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मौत की उड़ान: चतरा एयर एम्बुलेंस हादसा और भारतीय विमानन सुरक्षा का संकट

तकनीकी विश्लेषण: रडार से गायब होने के पीछे के संभावित कारण

झारखंड के चतरा जिले में सोमवार रात हुई एयर एम्बुलेंस दुर्घटना भारतीय विमानन और चिकित्सा आपातकालीन सेवाओं के इतिहास में एक काला अध्याय बन गई है। रांची से दिल्ली जा रहा यह विमान, जो एक गंभीर रूप से झुलसे हुए मरीज की जान बचाने की अंतिम उम्मीद था, स्वयं मौत का पैगाम बन गया। इस हादसे में विमान में सवार सभी सात लोगों की मौत ने न केवल सात परिवारों को तबाह किया है, बल्कि भारत में ‘मेडिकल इवैक्युएशन’ (Medevac) की सुरक्षा और मानकों पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

जब भी कोई एयर एम्बुलेंस उड़ान भरती है, तो वह समय के खिलाफ एक दौड़ होती है। लेकिन सोमवार शाम, वक्त और तकनीक दोनों ने दगा दे दिया। चतरा के सिमरिया इलाके के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच जो मलबा बिखरा मिला, वह केवल एल्युमीनियम और लोहे का ढेर नहीं था, बल्कि वह उन सात जिंदगियों का अंत था जो दूसरों की जान बचाने या अपनी जान बचाने के संघर्ष में जुटी थीं।

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, यह उड़ान किसी भी अन्य सामान्य मेडिकल फ्लाइट की तरह शुरू हुई थी। विमान ने रांची के बिरसा मुंडा हवाई अड्डे से शाम 7:11 बजे टेक-ऑफ किया। 41 वर्षीय संजय कुमार, जो एक गंभीर अग्नि दुर्घटना (Burn Case) के शिकार थे, उन्हें उन्नत चिकित्सा उपचार के लिए दिल्ली के सफदरजंग या एम्स जैसे बड़े अस्पताल में स्थानांतरित किया जा रहा था। टेक-ऑफ के मात्र 23 मिनट बाद, शाम 7:34 बजे, जब विमान वाराणसी से लगभग 100 समुद्री मील दक्षिण-पूर्व में था, इसका कोलकाता एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) और रडार से संपर्क पूरी तरह टूट गया।

शाम के धुंधलके और झारखंड के दुर्गम भूगोल के बीच, रडार से गायब होने का मतलब था कि विमान किसी बड़ी आपदा का शिकार हो चुका था। चतरा के स्थानीय ग्रामीणों ने एक तेज धमाके की आवाज सुनी, जिसके बाद पुलिस और प्रशासन ने रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया।

इस हादसे की सूचना मिलने के बाद शुरुआती घंटों में काफी भ्रम की स्थिति बनी रही। शुरुआती खबरों में केवल एक व्यक्ति (मरीज संजय कुमार) की मौत की पुष्टि की गई थी। चतरा की उपायुक्त कीर्तिश्री जी ने रात के समय पुष्टि की कि राहत कार्य के दौरान विमान के मलबे से सात शव बरामद किए गए हैं। इनमें मरीज, उनके तीमारदार, डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और दो पायलट शामिल थे। चतरा का सिमरिया इलाका अपने घने जंगलों के लिए जाना जाता है। रात के अंधेरे में मलबे तक पहुँचना और शवों को निकालना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ।

विमानन विशेषज्ञों के अनुसार, रडार से अचानक गायब होना और पायलट द्वारा ‘मेडे’ (Mayday) कॉल न कर पाना तीन प्रमुख स्थितियों की ओर इशारा करता है यदि दोनों इंजनों ने एक साथ काम करना बंद कर दिया हो (ईंधन की कमी या दूषित ईंधन के कारण)। विमान के ढांचे में अचानक कोई दरार या तकनीकी खराबी जिससे विमान हवा में ही अनियंत्रित हो गया। चतरा की पहाड़ियों के ऊपर ‘डाउनड्राफ्ट’ या अचानक मौसम खराब होने से पायलट ‘स्पेशल डिसोरिएंटेशन’ का शिकार हो सकता है।

यह हादसा भारत में निजी चार्टर और एयर एम्बुलेंस सेवाओं की स्थिति को उजागर करता है। भारत में कई निजी कंपनियां 20-30 साल पुराने विमानों (जैसे बीचक्राफ्ट या सी-90) का उपयोग एयर एम्बुलेंस के रूप में करती हैं। क्या इन विमानों का समय-समय पर ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ होता है? अक्सर सामान्य विमानों को एयर एम्बुलेंस में बदला जाता है। ऑक्सीजन सिलेंडर और भारी चिकित्सा उपकरणों का वजन विमान के ‘सेंटर ऑफ ग्रेविटी’ को प्रभावित कर सकता है, जो उड़ान के दौरान जोखिम बढ़ाता है। मेडिकल इवैक्युएशन अक्सर आपातकालीन और रात के समय होते हैं। क्या पायलटों के ‘फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट’ (FDTL) नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है?

अब पूरी जिम्मेदारी ‘विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो’ (AAIB) पर है। उन्हें निम्नलिखित सवालों के जवाब खोजने होंगे कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) से अंतिम 23 मिनट की बातचीत और तकनीकी स्थिति का पता चलेगा। क्या विमान का ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ वैध था? अंतिम बार इसका मेंटेनेंस कब हुआ था? रडार संपर्क टूटने से ठीक पहले पायलट की आवाज में क्या कोई घबराहट थी?

संजय कुमार के परिवार ने उन्हें बचाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर एयर एम्बुलेंस बुक की थी। यह हादसा उस भरोसे पर चोट है जो लोग आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों पर करते हैं। मरीज के साथ-साथ चिकित्सा दल का जाना भी एक बड़ी क्षति है। ये वे पेशेवर थे जो दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते थे। क्या इन चार्टर उड़ानों में यात्रियों और चिकित्सा कर्मचारियों का पर्याप्त बीमा होता है?

चतरा विमान हादसा एक सांख्यिकीय आंकड़ा मात्र नहीं है। यह भारतीय नागरिक उड्डयन के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। हमें केवल बड़े हवाई अड्डों और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उन ‘जीवन रक्षक’ उड़ानों को भी सुरक्षित बनाना होगा जो छोटे शहरों से मरीजों को लेकर उड़ती हैं।

जब तक हम एयर एम्बुलेंस के लिए कठोर मानक (Stringent Standards), नए विमानों का अनिवार्य उपयोग और नियमित सुरक्षा ऑडिट सुनिश्चित नहीं करते, तब तक ‘मेडिकल इवैक्युएशन’ एक जुआ बना रहेगा। संजय कुमार और उनके साथ जान गंवाने वाले सात लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिलेगी जब इस जांच के निष्कर्षों से भविष्य की उड़ानों को सुरक्षित बनाया जाए।

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