
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा राजस्थान की मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) पूरा करना और लगभग 2.5 लाख अपात्र नामों को हटाना भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। यह केवल एक प्रशासनिक डेटा अपडेट नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Elections) सुनिश्चित करने के लिए किया गया एक बड़ा ‘शुद्धिकरण अभियान’ है। अक्टूबर 2025 की पिछली सूची के बाद से अब तक 2,42,760 नामों का विलोपन यह दर्शाता है कि चुनावी मशीनरी तकनीक और जमीनी सत्यापन के माध्यम से कितनी गहराई से कार्य कर रही है।
एक जीवंत लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी चुनावी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। चुनावी प्रक्रिया की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ‘मतदाता सूची’ होती है। यदि आधार ही त्रुटिपूर्ण हो, तो उस पर निर्मित जनादेश की इमारत कभी भी निष्पक्ष नहीं हो सकती। राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुआ पुनरीक्षण अभ्यास इसी आधार को दोषमुक्त करने का एक सफल प्रयास है।
आमतौर पर निर्वाचन आयोग प्रतिवर्ष मतदाता सूची का संक्षिप्त पुनरीक्षण करता है, लेकिन ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) एक अधिक व्यापक और सूक्ष्म प्रक्रिया है। समय के साथ मतदाता सूची में उन लोगों के नाम बने रहते हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। यदि इन नामों को हटाया न जाए, तो चुनाव के दिन फर्जी मतदान (Impersonation) की संभावना बढ़ जाती है। शहरीकरण और रोजगार की तलाश में लोग एक शहर से दूसरे शहर या राज्य चले जाते हैं। अक्सर वे नए स्थान पर अपना नाम दर्ज करा लेते हैं लेकिन पुराने स्थान से कटवाना भूल जाते हैं। SIR के माध्यम से ऐसे दोहरे पंजीकरणों को चिन्हित किया गया। कई बार तकनीकी त्रुटि या जानबूझकर एक ही व्यक्ति का नाम दो अलग-अलग मतदान केंद्रों पर दर्ज हो जाता है। राजस्थान में हटाए गए 2.42 लाख नामों में एक बड़ा हिस्सा इन्ही प्रविष्टियों का था।
27 अक्टूबर 2025 के बाद से अब तक का यह डेटा सुधार अभियान यह सुनिश्चित करता है कि आगामी चुनावों में एक भी अवैध वोट न पड़े। नामों के विलोपन से यह सुनिश्चित होता है कि केवल वे ही लोग मतदान करेंगे जो वास्तव में उस निर्वाचन क्षेत्र के निवासी हैं और पात्र हैं। मतदाता सूची जितनी सटीक होगी, चुनाव सामग्री (EVM, वोटर स्लिप, स्टेशनरी) का प्रबंधन उतना ही सटीक होगा। इससे सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ कम होता है। इस अभियान की सफलता का श्रेय बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) को जाता है जिन्होंने घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया।
2026 के इस दौर में निर्वाचन आयोग ने नामों को फिल्टर करने के लिए उन्नत तकनीकों का सहारा लिया है। आयोग ने ऐसे सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया जो समान फोटो, नाम और पिता के नाम वाली प्रविष्टियों को ही फ्लैग कर देता है। मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) को आधार से जोड़ने के स्वैच्छिक अभियान ने शुद्धिकरण प्रक्रिया को काफी सरल बना दिया है। इससे एक ही व्यक्ति के कई राज्यों या निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत होने की संभावना लगभग समाप्त हो गई है।
सटीक मतदाता सूची का सीधा प्रभाव चुनावी रणनीति पर पड़ता है। जब उम्मीदवार को पता होता है कि सूची में कोई फर्जी नाम नहीं है, तो वह अपनी ऊर्जा और संसाधन वास्तविक मतदाताओं तक पहुँचने में लगाता है। मतदान के दिन अक्सर ‘फर्जी वोटिंग’ को लेकर पोलिंग बूथों पर तनाव होता है। एक साफ-सुथरी सूची ऐसे विवादों को जड़ से खत्म कर देती है। तकनीकी रूप से, जब मृत या अनुपस्थित मतदाताओं के नाम सूची से हट जाते हैं, तो वास्तविक मतदान प्रतिशत (Voter Turnout Percentage) बढ़ जाता है, जो लोकतंत्र की एक स्वस्थ तस्वीर पेश करता है।
शुद्धिकरण की प्रक्रिया सतत होनी चाहिए। राजस्थान में 2.42 लाख नामों को हटाना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं जहाँ अपात्रों को हटाना जरूरी है, वहीं 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं का नाम जोड़ना भी उतना ही अनिवार्य है। आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘समावेशिता’ (Inclusivity) बनी रहे। ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाताओं को अपनी प्रविष्टि की स्वयं जांच करने के लिए जागरूक करना होगा। ‘वोटर हेल्पलाइन ऐप’ और ‘NVSP पोर्टल’ का उपयोग इसमें गेम-चेंजर साबित हो सकता है।कभी-कभी जल्दबाजी में पात्र मतदाताओं के नाम भी हट सकते हैं। इसके लिए एक मजबूत ‘शिकायत निवारण तंत्र’ (Grievance Redressal) का होना आवश्यक है।
राजस्थान की मतदाता सूची का यह संशोधन केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह निर्वाचन आयोग की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है जहाँ “कोई भी मतदाता पीछे न छूटे” और “कोई भी फर्जी मतदाता न रहे”। 2,42,760 नामों को हटाकर आयोग ने लोकतंत्र के उस ‘प्रवेश द्वार’ को साफ किया है जहाँ से जनता अपना भाग्य विधाता चुनती है।
यह कदम राजस्थान के आगामी चुनावों के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय नींव तैयार करता है। नागरिकों के रूप में हमारा यह कर्तव्य है कि हम भी इस प्रक्रिया में सक्रिय रहें और यह सुनिश्चित करें कि हमारा और हमारे समाज का वोट केवल सही और सटीक रिकॉर्ड पर ही दर्ज हो। लोकतंत्र की शुचिता को बनाए रखना केवल आयोग की नहीं, बल्कि हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।



