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एआई का उदय और मानवीय श्रम का विस्थापन: लिवस्पेस छंटनी का गहरा विश्लेषण

'इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026' और लिवस्पेस का मामला

बेंगलुरु स्थित होम डेकोर दिग्गज लिवस्पेस (Livspace) द्वारा अपने कार्यबल के 12 प्रतिशत, यानी लगभग 1,000 कर्मचारियों की छंटनी करने का निर्णय केवल एक कंपनी का आंतरिक पुनर्गठन नहीं है। यह भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक रोजगार बाजार के लिए एक ‘वॉटरशेड मोमेंट’ (Watershed Moment) है। वैश्विक निवेश फर्म केकेआर (KKR) द्वारा समर्थित यह स्टार्टअप अब ‘एआई-फर्स्ट’ (AI-first) दृष्टिकोण अपना रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि चौथी औद्योगिक क्रांति अब हमारे दरवाजों पर दस्तक दे चुकी है।

लिवस्पेस की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की क्षमता और इसके द्वारा नौकरियों के विस्थापन पर बहस तेज है। होम डेकोर और इंटीरियर डिजाइन जैसे रचनात्मक क्षेत्र में, जहाँ मानवीय कल्पना को सर्वोपरि माना जाता था, वहाँ मशीनों का हस्तक्षेप एक नई वास्तविकता पेश कर रहा है।

लिवस्पेस ने अपने कुल 8,000 से अधिक कर्मचारियों में से 1,000 को बाहर का रास्ता दिखाया है। केकेआर जैसे वैश्विक निवेशकों का दबाव अक्सर लाभप्रदता (Profitability) पर होता है। कंपनी का मानना है कि एआई का उपयोग करके वे कम लागत में अधिक आउटपुट प्राप्त कर सकते हैं। कंपनी अब एक ऐसी संरचना की ओर बढ़ रही है जहाँ डिजाइनिंग प्रक्रिया, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और ग्राहक इंटरैक्शन का एक बड़ा हिस्सा स्वचालित (Automated) होगा।

इस बड़े उथल-पुथल के बीच, कंपनी के मुख्य व्यवसाय अधिकारी (CBO) और सह-संस्थापक सौरभ जैन का बाहर निकलना सबसे चौंकाने वाली खबर है। जैन ने 2015 में अपने स्टार्टअप ‘DezignUp’ के अधिग्रहण के बाद लिवस्पेस की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका जाना यह दर्शाता है कि जब कंपनियां एआई-संचालित मॉडल की ओर बढ़ती हैं, तो न केवल निचले स्तर के कर्मचारी बल्कि शीर्ष नेतृत्व भी ‘रणनीतिक बदलाव’ की भेंट चढ़ सकता है। एक अनुभवी संस्थापक का जाना कंपनी की कार्यसंस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहाँ अब ‘क्रिएटिव लीडरशिप’ से अधिक ‘एल्गोरिदम-बेस्ड डिसीजन मेकिंग’ को प्राथमिकता दी जाएगी।

दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ में लिवस्पेस की इस छंटनी को एक केस स्टडी के रूप में देखा जा रहा है। समिट में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है कि यदि हर स्टार्टअप ‘एआई-फर्स्ट’ अप्रोच अपनाता है, तो भारत की विशाल युवा आबादी के लिए रोजगार के अवसर कहाँ बचेंगे? समिट में भाग ले रहे विशेषज्ञों का कहना है कि लिवस्पेस जैसी कंपनियां केवल शुरुआत हैं। एआई की उत्पादकता में भारी वृद्धि के कारण, आने वाले समय में विनिर्माण, डिजाइनिंग और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में और अधिक छंटनी देखी जा सकती है।

होम डेकोर में एआई केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि एक ‘वर्चुअल डिजाइनर’ की भूमिका निभा रहा है। अब ग्राहक की पसंद, कमरे के आकार और बजट के आधार पर एआई सेकंडों में हजारों 3D रेंडर तैयार कर सकता है। इसके लिए पहले दर्जनों डिजाइनरों और तकनीकी ड्राफ्ट्समैन की आवश्यकता होती थी। एआई अब बेहतर तरीके से पूर्वानुमान लगा सकता है कि किस सामान की जरूरत कब होगी, जिससे इन्वेंट्री की लागत कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, इन विभागों में काम करने वाले मानव श्रम की आवश्यकता कम हो गई है।

1,000 कर्मचारियों की छंटनी का अर्थ है 1,000 परिवारों की आजीविका पर संकट। लिवस्पेस की घटना यह दिखाती है कि ‘स्किल गैप’ (Skill Gap) अब एक हकीकत है। जो कर्मचारी एआई उपकरणों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए, वे अप्रासंगिक हो गए। स्टार्टअप सेक्टर में काम करने वाले युवाओं के बीच अब यह डर घर कर गया है कि उनकी वर्षों की मेहनत को एक एल्गोरिदम द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

हालांकि लिवस्पेस ने छंटनी की है, लेकिन कंपनी का तर्क है कि वे एआई क्षेत्र में नए विशेषज्ञों की भर्ती करेंगे। डेटा साइंटिस्ट, एआई प्रॉम्प्ट इंजीनियर और मशीन लर्निंग विशेषज्ञों की मांग बढ़ेगी। लेकिन चुनौती यह है कि क्या वे 1,000 लोग, जिन्हें निकाला गया है, इन नई भूमिकाओं के लिए तैयार हैं? सरकार और कॉर्पोरेट्स को अब ‘एआई ट्रांजिशन फंड’ बनाना चाहिए जो विस्थापित कर्मचारियों को नई तकनीक सीखने में मदद करे।

लिवस्पेस की छंटनी भारतीय स्टार्टअप्स के लिए एक ‘अलार्म’ है। एआई कोई भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। सौरभ जैन का जाना और 12% कर्मचारियों की छुट्टी यह संदेश देती है कि मशीनों के इस युग में केवल वही टिकेंगे जो अपनी रचनात्मकता को तकनीक के साथ जोड़ने में सक्षम होंगे।

सरकार को ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ जैसे मंचों के माध्यम से ऐसे नियम बनाने चाहिए जो कंपनियों को एआई अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन साथ ही कर्मचारियों के हितों की रक्षा भी करें।  एआई को इंसान का ‘प्रतिस्थापन’ (Replacement) नहीं, बल्कि उसका ‘सहयोगी’ (Augmentation) बनना चाहिए। लिवस्पेस की यह कहानी 2026 के भारत की एक ऐसी तस्वीर है जहाँ विकास की गति तेज है, लेकिन इसकी मानवीय कीमत भी ऊँची है।

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