। यह शिक्षा माफिया के विकेंद्रीकरण का प्रमाण है।
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि देश का शासन और नीति-निर्माण केंद्र, दिल्ली, इस सूची में शीर्ष पर है। दिल्ली में 12 फर्जी विश्वविद्यालय सक्रिय पाए गए हैं। ये संस्थान अक्सर ऐसे नामों का चुनाव करते हैं जो सरकारी या अंतरराष्ट्रीय निकायों जैसे लगते हैं। उदाहरण के लिए, ‘यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी’ या ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एंड फिजिकल हेल्थ साइंसेज’। ये नाम ग्रामीण या कम जागरूक छात्रों को यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त होते हैं कि संस्थान प्रतिष्ठित है। दिल्ली जैसे महानगर में भीड़भाड़ और व्यावसायिक इमारतों की अधिकता के कारण, ये संस्थान एक या दो कमरों से संचालित होते हैं और खुद को एक विशाल परिसर वाले विश्वविद्यालय के रूप में प्रचारित करते हैं।
भारतीय कानून के अनुसार, कोई भी संस्थान तब तक ‘विश्वविद्यालय’ शब्द का उपयोग नहीं कर सकता या डिग्री प्रदान नहीं कर सकता जब तक कि वह यूजीसी अधिनियम, 1956 की धारा 2(f) या धारा 3 के तहत स्थापित न हो। यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि ये 32 संस्थान न तो केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, न राज्य, और न ही डीम्ड। इसलिए, इनके द्वारा दी गई डिग्री केवल एक रद्दी कागज है। यूजीसी ने इस विशेष संस्थान के खिलाफ सार्वजनिक नोटिस जारी किया है। ऐसे संस्थान अक्सर ‘शांति’, ‘मानव अधिकार’ या ‘कौशल विकास’ जैसे शब्दों का उपयोग करके अपनी गतिविधियों को वैध दिखाने की कोशिश करते हैं।
फर्जी विश्वविद्यालयों का सबसे बुरा प्रभाव उन मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों पर पड़ता है जो अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जमीन गिरवी रखते हैं या ऋण लेते हैं। एक छात्र तीन या चार साल की कड़ी मेहनत के बाद जब नौकरी के लिए जाता है और उसे पता चलता है कि उसकी डिग्री अमान्य है, तो यह उसके करियर और मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक होता है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), एसएससी या किसी भी सरकारी भर्ती में डिग्री सत्यापन अनिवार्य है। फर्जी विश्वविद्यालय के छात्र स्थायी रूप से इन अवसरों से बाहर हो जाते हैं। पैसा तो वापस कमाया जा सकता है, लेकिन युवावस्था के वे कीमती साल कभी वापस नहीं आते जो इन संस्थानों की भेंट चढ़ जाते हैं।
ये संस्थान छात्रों को लुभाने के लिए आधुनिक मार्केटिंग तकनीकों का सहारा लेते हैं सोशल मीडिया और स्थानीय अखबारों में शत-प्रतिशत प्लेसमेंट और कम फीस के वादे। ‘एक साल में स्नातक’ जैसे लुभावने ऑफर देना, जो शैक्षिक मानकों के पूरी तरह खिलाफ है।ऐसी वेबसाइट्स बनाना जो दिखने में आधिकारिक और पेशेवर लगती हैं।
यूजीसी हर साल सूची जारी करता है, लेकिन सवाल यह है कि ये संस्थान वर्षों तक खुलेआम कैसे चलते रहते हैं? यूजीसी के पास इन संस्थानों को सीधे तौर पर सील करने या इनके मालिकों को गिरफ्तार करने की कार्यकारी शक्ति नहीं है। इसके लिए उन्हें राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर निर्भर रहना पड़ता है। चूंकि शिक्षा ‘समवर्ती सूची’ (Concurrent List) में है, इसलिए राज्यों को अपने स्तर पर एक ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ बनानी चाहिए जो इन संस्थानों को तत्काल बंद करे। ‘प्रवेश से पहले जांचें’ (Check before you enter) अभियान को व्यापक स्तर पर चलाने की जरूरत है।
शिक्षा कोई वस्तु नहीं है जिसे बाजार में फर्जी लेबल लगाकर बेचा जाए। 32 फर्जी विश्वविद्यालयों की यह सूची हमारे सिस्टम के छिद्रों को उजागर करती है। छात्रों को जागरूक होना होगा, अभिभावकों को सतर्क रहना होगा और सरकार को दंडात्मक होना होगा।
यूजीसी की यह कार्रवाई केवल एक प्रारंभिक चेतावनी है। जब तक इन संस्थानों के पीछे के मास्टरमाइंड जेल के पीछे नहीं होंगे, तब तक ‘शिक्षा के मंदिर’ के नाम पर यह धोखाधड़ी जारी रहेगी। हमें एक ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम बनाना होगा जहाँ छात्र एक क्लिक पर किसी भी कॉलेज की ‘वैधता आईडी’ देख सकें।



