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वैश्विक व्यापार का ‘महायुद्ध’: ट्रंप का 10% यूनिवर्सल टैरिफ और आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय

'सेक्शन 122' (Section 122): कानूनी ढाल का उपयोग

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सभी देशों से होने वाले आयात पर 10% का वैश्विक टैरिफ (Global Tariff) लगाने के कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करना, आधुनिक आर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी और साहसिक घटनाओं में से एक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके पिछले व्यापारिक आदेशों को रद्द किए जाने के मात्र कुछ ही घंटों के भीतर ओवल ऑफिस से की गई यह घोषणा न केवल ट्रंप के जुझारू तेवर को दर्शाती है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार की नींव को हिला देने वाला कदम है।

जब डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “ओवल ऑफिस से सभी देशों पर 10% का वैश्विक टैरिफ लगाना मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है,” तो उन्होंने केवल एक कर (Tax) नहीं लगाया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए युग की शुरुआत की। यह कदम अमेरिकी व्यापार नीति को ‘मुक्त व्यापार’ (Free Trade) से हटाकर ‘संरक्षणवाद’ (Protectionism) की ओर पूरी तरह धकेलने वाला है।

इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू इसकी टाइमिंग है। शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के पिछले उन आदेशों को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया था, जिनके तहत व्यापक आयात शुल्क लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि राष्ट्रपति के पास संसद (कांग्रेस) की अनुमति के बिना इतने बड़े पैमाने पर शुल्क लगाने की शक्ति नहीं है। आमतौर पर राष्ट्रपति अदालती फैसलों के बाद कानूनी परामर्श लेते हैं, लेकिन ट्रंप ने कुछ ही घंटों में एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर दिया। यह दर्शाता है कि वे अपनी आर्थिक नीतियों के मार्ग में किसी भी न्यायिक बाधा को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।

ट्रंप ने अपने नए आदेश को व्यापार अधिनियम (Trade Act) की धारा 122 के तहत लागू किया है। यह एक विशेष प्रावधान है जो राष्ट्रपति को कुछ असाधारण परिस्थितियों में शक्तियां देता है। धारा 122 राष्ट्रपति को अनुमति देती है कि यदि अमेरिका का व्यापार घाटा बहुत अधिक बढ़ जाए या राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में हो, तो वे 15% तक का शुल्क लगा सकते हैं। पिछले आदेशों में उपयोग की गई धाराओं के मुकाबले धारा 122 को अदालतों में चुनौती देना अधिक कठिन हो सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर अमेरिका की आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा से जुड़ी है।

ट्रंप का यह टैरिफ केवल चीन या मेक्सिको के लिए नहीं है; यह भारत, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और कनाडा सहित हर उस देश के लिए है जो अमेरिका को सामान निर्यात करता है। अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग चेतावनी दे रहा है कि यह 10% टैरिफ अंततः अमेरिकी जनता की जेब पर भारी पड़ेगा। जब बाहर से आने वाले सामान पर 10% टैक्स लगेगा, तो कंपनियां उस बढ़ी हुई लागत को कम नहीं करेंगी, बल्कि सामान की कीमत बढ़ा देंगी। इससे स्मार्टफोन, कपड़े, कार और इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे हो सकते हैं। ट्रंप का तर्क है कि इससे कंपनियां अमेरिका में कारखाने लगाने के लिए मजबूर होंगी, जिससे स्थानीय स्तर पर सामान सस्ता होगा।

ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का मूल आधार विनिर्माण क्षेत्र को वापस लाना है। विदेशी सामान पर 10% अतिरिक्त शुल्क लगने से अमेरिकी कंपनियों द्वारा बनाए गए उत्पाद बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। यदि कंपनियां विदेशों से माल मंगाने के बजाय अमेरिका में उत्पादन शुरू करती हैं, तो इससे लाखों नई ‘ब्लू-कॉलर’ नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जब इस तरह का कदम उठाती है, तो बाकी दुनिया चुप नहीं बैठती। यूरोपीय संघ और चीन पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वे अमेरिकी उत्पादों (जैसे बोइंग विमान, सोयाबीन और अमेरिकी कारें) पर जवाबी टैक्स लगाएंगे। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था अत्यंत परस्पर जुड़ी हुई है। एक कार के पुर्जे कई देशों से आते हैं। 10% का यह वैश्विक टैरिफ पूरी ‘ग्लोबल सप्लाई चेन’ को अस्त-व्यस्त कर सकता है।

यह निर्णय अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के साथ उसके रिश्तों को तनावपूर्ण बना सकता है। भारत अमेरिका का एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है। आईटी सेवाओं के अलावा, रत्न-आभूषण और फार्मास्यूटिकल्स पर इस टैरिफ का सीधा असर होगा। हालांकि यह टैरिफ सभी देशों के लिए है, लेकिन इसका सबसे बड़ा उद्देश्य चीन की आर्थिक ताकत को नियंत्रित करना है। ट्रंप का बयान “मैं और अधिक शुल्क ले सकता हूँ” सीधे तौर पर बीजिंग के लिए एक चेतावनी है।

बाजार के विश्लेषक इस समय दो धड़ों में बंटे हुए हैं। यदि अन्य देश जवाबी कार्रवाई करने के बजाय अमेरिका के साथ नए और बेहतर व्यापार समझौतों के लिए टेबल पर आते हैं, तो यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ‘स्वर्ण युग’ हो सकता है। यदि यह कदम एक अंतहीन वैश्विक व्यापार युद्ध में बदल जाता है, तो यह 1930 की ‘ग्रेट डिप्रेशन’ जैसी वैश्विक मंदी का कारण भी बन सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप का 10% वैश्विक टैरिफ लगाना केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था को बदलने का एक प्रयास है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद ओवल ऑफिस से इस पर हस्ताक्षर करना यह सिद्ध करता है कि ट्रंप 2026 में अमेरिका को एक ‘किलेनुमा अर्थव्यवस्था’ (Fortress Economy) में बदलने के लिए दृढ़ हैं।

दुनिया अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ ‘फ्री ट्रेड’ का पुराना ढांचा ढह रहा है और ‘इकोनॉमिक नेशनलिज्म’ का नया दौर शुरू हो रहा है। आने वाले महीनों में वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया और अमेरिकी अदालतों में इस नए आदेश की कानूनी लड़ाई यह तय करेगी कि अमेरिका और पूरी दुनिया की आर्थिक दिशा क्या होगी।

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