सत्ता, भ्रष्टाचार और कानून का शिकंजा: विधायक चंद्रू लामानी की गिरफ्तारी
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई

कर्नाटक की राजनीति में भ्रष्टाचार और ‘कमीशन’ के आरोपों का इतिहास पुराना है, लेकिन शिराहट्टी विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक डॉ. चंद्रू लामानी की गिरफ्तारी ने इस मुद्दे को एक नए और शर्मनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। लोकायुक्त पुलिस द्वारा 5 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए ‘रंगे हाथों’ की गई यह कार्रवाई केवल एक विधायक के पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक तंत्र की उन दरारों को उजागर करती है जहाँ सार्वजनिक सेवा का चोला पहनकर सत्ता का दुरुपयोग निजी तिजोरी भरने के लिए किया जाता है।
जब एक चुना हुआ प्रतिनिधि, जिसे जनता ने अपने विकास और सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी हो, भ्रष्टाचार के आरोपों में सलाखों के पीछे जाता है, तो यह लोकतंत्र की शुचिता पर एक गहरा आघात होता है। डॉ. चंद्रू लामानी का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वे एक शिक्षित पेशेवर (डॉक्टर) हैं और सार्वजनिक जीवन में उनसे उच्च नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती थी।
21 फरवरी 2026 की शाम कर्नाटक की राजनीति के लिए एक बड़े झटके के साथ आई। लोकायुक्त पुलिस ने एक पुख्ता सूचना के आधार पर गदग जिले के लक्ष्मेश्वर में स्थित विधायक के निजी ‘बालाजी अस्पताल’ पर छापेमारी की। शिकायतकर्ता विजय पूजर, जो एक पेशेवर ठेकेदार हैं, उन्हें गदग जिले में लघु सिंचाई विभाग के तहत एक महत्वपूर्ण परियोजना सौंपी गई थी। इस परियोजना में सड़क के दोनों ओर सुरक्षा दीवार (Retaining Wall) का निर्माण शामिल था, जिसकी कुल लागत लगभग 1 करोड़ रुपये थी।
आरोप है कि इस प्रोजेक्ट की मंजूरी और बिलों के भुगतान को सुचारू बनाने के लिए विधायक लामानी ने 11 लाख रुपये की कुल मांग की थी। लोकायुक्त एसपी सिद्धलिंगप्पा और उनकी टीम ने एक जाल बिछाया। जैसे ही विजय पूजर ने रिश्वत की पहली किस्त के रूप में 5 लाख रुपये विधायक के निजी सहायकों को सौंपे, टीम ने दबिश दी। छापेमारी के दौरान अफरा-तफरी का माहौल बन गया। एक निजी सहायक ने पकड़े जाने के डर से नोटों के बंडल को पास के एक स्कूल परिसर में फेंक दिया। हालांकि, सतर्क अधिकारियों ने तुरंत उस धन को बरामद कर लिया और उसकी पहचान सुनिश्चित की।
डॉ. चंद्रू लामानी का राजनीतिक उदय काफी दिलचस्प रहा है। राजनीति में आने से पहले वे एक प्रतिष्ठित सरकारी डॉक्टर थे और स्वास्थ्य विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर रहे थे। एक चिकित्सा पेशेवर के रूप में उनकी छवि सेवाभावी थी, जिसने उन्हें 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर जीत दिलाने में मदद की। इस गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा और पेशेवर पृष्ठभूमि हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ सुरक्षा कवच नहीं होती। सत्ता का लोभ और ‘कमीशन’ की संस्कृति किसी भी व्यक्ति को अपने सिद्धांतों से समझौता करने पर मजबूर कर सकती है।
कर्नाटक लोकायुक्त, जिसे देश की सबसे शक्तिशाली भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं में से एक माना जाता है, ने इस मामले में अत्यंत व्यावसायिकता दिखाई है। विधायक और उनके दो निजी सहायकों (मंजूनाथ और एक अन्य) के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें बेंगलुरु की एक विशेष भ्रष्टाचार विरोधी अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें 3 मार्च 2026 तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। लोकायुक्त के पास कॉल रिकॉर्डिंग, रंगे हाथों पकड़े गए गवाह और बरामद की गई नकदी के रूप में मजबूत सबूत हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में ‘रंगे हाथों’ पकड़ना सबसे मजबूत साक्ष्य माना जाता है।
इस गिरफ्तारी ने कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच एक नए वाकयुद्ध को जन्म दे दिया है। भाजपा के लिए यह घटना अत्यंत असहज करने वाली है। पार्टी अक्सर ‘जीरो टॉलरेंस टू करप्शन’ का नारा देती है, लेकिन उसके ही एक विधायक की गिरफ्तारी ने उसे बचाव की स्थिति में ला दिया है। राज्य नेतृत्व ने हालांकि जांच का समर्थन करने की बात कही है, लेकिन नैतिक रूप से पार्टी दबाव में है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस घटना को भाजपा के ‘40% कमीशन’ वाले आरोपों की पुष्टि बताया है। उन्होंने कहा कि यह गिरफ्तारी साबित करती है कि भाजपा के शासन मॉडल में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी थीं। गदग और शिराहट्टी के स्थानीय नागरिकों में इस घटना को लेकर गहरा रोष है। लोगों का मानना है कि यदि विकास कार्यों का 11% हिस्सा केवल विधायक की जेब में जाएगा, तो निर्मित होने वाली सड़कों और दीवारों की गुणवत्ता क्या होगी?
यह मामला केवल रिश्वत का नहीं है, बल्कि यह उस प्रणालीगत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है जो हमारे बुनियादी ढांचे को खोखला कर रहा है। जब ठेकेदार को भारी भरकम रिश्वत देनी पड़ती है, तो वह उस कमी को पूरा करने के लिए निर्माण सामग्री की गुणवत्ता से समझौता करता है। इससे बनी हुई सड़कें पहली बारिश में ही टूट जाती हैं और सरकारी धन की बर्बादी होती है। सिंचाई विभाग के प्रोजेक्ट सीधे तौर पर किसानों और ग्रामीण कनेक्टिविटी से जुड़े होते हैं। ऐसे प्रोजेक्ट्स में भ्रष्टाचार का मतलब है ग्रामीण विकास के साथ खिलवाड़।
डॉ. चंद्रू लामानी की गिरफ्तारी एक शुरुआत है, लेकिन भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म करने के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता है।चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक भारी भरकम धन की जरूरत ही अक्सर विधायकों को भ्रष्टाचार की ओर धकेलती है। चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने की सख्त जरूरत है। ठेकों के आवंटन और भुगतान की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि किसी भी स्तर पर मानवीय हस्तक्षेप और ‘सौदेबाजी’ की गुंजाइश न रहे।
विजय पूजर जैसे साहसी ठेकेदारों को सुरक्षा प्रदान करना आवश्यक है ताकि अन्य लोग भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कर सकें। जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित सुनवाई (Fast Track Courts) होनी चाहिए और दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने।
डॉ. चंद्रू लामानी का मामला भारतीय राजनीति के लिए एक सबक है। यह हमें याद दिलाता है कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, बड़ा नहीं है। लोकायुक्त की इस सक्रियता ने उन लोगों के मन में डर पैदा किया है जो सत्ता को ‘वसूलने’ का जरिया समझते हैं।
भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना तभी पूरा होगा जब समाज और प्रशासन मिलकर ऐसे ‘सफेदपोश अपराधियों’ को बेनकाब करेंगे। यह गिरफ्तारी कर्नाटक की राजनीति में शुद्धिकरण की एक प्रक्रिया साबित हो सकती है, बशर्ते जांच अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचे और न्याय बिना किसी पक्षपात के सुनिश्चित हो।



