कला, कानून और कट्टरपंथ: ‘द केरल स्टोरी 2’ पर अदालती हस्तक्षेप
'केरलम' की सामाजिक बनावट और सुरक्षा चिंताएं

केरल उच्च न्यायालय द्वारा फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2’ (The Kerala Story 2 – Goes Beyond) की रिलीज पर रोक लगाने का प्रारंभिक निर्णय और सेंसर बोर्ड (CBFC) की आलोचना भारतीय न्यायशास्त्र और सिनेमैटिक अभिव्यक्ति के इतिहास में एक अत्यंत जटिल अध्याय है। यह मामला केवल एक फिल्म की रिलीज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)), सामाजिक सद्भाव, और संस्थागत जवाबदेही के बीच के त्रिकोणीय संघर्ष को उजागर करता है। केरल उच्च न्यायालय की सिंगल बेंच और बाद में डिवीजन बेंच के परस्पर विरोधी फैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या एक फिल्म को केवल उसके ‘प्रोपेगैंडा’ होने के संदेह पर रोका जा सकता है, या सेंसर बोर्ड का प्रमाणपत्र ही अंतिम सत्य है?
जब 2023 में ‘द केरल स्टोरी’ का पहला भाग रिलीज हुआ था, तब भी उसने देशव्यापी बहस को जन्म दिया था। अब, 2026 में इसका दूसरा भाग ‘द केरल स्टोरी 2’ न केवल अपनी विषयवस्तु के कारण, बल्कि सेंसर बोर्ड की कथित विफलताओं के कारण भी विवादों के केंद्र में है। केरल उच्च न्यायालय की टिप्पणी कि “सेंसर बोर्ड ने फिल्म को प्रमाणित करते समय अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया”, एक गंभीर संवैधानिक चेतावनी है।
न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस की सिंगल बेंच ने जब फिल्म पर 15 दिनों की अंतरिम रोक लगाई, तो उनके पास कुछ ठोस कानूनी और सामाजिक तर्क थे अदालत ने पाया कि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत CBFC को यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी फिल्म सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या सांप्रदायिक घृणा फैलाने का कारण न बने। अदालत का मानना था कि फिल्म के कुछ दृश्य प्रथम दृष्टया इन दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि फिल्म ‘सच्ची घटनाओं’ पर आधारित होने का दावा करती है, लेकिन इसमें दिखाए गए दृश्य (जैसे जबरन बीफ खिलाना) अतिरंजित और भड़काऊ हैं। सिंगल बेंच ने माना कि कला के नाम पर किसी राज्य या समुदाय की छवि को इस कदर धूमिल नहीं किया जा सकता जिससे वास्तविक दुनिया में हिंसा भड़कने की आशंका हो।
उच्च न्यायालय की सबसे तीखी टिप्पणी सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर थी। अदालत ने पूछा कि बोर्ड ने उन दृश्यों को मंजूरी कैसे दी जो सीधे तौर पर सांप्रदायिक सद्भाव को खतरे में डाल सकते हैं? बोर्ड को केवल एक ‘रबर स्टैंप’ की तरह काम नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे यह देखना चाहिए कि फिल्म की सामग्री का सामाजिक प्रभाव क्या होगा। फिल्म को ‘U/A’ (व्यस्कों की निगरानी में बच्चों के लिए) प्रमाणपत्र दिया गया था। अदालत ने चिंता जताई कि इस तरह की भड़काऊ सामग्री बच्चों और किशोरों के कोमल मन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
केरल अपनी उच्च साक्षरता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध है। अदालत ने इस ‘सांस्कृतिक पूंजी’ की रक्षा को प्राथमिकता दी।याचिकाकर्ताओं का दावा था कि फिल्म को विशेष रूप से चुनाव से पहले ध्रुवीकरण करने के लिए डिजाइन किया गया है। केरल में 2026 के विधानसभा चुनाव पास हैं, ऐसे में फिल्म की टाइमिंग ने इसे एक राजनीतिक हथियार बना दिया है। केरल सरकार ने भी अदालत में चिंता जताई थी कि फिल्म के प्रदर्शन से राज्य के कुछ संवेदनशील इलाकों में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।
सिंगल बेंच के फैसले को निर्माताओं ने तत्काल डिवीजन बेंच में चुनौती दी। रात को हुई इस विशेष सुनवाई में न्यायशास्त्र के दूसरे पहलू को प्राथमिकता दी गई डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल ट्रेलर या टीज़र के आधार पर किसी कलाकृति को प्रतिबंधित करना अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है। जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म को हरी झंडी दे दी है, तो अदालत को उसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि भारत एक सहिष्णु देश है और लोगों के पास यह विकल्प है कि वे फिल्म देखें या न देखें। यदि कोई फिल्म उन्हें आहत करती है, तो वे उसे अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन राज्य को उसे प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए।
यह मामला इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि ‘कला’ और ‘घृणास्पद भाषण’ (Hate Speech) के बीच की लकीर कितनी धुंधली हो गई है। क्या कोई फिल्म ‘हेट स्पीच’ हो सकती है? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई फिल्म किसी समुदाय को सामूहिक रूप से अपराधी के रूप में चित्रित करती है और हिंसा के लिए उकसाती है, तो वह अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे से बाहर हो जाती है।दुनिया भर में सेंसरशिप को खत्म कर ‘वर्गीकरण’ (Classification) की मांग की जा रही है, लेकिन भारतीय संदर्भ में, जहाँ धार्मिक भावनाएं अत्यंत संवेदनशील हैं, ‘सेंसरशिप’ की भूमिका अभी भी अनिवार्य बनी हुई है।
केरल की सत्ताधारी पार्टी LDF और विपक्ष UDF दोनों ने फिल्म का विरोध किया, जबकि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने इसे ‘सत्य को उजागर करने’ का माध्यम बताया। पिनाराई विजयन ने इसे ‘संघ परिवार का एजेंडा’ बताया। विपुल अमृतलाल शाह ने कहा कि उनकी फिल्म आतंकवाद के खिलाफ है, किसी धर्म के खिलाफ नहीं।
‘द केरल स्टोरी 2’ पर कानूनी खींचतान यह दिखाती है कि भारतीय न्यायपालिका अभी भी इस बात पर विभाजित है कि ‘शांति’ और ‘स्वतंत्रता’ में से किसे प्राथमिकता दी जाए। हालांकि डिवीजन बेंच ने फिल्म को रिलीज करने की अनुमति दे दी, लेकिन सिंगल बेंच द्वारा सेंसर बोर्ड को दी गई चेतावनी एक महत्वपूर्ण सबक है।
भविष्य में, CBFC को और अधिक पारदर्शी और विविध (Diverse) बनाने की आवश्यकता है, जिसमें केवल नौकरशाह ही नहीं, बल्कि समाजशास्त्री और कानूनी विशेषज्ञ भी शामिल हों। कला को स्वतंत्र रहना चाहिए, लेकिन उसे समाज की नींव को हिलाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।



