
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) द्वारा ‘क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द Blind इन इंडिया’ (CABI) के लिए एक व्यापक समर्थन ढांचे की घोषणा करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारतीय खेल संस्कृति में एक गहरे बदलाव का प्रतीक है। यह कदम उस समय आया है जब भारत वैश्विक स्तर पर खेलों में समावेशिता (Inclusivity) और विविधता का नेतृत्व करने की आकांक्षा रखता है।दृष्टिबाधित क्रिकेटरों के लिए बुनियादी ढांचे, वित्तीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर के द्वार खोलकर, बीसीसीआई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्रिकेट का जुनून और उसका सम्मान किसी शारीरिक बाधा का मोहताज नहीं है।
जब हम क्रिकेट की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी आँखों के सामने स्टेडियम की रोशनी, खिलाड़ियों की फुर्ती और बाउंड्री की चमक होती है। लेकिन भारतीय क्रिकेट का एक हिस्सा ऐसा भी है जो ‘सुनकर’ खेला जाता है, जहाँ गेंद की आहट और साथियों की आवाज़ ही एकमात्र मार्गदर्शक होती है। भारत की दृष्टिबाधित क्रिकेट टीम ने पिछले दशक में वह कर दिखाया है जो दुनिया की बड़ी-बड़ी टीमें नहीं कर पाईं लगातार विश्व कप जीतना और वैश्विक रैंकिंग में अपना वर्चस्व बनाए रखना। बीसीसीआई का हालिया समर्थन इसी अटूट हौसले को मिला एक आधिकारिक सलाम है।
भारत की दृष्टिबाधित पुरुष और महिला टीमों ने पिछले दस वर्षों में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। भारतीय पुरुष टीम ने टी20 और वनडे विश्व कप में कई बार जीत हासिल की है, अक्सर फाइनल में प्रतिद्वंद्वी टीमों को बड़े अंतर से हराया है। अब तक CABI (Cricket Association for the Blind in India) मुख्य रूप से दान, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और निजी प्रायोजकों पर निर्भर था। इसके बावजूद, खिलाड़ियों ने कभी अपनी तैयारियों में कमी नहीं आने दी। बीसीसीआई दुनिया का सबसे शक्तिशाली क्रिकेट बोर्ड है। इसकी मान्यता मिलने का मतलब है कि अब दृष्टिबाधित क्रिकेट को ‘पैरा-स्पोर्ट’ के बजाय ‘मुख्यधारा के क्रिकेट’ के विस्तार के रूप में देखा जाएगा।
दृष्टिबाधित क्रिकेट के लिए सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण अभ्यास मैदानों और सुविधाओं की कमी रही है। बीसीसीआई के समर्थन का अर्थ है कि अब दृष्टिबाधित क्रिकेटर राज्य क्रिकेट संघों के स्टेडियमों और प्रशिक्षण सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगे। उन्हें अब टूटे-फूटे मैदानों पर अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं होगी। दृष्टिबाधित क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली गेंद (जो आवाज़ करती है) और विशेष उपकरणों के अनुसंधान और विकास में अब बीसीसीआई की तकनीकी टीम मदद कर सकेगी। फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक पेशेवर टीम अब इन खिलाड़ियों के साथ काम करेगी, जिससे उनकी परफॉरमेंस में सुधार होगा।
खेल को करियर के रूप में अपनाने के लिए वित्तीय स्थिरता अनिवार्य है। बीसीसीआई की इस पहल से उम्मीद जगी है कि भविष्य में दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के लिए भी ‘सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट’ (केंद्रीय अनुबंध) पेश किए जाएंगे। इससे खिलाड़ियों को मासिक वेतन मिलेगा और वे बिना किसी आर्थिक चिंता के अपने खेल पर ध्यान दे सकेंगे। घरेलू टूर्नामेंटों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों की मैच फीस में वृद्धि से ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट जीतने पर मिलने वाली पुरस्कार राशि अब मुख्यधारा के क्रिकेट के बराबर होने की संभावना है, साथ ही खिलाड़ियों को व्यापक चिकित्सा और दुर्घटना बीमा कवर भी मिलेगा।
बीसीसीआई ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि समर्थन ढांचा महिला टीम के लिए भी समान होगा। दृष्टिबाधित महिलाओं के लिए क्रिकेट खेलना न केवल एक खेल है, बल्कि समाज में अपनी पहचान बनाने का एक सशक्त माध्यम है। बीसीसीआई का समर्थन उन्हें वह मंच देगा जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी। स्कूल और कॉलेज स्तर पर लड़कियों के लिए विशेष क्रिकेट अकादमियों की स्थापना से भविष्य के लिए एक मजबूत ‘बेंच स्ट्रेंथ’ तैयार होगी।
बीसीसीआई का यह कदम खेल के मैदान से बाहर भी एक बड़ा संदेश देता है। जब देश का सबसे बड़ा खेल निकाय दिव्यांग खिलाड़ियों के साथ खड़ा होता है, तो यह समाज में दिव्यांगों के प्रति ‘सहानुभूति’ को ‘सम्मान’ में बदल देता है। बीसीसीआई के इस कदम के बाद अब एडिडास, प्यूमा या नाइकी जैसे बड़े ब्रांड्स और टाटा या रिलायंस जैसे कॉर्पोरेट घराने दृष्टिबाधित क्रिकेटरों को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाने और निवेश करने के लिए आगे आएंगे। यह पहल साबित करती है कि क्रिकेट वास्तव में भारत का ‘धर्म’ है, जहाँ हर किसी को चाहे उसकी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो बल्ले और गेंद के साथ अपने सपने जीने का हक है।
समर्थन की घोषणा एक शुरुआत है, लेकिन कार्यान्वयन (Implementation) असली चुनौती है। बीसीसीआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य स्तर के क्रिकेट संघ (State Associations) भी अपने-अपने राज्यों में दृष्टिबाधित क्रिकेट को उसी तत्परता से बढ़ावा दें।केवल आईसीसी या विश्व कप के आयोजनों पर निर्भर रहने के बजाय, बीसीसीआई को अन्य देशों के बोर्डों के साथ मिलकर नियमित द्विपक्षीय (Bilateral) श्रृंखलाएं आयोजित करनी चाहिए।
बीसीसीआई द्वारा CABI को दिया गया यह समर्थन केवल एक वित्तीय अनुदान नहीं है, बल्कि यह उन खिलाड़ियों के प्रति ‘आभार’ व्यक्त करने का तरीका है जिन्होंने बिना रोशनी के भी भारत के लिए स्वर्ण पदक जीते हैं। यह पहल क्रिकेट के मैदान पर ‘इक्विटी’ (Equity) लाने का एक सफल प्रयास है।
आने वाले वर्षों में, हम देखेंगे कि भारतीय दृष्टिबाधित क्रिकेटर न केवल मैदान पर चौके-छक्के लगाएंगे, बल्कि वे सफलता की वह कहानी लिखेंगे जो हर उस व्यक्ति को प्रेरित करेगी जो किसी न किसी कमी के कारण हार मान लेता है। बीसीसीआई ने आज यह साबित कर दिया है कि क्रिकेट केवल ‘देखने’ का खेल नहीं है, यह ‘महसूस’ करने और ‘जीने’ का खेल है। अब भारत का दृष्टिबाधित क्रिकेट केवल रिकॉर्ड नहीं तोड़ेगा, बल्कि वह दुनिया को यह भी सिखाएगा कि असली रोशनी आँखों में नहीं, बल्कि इरादों में होती है।



