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सभ्य शहरी जीवन और सार्वजनिक गरिमा: बिहार की नई मांस-मछली विनियमन नीति का विस्तृत विश्लेषण

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: क्या दृश्य वातावरण बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करता है?

बिहार सरकार का शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक क्षेत्रों के पास मांस और मछली की ‘खुली बिक्री’ पर रोक लगाने का हालिया नीतिगत निर्णय, शहरी नियोजन और सामाजिक मनोविज्ञान के संगम पर खड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। उपमुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा घोषित यह निर्देश महज एक प्रतिबंध नहीं, बल्कि राज्य में शहरी व्यवस्था को पुनर्गठित करने की एक सोची-समझी कोशिश है।

जब हम किसी आधुनिक शहर की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में स्वच्छता, सुव्यवस्थित बाज़ार, सुरक्षित शैक्षणिक परिसर और शांतिपूर्ण धार्मिक स्थल होते हैं। बिहार सरकार का यह कदम इसी ‘परिकल्पना’ को साकार करने की एक दिशा है। अक्सर यह देखा गया है कि शहरों में सड़कों के किनारे, खुले में मांस और मछली की बिक्री न केवल अस्वास्थ्यकर होती है, बल्कि यह सार्वजनिक स्थानों की सौंदर्यपरकता और गरिमा को भी प्रभावित करती है। इस नीति को समझने के लिए हमें इसके स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और प्रशासनिक इन चारों आयामों का गहराई से विश्लेषण करना होगा।

इस नीति का सबसे अनूठा और चर्चित तर्क “बच्चों के व्यवहार में हिंसा की प्रवृत्ति” है। उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने उल्लेख किया है कि शैक्षणिक संस्थानों के पास मांस की खुली बिक्री और जानवरों के अवशेषों का दृश्य बच्चों के कोमल मन पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से, वातावरण का बच्चों की संज्ञानात्मक प्रक्रिया (Cognitive Process) पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई बच्चा रोजाना स्कूल जाते समय ऐसे दृश्य देखता है जहाँ जानवरों को काटा जा रहा हो या उनका मांस खुले में रखा हो, तो यह ‘डिसेन्सिटाइजेशन’ (Desensitization) की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है। सरकार का यह तर्क ‘ब्रेकन विंडोज थ्योरी’ (Broken Windows Theory) के समान है, जो यह बताती है कि यदि किसी स्थान का वातावरण अव्यवस्थित और हिंसक होता है, तो वहां रहने वाले या वहां से गुजरने वाले व्यक्तियों में भी नकारात्मक व्यवहार विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। हालाँकि, यह तर्क बहस का विषय हो सकता है, लेकिन सरकार का यह प्रयास बच्चों को एक ‘सौम्य और सुरक्षित’ दृश्य वातावरण (Visual Environment) प्रदान करने का है, जो शैक्षणिक माहौल के लिए अनुकूल माना जा सकता है।

अक्सर मांस और मछली की खुली बिक्री के कारण जो सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न होती है, वह है स्वच्छता की कमी। खुले में मांस रखने से खुले वातावरण में धूल, मक्खियों और अन्य कीड़ों के बैठने से मांस दूषित हो जाता है, जिससे हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलने का खतरा रहता है।  इन दुकानों से निकलने वाला कचरा, हड्डियां और अवशेष नालियों में डाल दिए जाते हैं, जो दुर्गंध पैदा करते हैं और नालियों को जाम कर देते हैं। खुली मांस की दुकानें आवारा कुत्तों और जानवरों को आकर्षित करती हैं, जो अक्सर भीड़भाड़ वाले इलाकों में दुर्घटनाओं और भय का कारण बनते हैं।

नगर विकास एवं आवास विभाग (UDHD) द्वारा लिया गया यह निर्णय एक ‘स्वच्छ बिहार’ के निर्माण की दिशा में आवश्यक है। व्यवस्थित बाज़ार और वेंडिंग जोन बनाकर सरकार न केवल स्वास्थ्य मानकों को सुधार सकती है, बल्कि शहर की सड़कों को अधिक चलने योग्य (Pedestrian-friendly) भी बना सकती है।

भारत में धार्मिक स्थल केवल प्रार्थना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे सामुदायिक मिलन के स्थल भी हैं। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ सामाजिक सद्भाव (Social Harmony) की बहुत पुरानी और गौरवशाली परंपरा रही है, वहां धार्मिक स्थानों के पास किसी ऐसी चीज की बिक्री करना जो एक बड़े वर्ग की भावनाओं को आहत कर सकती हो, तनाव का कारण बन सकती है।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध ‘भोजन’ पर नहीं, बल्कि उसकी ‘बिक्री के तरीके’ पर है। धार्मिक स्थलों के पास मांस की खुली बिक्री को रोकना एक ‘स्पेस मैनेजमेंट’ (Space Management) का मुद्दा है। सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करना, जो सामुदायिक संवेदनाओं को प्रभावित करती हैं, एक जिम्मेदार प्रशासन का कार्य है। यह निर्णय किसी के खान-पान के अधिकार को छीनने के बजाय, सार्वजनिक स्थानों के ‘चरित्र’ को निर्धारित करने के लिए लिया गया है।

यह नीति कोई मनमाना फरमान नहीं है। विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय ‘जनकल्याण संवाद’ के दौरान बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और आम नागरिकों से प्राप्त फीडबैक के बाद लिया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार ‘सहभागी शासन’ (Participatory Governance) में विश्वास रखती है।

जब नीति-निर्माण प्रक्रिया में समाज का प्रबुद्ध वर्ग शामिल होता है, तो उसका कार्यान्वयन अधिक प्रभावी होता है। बुद्धिजीवियों ने संभवतः उन समस्याओं को रेखांकित किया होगा जिन्हें आम तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है जैसे कि स्कूल के बच्चों पर प्रभाव या धार्मिक स्थानों की पवित्रता। यह नीति बिहार में ‘लोकतांत्रिक संवाद’ के माध्यम से समस्याओं के समाधान खोजने का एक बेहतरीन उदाहरण है।

हालाँकि, इस नीति का उद्देश्य नेक है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में चुनौतियां निश्चित रूप से आएंगी। मांस और मछली के व्यापार में हजारों परिवार जुड़े हुए हैं, जो आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में दुकानें बंद करने के साथ-साथ, उन विक्रेताओं के लिए ‘वेंडिंग जोन’ (Vending Zones) का निर्माण किया जाए। उन्हें ऐसे स्थानों पर शिफ्ट करना होगा जहाँ बिजली, पानी, कोल्ड स्टोरेज और अपशिष्ट निपटान की आधुनिक सुविधाएं हों।

इस नीति के माध्यम से सरकार को असंगठित मांस उद्योग को ‘संगठित’ करने का अवसर मिलना चाहिए। यदि सरकार इन विक्रेताओं को लाइसेंसिंग, स्वच्छता मानकों और कोल्ड चेन प्रबंधन के साथ जोड़ती है, तो यह उनके व्यापार के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा। इसे केवल ‘प्रतिबंध’ (Ban) के रूप में नहीं, बल्कि ‘विनियमन’ (Regulation) के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को यह संदेश देना होगा कि उसका उद्देश्य किसी को बेरोजगार करना नहीं है, बल्कि शहरी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है।

बिहार सरकार का यह निर्णय संतुलन का एक कड़ा परीक्षण है। एक ओर ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का तर्क है और दूसरी ओर ‘सार्वजनिक व्यवस्था और स्वच्छता’ की आवश्यकता। लोकतांत्रिक समाज में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तब तक ही असीमित होती है जब तक वह सार्वजनिक हित के साथ न टकराए। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता, बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और धार्मिक स्थलों की शांति ये सभी ‘सार्वजनिक हित’ के बड़े घटक हैं।

आगे की राह यह है प्रशासन को दुकानों को जबरन बंद करने के बजाय, उन्हें नई जगहों पर स्थानांतरित करने के लिए एक निश्चित समय सीमा और रियायतें देनी चाहिए। दुकानदारों को स्वच्छता के लाभ और नई नीति के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। वेंडिंग जोन में मांस की बिक्री को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना चाहिए ताकि गुणवत्ता और मूल्य पर नियंत्रण बना रहे।

बिहार सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय उस दिशा में है जहाँ सरकारें केवल कानून नहीं बनातीं, बल्कि वे शहरों के ‘सामाजिक ताने-बाने’ (Social Fabric) को सुधारने की भी कोशिश करती हैं। एक शहर तभी आधुनिक कहला सकता है जब उसकी सड़कें स्वच्छ हों, उसके स्कूल का वातावरण शांत हो और उसके धार्मिक स्थल गरिमापूर्ण हों।

यदि मांस और मछली की बिक्री को व्यवस्थित बाज़ारों में समेट लिया जाता है, तो यह विक्रेताओं के लिए भी बेहतर होगा, क्योंकि उन्हें एक स्थायी और सुरक्षित जगह मिलेगी। यह नीति ‘बिहार के शहरी कायाकल्प’ का एक हिस्सा बन सकती है, बशर्ते इसे संवेदना और व्यावहारिकता के साथ लागू किया जाए। यह नीति न केवल बिहार के लिए, बल्कि भारत के अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है, जहाँ शहरी विकास और सामाजिक अनुशासन साथ-साथ चलते हैं।

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